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डेज़ी दीदी ने बांधी राखी, दिया आशीष…
बॉबी दीदी की राखी भी उन्होंने ही बांधी। एक राखी एमेजॉन से बेनाम प्राप्त हुई थी। जिस बहन ने भेजी हो, पोस्ट देखते ही फोन करें।
#रक्षाबंधन
#rakshabandhan

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डेज़ी दीदी ने बांधी राखी, दिया आशीष…
बॉबी दीदी की राखी भी उन्होंने ही बांधी। एक राखी एमेजॉन से बेनाम प्राप्त हुई थी। जिस बहन ने भेजी हो, पोस्ट देखते ही फोन करें।
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श्री पैथोलॉजी एंड डाइग्नेस्टिक सेंटर के स्टॉप ने स्वंत्रता दिवस मनाया।
इसी महीने सेंटर में IHC, USG भी एड हो रहा है। सबसे विश्वसनीय डाइग्नेस्टिक सेंटर के रूप में प्रतिष्ठा बन चुकी है।

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श्री पैथोलॉजी एंड डाइग्नेस्टिक सेंटर के स्टॉप ने स्वंत्रता दिवस मनाया।
इसी महीने सेंटर में IHC, USG भी एड हो रहा है। सबसे विश्वसनीय डाइग्नेस्टिक सेंटर के रूप में प्रतिष्ठा बन चुकी है।

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श्री पैथोलॉजी एंड डाइग्नेस्टिक सेंटर के स्टॉप ने स्वंत्रता दिवस मनाया।
इसी महीने सेंटर में IHC, USG भी एड हो रहा है। सबसे विश्वसनीय डाइग्नेस्टिक सेंटर के रूप में प्रतिष्ठा बन चुकी है।

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जब यह तय हो गया कि अब युद्ध होगा ही और अर्जुन माधव को मांग लिये, दुर्योधन नारायणी सेना ले लिया।
शकुनी को दुर्योधन कि मूर्खता पर बड़ा क्षोभ हुआ। वह रात्रिभर सोया नही।
इधर पांडव बड़े प्रसन्न थे कि जब भगवान ही साथ हैं तो युद्ध में विजय तो अब पक्की ही है।
भगवान अर्जुन को अपने महल में आने का संदेश भेजे। अर्जुन बड़े प्रसन्न हुये कि अब भगवान यही कहेंगें तुम लोग बहुत दुख भोगे अब आराम करो बाकी मैं देख लूँगा।
अर्जुन पहुँचे चरण वंदना किये।
भगवान उनसे बोले पार्थ यह कोई सामान्य युद्ध नहीं है।
पहले इंद्र कि फिर महादेव कि आराधना करके उन्हें प्रसन्न करो।
यह तो युद्ध से भी कठिन कार्य है। महादेव को प्रसन्न होंगें या नहीं यह भी एक प्रश्न है।
भगवान बोले तुम्हारे साथ धर्म है। और मैं भी तुम्हारे साथ हूँ। आदिदेव महादेव अवश्य प्रसन्न होंगें। तपस्या कठिन होगी लेकिन उनके आशीर्वाद के बिना तो युद्ध नहीं जीता सकता है। समस्त दिव्यास्त्रों के वह रचयिता हैं। वह तभी तुम्हें प्राप्त होंगें।
अर्जुन ने कठिन तपस्या किया। महादेव प्रकट हुये। अर्जुन को आशीर्वाद के रूप में ब्रह्मास्त्र दिया।
यह प्रसंग इसलिये यहां कहे हैं। इससे दो अर्थ निकलते हैं।
ईश्वर साथ हैं, फिर भी कठिन से कठिन कर्म के लिये प्रेरित कर रहें हैं।
दूसरी बात यह है कि वह शिक्षा दे रहें हैं। आसन्न परिस्थितियों के लिये उसी स्तर कि तैयारी पहले से होनी चाहिये।
बैठे भोजन देय मुरारी वाली कहावत बिल्कुल ही निरर्थक है।।

