Ontdek boeiende inhoud en diverse perspectieven op onze Ontdek-pagina. Ontdek nieuwe ideeën en voer zinvolle gesprekken
It gives me enormous satisfaction to share this news.
Because the success of this initiative will allow us to contribute significantly to the prowess of the Indian Air Force.
The partnership between
@MahindraRise
and
@embraer
will fulfil the acquisition of the C-390 Millennium multi-mission aircraft by the Indian Air Force in its upcoming Medium Transport Aircraft (MTA) procurement project. #c390
It gives me enormous satisfaction to share this news.
Because the success of this initiative will allow us to contribute significantly to the prowess of the Indian Air Force.
The partnership between
@MahindraRise
and
@embraer
will fulfil the acquisition of the C-390 Millennium multi-mission aircraft by the Indian Air Force in its upcoming Medium Transport Aircraft (MTA) procurement project. #c390
It gives me enormous satisfaction to share this news.
Because the success of this initiative will allow us to contribute significantly to the prowess of the Indian Air Force.
The partnership between
@MahindraRise
and
@embraer
will fulfil the acquisition of the C-390 Millennium multi-mission aircraft by the Indian Air Force in its upcoming Medium Transport Aircraft (MTA) procurement project. #c390

🚨 Rahul Kanwal: Which Political leader in History increased its vote share even after 10 years?
Rajdeep Sardesai: "NEHRU"
Rahul Kanwal 🔥🔥 : "Nehru's vote % dipped & there was NO OPPOSITION that time."
CVoter's Yashwant Deshmukh added 1952 mandate was NOT Nehru's mandate. All Freedom Struggle heavyweights were on Congress's side that time⚡
मैं शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुसलमान और दुर्भाग्य से हिन्दू हूँ...
भला कौन ही ऐसा पॉलिटिशियन होगा, जो खुद के लिए ऐसा कहेगा?? और भला ऐसी कौन सी पब्लिक होगी, जो इस तरह की बकवासों पर यकीन करती हो..
खैर, ये पब्लिक है। और उतना ही जानती है, जितना उसको व्हाट्सप पर सुबह सुबह बताया जाता है।
●●
एक थे खोटे साहब...
नही नाम तो उनका खरे था। नारायण भास्कर खरे... कर्मो से खोटे साबित हुए।
पर एक समय वे सचमुच खरे थे।
तब कांग्रेसी थे, असहयोग आंदोलन में जेल गए। जबलपुर की पैदाइश खरे, शिक्षा से डॉक्टर थे। बाकायदा पंजाब यूनिवर्सिटी से एमडी की डिग्री ली हुई थी।
पर रुचि राजनीति में थी। एक समय तरुण भारत के एडिटर रहे, जो उस जमाने मे पांचजन्य की तरह कांग्रेस के मुखपत्र जैसी थी।
उन्होंने गाँधीजी की पत्रिका हरिजन को भी उन्होंने एडिट किया। कांग्रेस से सेंट्रल असेम्बली के मेम्बर रहे। स्टेट असेम्बली के चेयरमैन रहे।
●●
1937 में चुनाव के बाद कांग्रेस की ओर से सरकार बनी, तो बीएन खरे, इसके पहले मुख्यमंत्री थे।
जी हां, लोग रविशंकर शुक्ल को पहला सीएम समझते हैं, वे दूसरे थे।
बहरहाल, नेहरू उस दौर में राज्यो में सरकारे बनाने के खिलाफ थे। 1936-39 का ये दौर कांग्रेस में फंडामेंटल चेंज का था। कई विचार थे, गुट थे, और कांग्रेस लेफ्ट और राइट में बंटी हुई थी। सरकारें बनने से राज्यो में पावर स्ट्रगल भी हो रहे थे।
