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स्कूल वैन का ड्राइवर "सुहैल"
गाड़ी में ही लड़की के साथ कुकर्म करते पकड़ा
क्या आपकी बेटी भी स्कूल वैन से जाती है ?
नांदेड़ के एक स्कूल वैन का ड्राइवर सुहैल तब रंगे हाथों पकड़ा गया जब वो वैन में ही एक स्कूल की लड़की के साथ कुकर्म कर रहा था
आपकी बेटी सुरक्षित नहीं है अगर आपने ध्यान नहीं दिया तो, क्यूंकि ये दरिंदे हर जगह बहन बेटियों की इज्जत लूटने पे उतारू हैं
फिलहाल सुहैल को गिरफ्तार कर लिया गया है
गुजरात के अहमदाबाद में जन्मे और पले-बढ़े जगत किनखाबवाला ने फाइनेंस में एमबीए किया और फिर सालों तक कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ काम किया। आज भी वे कॉर्पोरेट कंपनियों के लिए बतौर सीएसआर कंसलटेंट काम करते हैं। लेकिन उनकी इस पहचान से उनके जानने वाले लोग ही वाकिफ़ हैं। बाकी हर किसी के लिए वे ‘स्पैरो मैन’ हैं, जो खुद तो चिड़ियों के संरक्षण पर काम कर ही रहे हैं। साथ ही, उनके इस काम और शोध ने देश-दुनिया में और भी लोगों को उनसे जुड़ने के लिए प्रेरित
सरकार के इकोलॉजी विभाग ने राज्य में समाज के लिए, पर्यावरण के लिए अच्छा काम कर रहे कुछ लोगों को सम्मानित करने के लिए चुना था। उन्हीं में से एक नाम जगत का भी था।
प्रधानमंत्री ने अपने इस कार्यक्रम में पूरे देश को जगत के अमूल्य कार्यों के बारे में बताते हुए, उन्हें “स्पैरो मैन ऑफ़ इंडिया” के नाम से नवाज़ा। वहीं गुजराती भाषा में लोग उन्हें ‘चकली काका’ बुलाते हैं।
जगत द्वारा बचाई जाने वाली चिड़िया ही नहीं, बल्कि इन चिड़ियों के लिए जो घोंसले वे बनाते हैं, वे भी काफ़ी मशहूर हैं। वे किसी भी पुराने कार्टन या डिब्बे को उचित जगह से काटकर, इस तरह से तैयार करते हैं कि अगर उसे घर की दीवारों या फिर छत से भी लटकाया जाए तो चिड़िया आसानी से अपना घोंसला इसमें बना सकती है।
🪷अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।
🪷जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।
🪷पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता था जिसे जमोट कहते है।
🪷दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।
🪷भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।
आप को लगेगा अजीब बकवास है, किन्तु यह सत्य है👉🏻
पिछले 68 सालों में पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द किया गया है।
पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजॉर्बर है, बरगद 80% और नीम 75 % ।
इसके बदले लोगों ने विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया, जो जमीन को जल विहीन कर देता है...
आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है ।
अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नहीं रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही, और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही ।
हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगायें,
तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त भारत होगा । 🌳
वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए ।
पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है, जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं ।
वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है ।
इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए ।
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु, सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम, वृक्षराज नमस्तुते।।