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उन दोनों मठाधीशों से कुछ जिज्ञासा है जो लोग 500 वर्ष बाद भगवान राम के मंदिर , प्राण प्रतिष्ठा समारोह उत्सव में नहीं आये मुँह फुलाकर कैकेई और मंथरा बने रहे
वही लोग अम्बानी के पुत्र के विवाह में दौड़े चले गए
शास्त्र के नाम पर पल पल बखेड़ा खड़ा करने वाले लोग जिन्होंने अशास्त्रीय मानकर और शास्त्र की आड़ लेकर अपने अहंकार में को पोषित करने का कुचक्र किया था आज वही लोग सन्यासी होकर भी विवाहोत्सव में चले गए
*पैसा सबको नचा देता है* इन लोगों को राम मंदिर से ज्यादा अपनी कीर्ति प्यारी थी *...*...
*अब कृपा कर यह समस्त हिन्दू समाज को बतायें कि* कौन से शास्त्र के अनुसार *यह लोग सन्यासी होकर विवाहोत्सव में गए ??*
*क्या यह राम मन्दिर से बढ़ कर था ???*
*चलिए* गृहस्थ सन्तों की बात अलग है , उनको यह निषेध नहीं है *...*...
*लेकिन यह बहुत बड़े पीठाधीश अवश्य बतायें कि* सन्यासी होकर *यह किस शास्त्र विधि का पालन करके गए ??*
*सन्यासियों के लिए तो यह नियम है कि* एक गाँव में एक ही रात ठहरने का नियम होता है *इससे ऊपर वह एक गाँव में निवास नहीं कर सकते अपने आश्रम को छोड़कर*
*सन्यासी के चार भेद होते हैं ...*...
1. "कुटिचक
2. बहुदक
3. हंस
4. परमहंस
*इन चारों के नियम के अनुसार* कृपया सभी सनातन धर्मियों को बताएं कि वह किस शास्त्र के नियम से *विवाहोत्सव में गए ???*
*अरे सन्यासियों को तो* नर्म गद्दा , रुई , अग्नि , धातु पात्र तक प्रयोग में लाना चाहिए *...*...
*जब आप शास्त्र शास्त्र करके समाज को तोड़ते हैं* तब तो आप को भी *शास्त्र के नाम पर कटघरे में खड़ा करना चाहिए*
*यह सनातन धर्मी सब देख रहा है आप लोगों का 👁️*
*इस कलियुग में* जितना आडंबर और पाखंड फैला है न , वह सब दृष्टिगोचर हो रहा है *स्वयं के लिए कोई नियम नहीं* और वैसे चींटी तक के लिए *शास्त्र शास्त्र कर के नियम बिना सिर पैर के करेंगे*
*इसीलिए कलियुग के लक्षणों में यह लिखा है कि* जब भगवान कल्कि अवतार में आएंगे तो सबसे पहले आश्रमों को नष्ट करेंगे *क्योंकि* कलियुग के प्रभाव से अधर्म धर्म को चोला पहन कर इन आश्रमों में वास करने लगेगा *...*...
*हम सनातन धर्मी आपसे यह प्रश्न तब न पूछते* जब आप हमारे आराध्य भगवान श्री रामचन्द्र के उत्सव में सम्मिलित होकर हम सभी जनों को *अपना आशीर्वचन प्रदान करते* और समस्त विश्व को यह संदेश देते कि *हम सनातन धर्मी एक हैं ...*...
*तब आपसे हम यह प्रश्न न पूछते* लेकिन *अब हमारा यह कर्तव्य है कि आपसे पूछें कि*
* अब कहाँ फेंक दिए आपने सारे शास्त्र ?
* कहाँ गया सन्यासी का नियम ?
* कहाँ गयी पीठ की मर्यादा ?
* कहाँ गयी आचार्य शंकर की वह मर्यादा जिसका नाम ढोकर और आगे लगाकर आप लोग यह अमर्यादित कृत्य कर रहे हैं ??
*हम अन्य किसी सन्त और साधु को नहीं कहेंगे* क्योंकि वह भगवान श्रीरामचन्द्र के इस शताब्दी के सबसे बड़े महोत्सव में सम्मिलित हुए थे *और प्रसन्नतापूर्वक सभी सनातन धर्मियों को अपना आशीर्वाद दिया था ...*...
*लेकिन आप लोगों पर* आद्य जगद्गुरु आचार्य शंकर की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का *यह आरोप सदा लगता रहेगा ...*...
*हम सभी हिन्दू इस पर आपके शास्त्रोक्त मुखारविंद से स्पष्टीकरण चाहते हैं* ताकि यह हिन्दू समाज भ्रमजाल से बाहर आ सके *...*...
जय जय आद्य जगद्गुरु आचार्य शंकर की 💐💐