तो साल भर के बाद ही, मुख्यमंत्री पद से खरे का पत्ता क्यूं कटा, मुझे नही पता। लेकिन इसके बाद खरे साहब खोटे हो गए।
●●
हिन्दू महासभा जॉइन कर ली और कांग्रेस को खरीखोटी सुनाने लगे। मगर उनका राजनीतिक ग्राफ गोता लगा गया। विधायकी तो 1942 तक चली, लेकिन फिर कभी वे चुनाव न जीते।
हिन्दू महासभा के वे अध्यक्ष भी बनाये गए, पर रूचा नही। वे अलवर रियासत में चले गए। वहां के प्रधानमंत्री बन गए, और फिर इस दौरान अलवर में मुसलमान विरोधी नीतियों से अच्छे खासे बदनाम हुए।
जो तब मेवात में मुसलमान छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे, ये अलवर और भरतपुर स्टेट का टेरर था। गांधी ने मेवात के गांव घसेड़ा में सभा कर, उन्हें रोका। पुकार सुनकर मेव लौट आये।
खरे के मुंह पर कालिख पुत गयी।
अलवर राज्य के प्रतिनिधि के रूप में, राजा ने उन्हें सम्विधान सभा मे नामित किया था। जिससे उन्होंने अधबीच में इस्तीफा दे दिया। दिल्ली लौट आये।
●●
नारायण भास्कर खरे के नाम एक रिकॉर्ड है। गांधी हत्या के बाद तमाम बड़े महासभाईयो के साथ वे भी नजरबंद हुए।
जब छूटे तो उनकी गतिविधियां ऐसी संदिग्ध थी, की दिल्ली के प्रशासक उन्हें पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत तड़ीपार कर दिया।
उन्हें तत्काल दिल्ली छोड़ने का आदेश दिया गया। तब तिरंगे और सम्विधान को मानने से इनकार करने वाले लोगो का ये नेता,...
अब सम्विधान पकड़कर आर्टिकल 19 के तहत, सिविल लिबर्टी का अपना अधिकार बचाने पहुँच गया।
विद्वान न्यायाधीशो ने सुना और कहा- चला जा @@$%#..
और तडिपारी अपहेल्ड रखी।
●●
इस तरह भारत मे संविधान के आर्टिकल 19 के वायलेशन का पहला केस, खारिज हुआ। यह रिकॉर्ड उनके नाम है।
कुंठा के समुद्र में डूबे खोटे साहब सन 70 तक जिये। एक बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की कोशिश की। पर्चा खारिज होने पर चुनाव आयोग पे केस ठोक दिया। हार गए।
इस कुंठा के दौर में में 1959 में उन्होंने एक लेख लिखा - द एंग्री एरिस्टोक्रेट..
लेख की शुरुआत नेहरू को महान नेता बताने से शकी। उसके बाद, संघी स्टाइल में इफ-बट- लेकिन - किंतु- परन्तु- अगर- मगर - बटर लगाया.. और खूब जहर उगला।
उस लेख में यह महान तथ्य लिखा कि - जवाहरलाल नेहरू असल मे शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुस्लिम, और दुर्भाग्य से हिन्दू हैं।
●●
आने वाले दौर में संघी वितरण के लिए छापी गयी पतली सी किताब "नेहरू खान वंश" के पृष्ठ 3 में, यह तथ्य स्वयं नेहरू के मुंह से बोलवा दिया गया।
फिर उनको मुसलमान भोजन ( मांसाहार) हिन्दू रसोई में बनवाकर, अंग्रेजी टेबल में खिलाकर, एकदम्मे स्वर्ग फीलिंग भी करवा दिया।
हमारे पुरखे मूर्ख नही थे। किसी ने तब इस बकवास पर ध्यान नही दिया।
●●
2014 के बाद जब धरती पर मूर्खता का स्वर्णयुग उतरा..
नारायण भास्कर खरे के बोल, नेहरू का कथन बनकर आपके व्हाट्सप ग्रुप में छा गए।
और यह पन्ना, पेंशनर अंकल, बेरोजगार छोकरो, और दो कौड़ी के ट्रोलू हिस्टोरियन्स के बीच स्वप्रमाणित, ऐतिहासिक तथ्य बन गया।
आज भी कमअक्ल लोग इसे तथ्य और सबूत के रूप में सोशल मीडिया पर चिपकाते फिरते हैं।
लानत है।
मैं शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुसलमान और दुर्भाग्य से हिन्दू हूँ...
भला कौन ही ऐसा पॉलिटिशियन होगा, जो खुद के लिए ऐसा कहेगा?? और भला ऐसी कौन सी पब्लिक होगी, जो इस तरह की बकवासों पर यकीन करती हो..
