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omukh-Tapovan is one the best treks in India. During the trek one can get a mighty view of Mt. Shivling right from base to its summit.
Region: Uttarkashi, Uttarakhand

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पूज्य पिताश्री स्व. हरिश्चंद्र श्रीवास्तव 'हरीश जी' ने अपना पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले जनसेवा को समर्पित किया। उनके 76 वर्षों के सामाजिक जीवन का प्रत्येक दिन जनता-जनार्दन के लिए चिंतन में बीता।
हमें भली-भांति स्मरण है कि 18 जनवरी 2015, जिस दिन उन्होंने परलोक गमन किया था। उस दौरान हम लोग प्रतिदिन रात 10 बजे से 2 तक सेवा बस्तियों में घर-घर जाकर कंबल पहुंचाते थे। थोड़े से कंबल बचे हुए थे, जिन पर पूज्य पिताश्री की नजर पड़ गई और 17 जनवरी की रात्रि लगभग 9 बजे, हमारे घर लौटते ही उन्होंने बचे हुए कंबल बांटने जाने का निर्देश दिया। जीवन की अंतिम रात्रि भी वह लोगों को ठंड से बचाने की चिंता कर रहे थे।
इसीलिए उनकी पुण्यतिथि पर हमनें काशी में सेवा के सबसे बड़े केंद्र "अपना घर आश्रम" जाने का निर्णय लिया। हमनें उनसे जुड़े लगभग सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को वहां बुलाने का प्रयास किया जिसमें सफलता भी मिली। सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उनसे जुड़े प्रसंग सुनाए। वहां उपस्थित युवा कार्यकर्ताओं को निश्चित रूप से अच्छा मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
हम सभी खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही जाना है। यहां जो मिला है यही छोड़ जाना है। अतः जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जीना चाहिए। यही पिताजी के जीवन वृत्त का संदेश था और यही हमारा भी आप सभी से निवेदन है।
पूज्य पिताश्री को शत-शत नमन।

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पूज्य पिताश्री स्व. हरिश्चंद्र श्रीवास्तव 'हरीश जी' ने अपना पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले जनसेवा को समर्पित किया। उनके 76 वर्षों के सामाजिक जीवन का प्रत्येक दिन जनता-जनार्दन के लिए चिंतन में बीता।
हमें भली-भांति स्मरण है कि 18 जनवरी 2015, जिस दिन उन्होंने परलोक गमन किया था। उस दौरान हम लोग प्रतिदिन रात 10 बजे से 2 तक सेवा बस्तियों में घर-घर जाकर कंबल पहुंचाते थे। थोड़े से कंबल बचे हुए थे, जिन पर पूज्य पिताश्री की नजर पड़ गई और 17 जनवरी की रात्रि लगभग 9 बजे, हमारे घर लौटते ही उन्होंने बचे हुए कंबल बांटने जाने का निर्देश दिया। जीवन की अंतिम रात्रि भी वह लोगों को ठंड से बचाने की चिंता कर रहे थे।
इसीलिए उनकी पुण्यतिथि पर हमनें काशी में सेवा के सबसे बड़े केंद्र "अपना घर आश्रम" जाने का निर्णय लिया। हमनें उनसे जुड़े लगभग सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को वहां बुलाने का प्रयास किया जिसमें सफलता भी मिली। सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उनसे जुड़े प्रसंग सुनाए। वहां उपस्थित युवा कार्यकर्ताओं को निश्चित रूप से अच्छा मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
हम सभी खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही जाना है। यहां जो मिला है यही छोड़ जाना है। अतः जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जीना चाहिए। यही पिताजी के जीवन वृत्त का संदेश था और यही हमारा भी आप सभी से निवेदन है।
पूज्य पिताश्री को शत-शत नमन।

