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संस्कृत छात्रवृत्ति योजना के शुभारंभ एवं 69,195 विद्यार्थियों को ₹586 लाख की छात्रवृत्ति के संवितरण हेतु सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में आज आयोजित कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ।
यह समारोह संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाबा विश्वनाथ जी, माँ अन्नपूर्णा और गंगा मैया से प्रार्थना है कि संस्कृत और संस्कृति के प्रति आप सभी का जो भाव है, वह और मजबूती के साथ आगे बढ़े।
छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई!
जयतु संस्कृतम्।

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संस्कृत छात्रवृत्ति योजना के शुभारंभ एवं 69,195 विद्यार्थियों को ₹586 लाख की छात्रवृत्ति के संवितरण हेतु सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में आज आयोजित कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ।
यह समारोह संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाबा विश्वनाथ जी, माँ अन्नपूर्णा और गंगा मैया से प्रार्थना है कि संस्कृत और संस्कृति के प्रति आप सभी का जो भाव है, वह और मजबूती के साथ आगे बढ़े।
छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई!
जयतु संस्कृतम्।

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संस्कृत छात्रवृत्ति योजना के शुभारंभ एवं 69,195 विद्यार्थियों को ₹586 लाख की छात्रवृत्ति के संवितरण हेतु सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी में आज आयोजित कार्यक्रम में सम्मिलित हुआ।
यह समारोह संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति और उसकी आत्मा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाबा विश्वनाथ जी, माँ अन्नपूर्णा और गंगा मैया से प्रार्थना है कि संस्कृत और संस्कृति के प्रति आप सभी का जो भाव है, वह और मजबूती के साथ आगे बढ़े।
छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले सभी विद्यार्थियों को हार्दिक बधाई!
जयतु संस्कृतम्।

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अंजलि की ओर से नमस्कार

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शरद ऋतु में पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं

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पूरे भारत में डर का माहौल है 😂

बिश्नोई बम धमाके 😅

सभी हिंदू भाइयों को दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं!🙏

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शीतल देवी, दुनिया की पहली ऐसी महिला तीरंदाज बन गई हैं, जिनके दोनों हाथ नहीं हैं। उनकी इस उपलब्धि ने सभी को प्रेरित किया है। "द सैवेज ह्यूमन्स" शीतल देवी को सलाम करता है, जिन्होंने अपनी शारीरिक चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए अपनी मेहनत और दृढ़ता से सफलता की उड़ान भरी।
शीतल का सफर आसान नहीं था। गरीब परिवार में जन्मी शीतल के पास सीमित संसाधन थे, लेकिन उनके हौसले अडिग थे। तीरंदाजी के प्रति उनके जुनून ने उन्हें उस ऊंचाई तक पहुँचाया, जहाँ उन्होंने पैरों से तीरंदाजी करते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतियोगिताएं जीतीं। उनके जीवन में संसाधनों की कमी थी, पर अपने सपनों के लिए उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
कई बार अभ्यास के दौरान मुश्किलें आईं, लेकिन उनके परिवार और कोच ने उनका पूरा साथ दिया। शीतल की इस मेहनत और संघर्ष ने उन्हें एक प्रेरणास्रोत बना दिया है। उनकी इस उपलब्धि ने यह साबित कर दिया है कि चाहे कितनी भी कठिनाई हो, सच्ची मेहनत और समर्पण से हर सपना पूरा किया जा सकता है। शीतल की यह कहानी उन सभी के लिए एक प्रेरणा है जो अपने सपनों को साकार करना चाहते हैं।

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