खैर, ये पब्लिक है। और उतना ही जानती है, जितना उसको व्हाट्सप पर सुबह सुबह बताया जाता है।
●●
एक थे खोटे साहब...
नही नाम तो उनका खरे था। नारायण भास्कर खरे... कर्मो से खोटे साबित हुए।
पर एक समय वे सचमुच खरे थे।
तब कांग्रेसी थे, असहयोग आंदोलन में जेल गए। जबलपुर की पैदाइश खरे, शिक्षा से डॉक्टर थे। बाकायदा पंजाब यूनिवर्सिटी से एमडी की डिग्री ली हुई थी।
पर रुचि राजनीति में थी। एक समय तरुण भारत के एडिटर रहे, जो उस जमाने मे पांचजन्य की तरह कांग्रेस के मुखपत्र जैसी थी।
उन्होंने गाँधीजी की पत्रिका हरिजन को भी उन्होंने एडिट किया। कांग्रेस से सेंट्रल असेम्बली के मेम्बर रहे। स्टेट असेम्बली के चेयरमैन रहे।
●●
1937 में चुनाव के बाद कांग्रेस की ओर से सरकार बनी, तो बीएन खरे, इसके पहले मुख्यमंत्री थे।
जी हां, लोग रविशंकर शुक्ल को पहला सीएम समझते हैं, वे दूसरे थे।
बहरहाल, नेहरू उस दौर में राज्यो में सरकारे बनाने के खिलाफ थे। 1936-39 का ये दौर कांग्रेस में फंडामेंटल चेंज का था। कई विचार थे, गुट थे, और कांग्रेस लेफ्ट और राइट में बंटी हुई थी। सरकारें बनने से राज्यो में पावर स्ट्रगल भी हो रहे थे।
तो साल भर के बाद ही, मुख्यमंत्री पद से खरे का पत्ता क्यूं कटा, मुझे नही पता। लेकिन इसके बाद खरे साहब खोटे हो गए।
●●
हिन्दू महासभा जॉइन कर ली और कांग्रेस को खरीखोटी सुनाने लगे। मगर उनका राजनीतिक ग्राफ गोता लगा गया। विधायकी तो 1942 तक चली, लेकिन फिर कभी वे चुनाव न जीते।
हिन्दू महासभा के वे अध्यक्ष भी बनाये गए, पर रूचा नही। वे अलवर रियासत में चले गए। वहां के प्रधानमंत्री बन गए, और फिर इस दौरान अलवर में मुसलमान विरोधी नीतियों से अच्छे खासे बदनाम हुए।
जो तब मेवात में मुसलमान छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे, ये अलवर और भरतपुर स्टेट का टेरर था। गांधी ने मेवात के गांव घसेड़ा में सभा कर, उन्हें रोका। पुकार सुनकर मेव लौट आये।
खरे के मुंह पर कालिख पुत गयी।
अलवर राज्य के प्रतिनिधि के रूप में, राजा ने उन्हें सम्विधान सभा मे नामित किया था। जिससे उन्होंने अधबीच में इस्तीफा दे दिया। दिल्ली लौट आये।
●●
नारायण भास्कर खरे के नाम एक रिकॉर्ड है। गांधी हत्या के बाद तमाम बड़े महासभाईयो के साथ वे भी नजरबंद हुए।
जब छूटे तो उनकी गतिविधियां ऐसी संदिग्ध थी, की दिल्ली के प्रशासक उन्हें पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत तड़ीपार कर दिया।
उन्हें तत्काल दिल्ली छोड़ने का आदेश दिया गया। तब तिरंगे और सम्विधान को मानने से इनकार करने वाले लोगो का ये नेता,...
अब सम्विधान पकड़कर आर्टिकल 19 के तहत, सिविल लिबर्टी का अपना अधिकार बचाने पहुँच गया।
विद्वान न्यायाधीशो ने सुना और कहा- चला जा @@$%#..
और तडिपारी अपहेल्ड रखी।
●●
इस तरह भारत मे संविधान के आर्टिकल 19 के वायलेशन का पहला केस, खारिज हुआ। यह रिकॉर्ड उनके नाम है।
कुंठा के समुद्र में डूबे खोटे साहब सन 70 तक जिये। एक बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की कोशिश की। पर्चा खारिज होने पर चुनाव आयोग पे केस ठोक दिया। हार गए।
इस कुंठा के दौर में में 1959 में उन्होंने एक लेख लिखा - द एंग्री एरिस्टोक्रेट..