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पूज्य पिताश्री स्व. हरिश्चंद्र श्रीवास्तव 'हरीश जी' ने अपना पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले जनसेवा को समर्पित किया। उनके 76 वर्षों के सामाजिक जीवन का प्रत्येक दिन जनता-जनार्दन के लिए चिंतन में बीता।
हमें भली-भांति स्मरण है कि 18 जनवरी 2015, जिस दिन उन्होंने परलोक गमन किया था। उस दौरान हम लोग प्रतिदिन रात 10 बजे से 2 तक सेवा बस्तियों में घर-घर जाकर कंबल पहुंचाते थे। थोड़े से कंबल बचे हुए थे, जिन पर पूज्य पिताश्री की नजर पड़ गई और 17 जनवरी की रात्रि लगभग 9 बजे, हमारे घर लौटते ही उन्होंने बचे हुए कंबल बांटने जाने का निर्देश दिया। जीवन की अंतिम रात्रि भी वह लोगों को ठंड से बचाने की चिंता कर रहे थे।
इसीलिए उनकी पुण्यतिथि पर हमनें काशी में सेवा के सबसे बड़े केंद्र "अपना घर आश्रम" जाने का निर्णय लिया। हमनें उनसे जुड़े लगभग सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को वहां बुलाने का प्रयास किया जिसमें सफलता भी मिली। सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने उनसे जुड़े प्रसंग सुनाए। वहां उपस्थित युवा कार्यकर्ताओं को निश्चित रूप से अच्छा मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
हम सभी खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही जाना है। यहां जो मिला है यही छोड़ जाना है। अतः जीवन सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए जीना चाहिए। यही पिताजी के जीवन वृत्त का संदेश था और यही हमारा भी आप सभी से निवेदन है।
पूज्य पिताश्री को शत-शत नमन।

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भारत हमेशा से ही अपनी अनोखी संस्कृति, आर्किटेक्चर और कलाओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता हैं। यही चीजें इस देश को इनक्रेडिबल बनाती हैं। ऐसी ही एक इनक्रेडिबल कला है सुनहरी घास से बनाई जाने वाली बिहार की सिक्की शिल्प कला, जो न केवल बिहार बल्कि पूरे भारत का गौरव है।
यह कला पिछले लगभग 400 साल से चली आ रही हैं। इस शिल्प का उपयोग शुरू में दैनिक उपयोग के लिए टोकरियों और चटाई जैसी घरेलू वस्तुएँ बनाने के लिए किया जाता था। लेकिन अब इससे विभिन्न प्रकार के सजावटी समान बनाएँ जाते हैं। इस शिल्प कला को सिक्की नाम की घास से बनाया जाता है इस इसलिए इसे सिक्की शिल्प कला कहते हैं। यह घास बिहार के नमी वाले क्षेत्रों में पाई जाती है, यह मानसून के समय में आसानी से उग जाती हैं। इससे समान बनाने के लिए पहले इसे सुखाया जाता हैं फिर 'सिक्की जाली' नामक उपकरण से इसे धागों का रूप दिया जाता है। जिसके बाद हाथों से बुनाई कर इससे अलग अलग आकार की वस्तुएँ बनाई जाती हैं जैसे- टोकरी, ट्रे, कोस्टर, बक्से, पेन स्टैंड आदि। इसके बाद इन्हें मोतियों, शीशों और रंगों से सजाया जाता हैं।
बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सीतामढी और समस्तीपुर में आज भी इस कला से बहुत सी वस्तुओं का निर्माण किया जाता हैं। इस शिल्प कला से समान बनाने का काम अधिकतर महिलाएं ही करती हैं। आज इससे बनें सामान न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी भेजें जा रहे। साथ ही इस कला को GI टैग मिल चुका हैं।

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लगान फिल्म का कचरा तो आपको याद हीं होगा। इस फिरकी गेंदबाज ने हैट्रिक लेकर अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इस फिल्म में कचरा का किरदार अमीन हाजी ने निभाया था इस फिल्म के बाद अमीन हाजी को ज्यादा लाइमलाइट नहीं मिली। ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज होने वाली कई वेब सीरीज में लेकिन वह अपनी एक्टिंग का जलवा दिखा चुके हैं। सालो बाद अब इस अभिनेता का लुक पूरी तरह से बदल चुका है। हाल ही में उनकी नई तस्वीरों में वह बिल्कुल पहचान में नहीं आ रहे हैं। अमीन हाजी ने लगान फिल्म में ही काम करने वाले एक विदेशी कलाकार की बहन के साथ शादी की थी।

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