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राजस्थान के थार मरुस्थल मे पानी की समस्या ख़त्म करने का सबसे सरल ओर कम खर्च का तरीका है तालाबों का संरक्षण ओर बहाव क्षेत्र में नये तालाबों का निर्माण।जबकि उल्टा हो रहा है सरकार नल से जल लाकर तालाबों की उपगिता ख़त्म कर रही हैं।अच्छा है नल से जल देओ पर तालाब मे जल संरक्षण करके उसी मे मोटर डालकर पूरे गाँव को नियमित सप्लाई दी जा सकती है।अतिरिक्त आवश्यकता होने पर नहर से सप्लाई दी जा सकती हैं।लोग सिर्फ़ शहर से आये जल पर निर्भर हो रहे हैं।क्या आपके गाँव का तालाब पीने योग्य है।
पिछले तीन साल से हिरणों के लिए पड़त जमीन पर घास लगाने का प्रयास कर रहा हूँ।काजरी में नौकरी की वजह से रेगिस्तान की घासों का बीज भी ले आता हूँ ओर घास मैदान विकसित करने का तकनीकी ज्ञान भी।संस्थान के वैज्ञानिक भी मदद करते हैं पर सबसे बड़ी समस्या प्रोटेक्शन की है।धामण सेवण बुरड़ा अंजन जैसी रेगिस्तानी घासों को पनपने के लिए थोड़ा वक़्त चाहिए होता है ओर उसके लिए ज़रूरी है कि उक्त जगह को संरक्षित किया जाये।एक बार घास पनप जाने पर उसकी जड़ें गहरी हो जायोगी ओर फिर उसे गाँव के सांड,गायें ओर भेड़ बकरियाँ भी चरेगी तो उखड़ के नहीं आयेगी।वन्यजीवों के लिए भी चारा हो जायेगा।पर ये प्रयास सरकारी स्तर पर नहीं होता तब तक सफलता मुश्किल है क्योंकि भेड़ बकरी वालो को एक महीने के लिए भी इस जगह से रोकना मुश्किल है।वे पूरे दिन ओरण मे भेड़ बकरी चराते है ओर उगी घास ऊखाड़ के खा जाते हैं।तीस साल पहले बुजुर्ग बताते हैं कि ओरणो मे कमर जितनी बड़ी घासे हुआ करती थीं जहा आज केवल बिहाणी खड़ी नजर आती हैं क्योंकि भेड़ बकरी का अतिचारण प्राकृतिक रूप से उगी घास को भी बीज अवस्था तक पहुँचने नहीं देते ओर धीरे धीरे घास ख़त्म हो गई।ओरण से खेजड़ी काटते रहते हैं पूरे दिन।ओरण का उपयोग कीजिए पर दोहन मत कीजिए।भेड़ बकरी का पशुपालन आपका धंधा है आजीविका है पर समझने का प्रयास तो कीजिए।एक दो महीने तक दूसरे ओरण मे चराओ तब तक घास पनप जायेगी फिर आपके भी काम आयेगी। नहीं तो युवा साथियों तब तक ओरण मे घासों के बीज उछालते रहिए कम से कम एक साल तो उगेगी घास ओर वन्यजीव खायेंगे।जैसा मेरे साथ हो रहा है।पंचायत स्तर पर ये काम पूरे रेगिस्तान में किये जाने चाहिए। पंच सरपंच आधे भाग को संरक्षित करके भी घास लगवा सकते है।आवारा पशुओं को भी ओरण मे खाने को मिलेगा तो वे खेतों में नही घुसेंगे ।चार तार की तारबंदी से पेट चीरकर आपके खेतों में घुसने का उनका कोई शौक नहीं होता है मजबूर किया गया है उन्हें।
गाँव रा लोग गाँव में लगने वाले फल खाते थे क्योंकि तब सेव ओर आम गाँवों में नहीं आते थे ओर यक़ीन मानिए ज़्यादा मज़बूत होते थे।क्योंकि थार के इन फलो को इथायलिन से नहीं पकाया जाता है।यक़ीन नहीं होगा आपको पर चार साल पहले एक महिला की मौत हो गई जिसे डाक्टर ने सेव खाने को कहा था ओर उसका पति हर रोज थैला भर भर के सेव लाता था।कारण कुछ भी रहा हो सकता है पर दो साल तक इथायलिन की हल्की डोज तो दी ही गई है उस महिला को।
प्रकृति ने हर भौगोलिक क्षेत्र में वहाँ के जीवों के लिए विशिष्ट फल फूल दिये हैं जो वहाँ के निवासियों के लिए ज़्यादा लाभदायक होते हैं।थार जैसे गर्म प्रदेश के लोग ठंडे प्रदेशों के फल खा रहे हैं यक़ीन मानिए किसी सेव से ज़्यादा बेर लाभदायक है थार वासियो आपके लिए।ओर अंगूर ज़्यादा ये पीलू लाभदायक है।यातायात के साधनों की वजह से ये संतुलन बढा है।अपने खेत के इन पेड़ों को बचाकर रखो किसान भाईयो पत्थर की दिवारों के ऐसे मीठे फल नहीं लगते।काटो मत जालों को।अपने बच्चों को ये स्थानीय फल खाने को प्रेरित करो।