लेख की शुरुआत नेहरू को महान नेता बताने से शकी। उसके बाद, संघी स्टाइल में इफ-बट- लेकिन - किंतु- परन्तु- अगर- मगर - बटर लगाया.. और खूब जहर उगला।
उस लेख में यह महान तथ्य लिखा कि - जवाहरलाल नेहरू असल मे शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुस्लिम, और दुर्भाग्य से हिन्दू हैं।
●●
आने वाले दौर में संघी वितरण के लिए छापी गयी पतली सी किताब "नेहरू खान वंश" के पृष्ठ 3 में, यह तथ्य स्वयं नेहरू के मुंह से बोलवा दिया गया।
फिर उनको मुसलमान भोजन ( मांसाहार) हिन्दू रसोई में बनवाकर, अंग्रेजी टेबल में खिलाकर, एकदम्मे स्वर्ग फीलिंग भी करवा दिया।
हमारे पुरखे मूर्ख नही थे। किसी ने तब इस बकवास पर ध्यान नही दिया।
●●
2014 के बाद जब धरती पर मूर्खता का स्वर्णयुग उतरा..
नारायण भास्कर खरे के बोल, नेहरू का कथन बनकर आपके व्हाट्सप ग्रुप में छा गए।
और यह पन्ना, पेंशनर अंकल, बेरोजगार छोकरो, और दो कौड़ी के ट्रोलू हिस्टोरियन्स के बीच स्वप्रमाणित, ऐतिहासिक तथ्य बन गया।
आज भी कमअक्ल लोग इसे तथ्य और सबूत के रूप में सोशल मीडिया पर चिपकाते फिरते हैं।
लानत है।
मैं शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुसलमान और दुर्भाग्य से हिन्दू हूँ...
भला कौन ही ऐसा पॉलिटिशियन होगा, जो खुद के लिए ऐसा कहेगा?? और भला ऐसी कौन सी पब्लिक होगी, जो इस तरह की बकवासों पर यकीन करती हो..
खैर, ये पब्लिक है। और उतना ही जानती है, जितना उसको व्हाट्सप पर सुबह सुबह बताया जाता है।
●●
एक थे खोटे साहब...
नही नाम तो उनका खरे था। नारायण भास्कर खरे... कर्मो से खोटे साबित हुए।
पर एक समय वे सचमुच खरे थे।
तब कांग्रेसी थे, असहयोग आंदोलन में जेल गए। जबलपुर की पैदाइश खरे, शिक्षा से डॉक्टर थे। बाकायदा पंजाब यूनिवर्सिटी से एमडी की डिग्री ली हुई थी।
पर रुचि राजनीति में थी। एक समय तरुण भारत के एडिटर रहे, जो उस जमाने मे पांचजन्य की तरह कांग्रेस के मुखपत्र जैसी थी।
उन्होंने गाँधीजी की पत्रिका हरिजन को भी उन्होंने एडिट किया। कांग्रेस से सेंट्रल असेम्बली के मेम्बर रहे। स्टेट असेम्बली के चेयरमैन रहे।
●●
1937 में चुनाव के बाद कांग्रेस की ओर से सरकार बनी, तो बीएन खरे, इसके पहले मुख्यमंत्री थे।
जी हां, लोग रविशंकर शुक्ल को पहला सीएम समझते हैं, वे दूसरे थे।
बहरहाल, नेहरू उस दौर में राज्यो में सरकारे बनाने के खिलाफ थे। 1936-39 का ये दौर कांग्रेस में फंडामेंटल चेंज का था। कई विचार थे, गुट थे, और कांग्रेस लेफ्ट और राइट में बंटी हुई थी। सरकारें बनने से राज्यो में पावर स्ट्रगल भी हो रहे थे।
तो साल भर के बाद ही, मुख्यमंत्री पद से खरे का पत्ता क्यूं कटा, मुझे नही पता। लेकिन इसके बाद खरे साहब खोटे हो गए।
●●
हिन्दू महासभा जॉइन कर ली और कांग्रेस को खरीखोटी सुनाने लगे। मगर उनका राजनीतिक ग्राफ गोता लगा गया। विधायकी तो 1942 तक चली, लेकिन फिर कभी वे चुनाव न जीते।
