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असल किसान नहीं, ये पूँजीपति हैं जो किसानों के नाम पर राजनीतिक दलों की दलाली करते हैं।

देश में 92% जोत लघु व सीमांत कृषकों की हैं, जिन्हें किसान राजनीति से कोई वास्ता नहीं। आंदोलन कर रहे स्वार्थी तत्व, छोटे किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

खेती किसानी की आड़ में ये लोग टैक्स भी नहीं भरते और कृषक सब्सिडी का पूरा लाभ भी उठाते हैं जो छोटे किसानों के लिए होनी चाहिए।

किसान संगठनों के नाम पर चंदाबाज़ी व राजनीतिक दलों की दलाली अलग से।

इन पूँजीपति कथित किसानों को आमजन की समस्याओं से भी कोई सरोकार नहीं।

ये नितांत रूप से मोदी विरोधी की राजनीति का अंग हैं।

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2 años - Traducciones

Immensely grateful to my brother, @MohamedBinZayed
, for taking the time to receive me at Abu Dhabi airport.

I look forward to a productive visit which will further strength the friendship between India and UAE.

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मेवाड़ के इतिहास का वह पहलू, जिस पर अब तक अलग से कोई लेख नहीं लिखा गया है। मेवाड़ का राजवंश जापान के बाद दूसरा ऐसा राजवंश है, जिसने सर्वाधिक समय तक एक ही राज्य पर राज किया।
लेकिन आज आपको इस लेख में बताया जाएगा कि मेवाड़ के राजवंश ने ये कारनामा कैसे किया, कैसे मेवाड़ का राज हाथ से निकलने के बावजूद पुनः शत्रुओं को पराजित कर अपनी मातृभूमि पर अधिकार किया।
6ठी सदी से मेवाड़ के शासक राज करते आ रहे हैं। 8वी सदी में मेवाड़ के शासक अपराजित को उनके शत्रुओं ने मारकर मेवाड़ के अधिकांश भाग पर कब्ज़ा कर लिया, लेकिन बप्पा रावल ने पुनः मेवाड़ पर अधिकार कर लिया।
10वीं सदी में फिर मेवाड़ पर खतरे के बादल मंडराने लगे, तब रावल अल्लट ने मेवाड़ को शत्रुओं से मुक्त किया।
12वीं सदी में चालुक्यों ने चित्तौड़ पर कब्ज़ा किया, तो मेवाड़ के शासक सामंतसिंह ने चालुक्यों को परास्त करके पुनः चित्तौड़ विजय किया।
नाडौल के चौहान राजा ने चित्तौड़ जीता, तो सामंतसिंह वागड़ चले गए, लेकिन उनके भाई रावल कुमारसिंह मेवाड़ में ही रहे और सही समय आने पर चौहानों को परास्त कर चित्तौड़ विजय किया।
13वीं सदी में रावल जैत्रसिंह के समय सुल्तान इल्तुतमिश ने मेवाड़ की राजधानी नागदा का विध्वंस कर दिया। रावल जैत्रसिंह ने चित्तौड़ को राजधानी बनाई और खोया हुआ क्षेत्र इल्तुतमिश से वापिस छीन लिया।
1303 ई. में रावल रतनसिंह से अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ जीत लिया। मेवाड़ के कुछ ही योद्धा इस युद्ध के बाद जीवित बचे थे। मेवाड़ के एक गांव में कई वर्ष बिताने के बाद महाराणा हम्मीर ने अपने शत्रुओं को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया और मेवाड़ के उद्धारक कहलाए।
महाराणा कुम्भा ने मालवा और गुजरात के सुल्तानों से कई युद्ध लड़े, लेकिन मेवाड़ को कभी परास्त नहीं होने दिया।
महाराणा सांगा के समय खानवा के युद्ध के बाद मेवाड़ की स्थिति डगमगा गई और फिर गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने चित्तौड़ जीत लिया। अनेक राजपूतों के बलिदानों के बाद भी मेवाड़ राजवंश का स्वाभिमान नहीं हारा और छीन लिया शत्रुओं से चित्तौड़ को।
जब दासीपुत्र बनवीर ने चित्तौड़ पर कब्ज़ा जमाया तो महाराणा उदयसिंह ने बनवीर को भगाकर पुनः मेवाड़ पर शासन कायम किया।
जब अकबर ने चित्तौड़ जीता, तब महाराणा उदयसिंह ने गोगुंदा को राजधानी बनाई। महाराणा प्रताप ने भीषण संघर्ष करके 90 फीसदी मेवाड़ को पुनः जीत लिया।
महाराणा अमरसिंह ने 18 वर्षों तक मुगलों से भीषण संघर्ष किया। जब सन्धि हुई, तब कुछ वर्ष बाद पुनः महाराणा राजसिंह ने औरंगज़ेब के विरुद्ध मोर्चा खड़ा किया और धर्म की रक्षा की।
इस प्रकार मेवाड़ राजवंश ने सदा अपनी मातृभूमि की रक्षा की, पराजित होने के बाद भी पुनः पलटवार करके शत्रुओं को पराजित किया।
पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत

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फतहसागर झील (उदयपुर)
इसका निर्माण जयसमंद झील के निर्माणकर्ता महाराणा जयसिंह ने करवाया था, बाद में महाराणा फतहसिंह ने पाल का जीर्णोद्धार करवाया और इसकी सीमा बढ़ाई।

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सन्‍नी देओल की फिल्‍म लाहौर 1947 में कैमियो करेंगे आमिर खान, 12 फरवरी से शूटिंग होगी शुरू ||

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मैं बहुत ही ज़िद्दी जाट हूँ और जब मैं कह देता हूँ, मन बना लेता हूँ तो बदलता नहीं हूँ ।।
जय जाट पुरख 💪

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