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बंगाल में जैसे एक अबोध, असहाय , सेवारत चिकित्सक के साथ सामुहिक रेप हुआ है। फिर उस रेपिस्टों को बचाने के लिये सात हजार कि भीड़ आई गई। इस भीड़ को बचाने के लिये एक भ्र्ष्ट तंत्र कि मुख्यमंत्री उतर गई हैं। इस नपुंसक व्यवस्था से मन खिन्न हो गया।
अब एक ही प्राथना है-
हे भगवती,
महाकाली
भवानी।
ऐसे नरपिशाचों का रक्तपान करिये।।

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भगवान राम के प्रति आस्था, श्रद्धा, भक्ति रखने से धर्म के सभी गुण स्वतः ही आकर्षित होने लगते हैं। उसके लिये किसी अतिरिक्त तपस्या कि आवश्यकता अनिवार्य न होगी।
मर्यादापुरुषोत्तम राम जब हृदय में प्रतिष्ठित होते है। तो भगवान भरत जी के जीवन मूल्य ध्यान आते है।
दर्शन, धर्म के सभी सनातन विचार जंहा एक साथ ईश्वर द्वारा परिभाषित है। वह गीता है। जंहा उनके उपदेश, निर्देश संकलित है। उसमें जो सबसे प्रमुख, प्रभावशाली विचार भगवान अर्जुन के सामने रखते है।
वह है कि ' कर्ता ' का भाव त्याग दो।
क्योंकि कर्ता का भाव अहंकार का प्रथम बीज है। और अहंकार धर्म में बहुत गहरा बैर है। धर्म कि वहां छाया भी नही पड़ सकती। जंहा अहंकार है। यदि यह कही दिखता है, तो वह मात्र आडंबर है।
कर्ता के भाव को छोड़ना बहुत कठिन है। यह कहते हुये सरल लगता है। ईश्वर जब कह रहे है तो अवश्य तप होगा।
लेकिन भगवान भरत के पास चलिये। जो एक कुटिया में बैठे है। जँहा मंत्रियों, सैन्य प्रमुखों, पदाधिकारियों के दल आदेशों के हस्तक्षार हेतु आते रहते है। ऋषियों, विद्वानों, पुरोहितों के समूह आशीर्वाद और चर्चा के लिये आते रहते है।
लेकिन जो दृश्य भावपूर्ण है। वह है स्वर्ण, मणि जड़ित सूर्यवंश के सिंहासन पर एक खड़ाऊ रखा है। उसके सामने, नीचे भरत जी बैठकर सारा राजकार्य देख रहे है।
वह खड़ाऊ मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचन्द्र जी का है। भरत जी का हर कर्म उन्हीं के चरणों मे समर्पित है।
यही अकर्ता का भाव है। भरत जी में कोई कर्ता का भाव नही है। वह कुछ कर ही नही रहे हैं। सब राम के चरणों में समर्पित है।
हनुमानजी जब जगतजननी सीता जी का पता लगाकर वापस प्रभु के पास आते है।
तो भगवान उनके लिये क्या कहते है -
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
"तुम भरत के समान प्रिय हो।"

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व्यथित मन से......
एक बेटी पालना, बड़ा करना, पढ़ाना, फिर विवाह करना। इन सब में सबसे महत्वपूर्ण है उसकी सुरक्षा को लेकर सैदव सचेत रहना।
एक पिता के लिये यह किसी तपस्या से कम नहीं है। हर पल, हर क्षण उसके हृदय, बुद्धि का एक कोना इसी में लगा रहता है। बेटी कैसे होगी।
एक बेटी को उच्च शिक्षा देना। उसे चिकित्सक बनाना।
फिर उस पिता के सामने बेटी कि ऐसी विभत्स घटना हो जाय। जिसको लिखने में मैं स्वयं असमर्थ हूँ।
और व्यवस्था, सत्ता ऐसी घटनाओं को रोक नहीं पाती। अपराधियों को दंडित करने की जगह बचाती हैं।
क्या ऐसी सरकारों को एक क्षण के लिये भी सत्ता में बने रहने का अधिकार है?

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ਰੱਖੜੀ ਮੌਕੇ ਭੈਣ ਨੇ ਭਰਾ ਨੂੰ ਦਿੱਤਾ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦਾ ਅਨਮੋਲ ਤੋਹਫ਼ਾ

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