हिन्दू महासभा के वे अध्यक्ष भी बनाये गए, पर रूचा नही। वे अलवर रियासत में चले गए। वहां के प्रधानमंत्री बन गए, और फिर इस दौरान अलवर में मुसलमान विरोधी नीतियों से अच्छे खासे बदनाम हुए।
जो तब मेवात में मुसलमान छोड़कर पाकिस्तान जा रहे थे, ये अलवर और भरतपुर स्टेट का टेरर था। गांधी ने मेवात के गांव घसेड़ा में सभा कर, उन्हें रोका। पुकार सुनकर मेव लौट आये।
खरे के मुंह पर कालिख पुत गयी।
अलवर राज्य के प्रतिनिधि के रूप में, राजा ने उन्हें सम्विधान सभा मे नामित किया था। जिससे उन्होंने अधबीच में इस्तीफा दे दिया। दिल्ली लौट आये।
●●
नारायण भास्कर खरे के नाम एक रिकॉर्ड है। गांधी हत्या के बाद तमाम बड़े महासभाईयो के साथ वे भी नजरबंद हुए।
जब छूटे तो उनकी गतिविधियां ऐसी संदिग्ध थी, की दिल्ली के प्रशासक उन्हें पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत तड़ीपार कर दिया।
उन्हें तत्काल दिल्ली छोड़ने का आदेश दिया गया। तब तिरंगे और सम्विधान को मानने से इनकार करने वाले लोगो का ये नेता,...
अब सम्विधान पकड़कर आर्टिकल 19 के तहत, सिविल लिबर्टी का अपना अधिकार बचाने पहुँच गया।
विद्वान न्यायाधीशो ने सुना और कहा- चला जा @@$%#..
और तडिपारी अपहेल्ड रखी।
●●
इस तरह भारत मे संविधान के आर्टिकल 19 के वायलेशन का पहला केस, खारिज हुआ। यह रिकॉर्ड उनके नाम है।
कुंठा के समुद्र में डूबे खोटे साहब सन 70 तक जिये। एक बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की कोशिश की। पर्चा खारिज होने पर चुनाव आयोग पे केस ठोक दिया। हार गए।
इस कुंठा के दौर में में 1959 में उन्होंने एक लेख लिखा - द एंग्री एरिस्टोक्रेट..
लेख की शुरुआत नेहरू को महान नेता बताने से शकी। उसके बाद, संघी स्टाइल में इफ-बट- लेकिन - किंतु- परन्तु- अगर- मगर - बटर लगाया.. और खूब जहर उगला।
उस लेख में यह महान तथ्य लिखा कि - जवाहरलाल नेहरू असल मे शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुस्लिम, और दुर्भाग्य से हिन्दू हैं।
●●
आने वाले दौर में संघी वितरण के लिए छापी गयी पतली सी किताब "नेहरू खान वंश" के पृष्ठ 3 में, यह तथ्य स्वयं नेहरू के मुंह से बोलवा दिया गया।
फिर उनको मुसलमान भोजन ( मांसाहार) हिन्दू रसोई में बनवाकर, अंग्रेजी टेबल में खिलाकर, एकदम्मे स्वर्ग फीलिंग भी करवा दिया।
हमारे पुरखे मूर्ख नही थे। किसी ने तब इस बकवास पर ध्यान नही दिया।
●●
2014 के बाद जब धरती पर मूर्खता का स्वर्णयुग उतरा..
नारायण भास्कर खरे के बोल, नेहरू का कथन बनकर आपके व्हाट्सप ग्रुप में छा गए।
और यह पन्ना, पेंशनर अंकल, बेरोजगार छोकरो, और दो कौड़ी के ट्रोलू हिस्टोरियन्स के बीच स्वप्रमाणित, ऐतिहासिक तथ्य बन गया।
आज भी कमअक्ल लोग इसे तथ्य और सबूत के रूप में सोशल मीडिया पर चिपकाते फिरते हैं।
लानत है।
