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राम मंदिर के लिए 30 साल तक मौन रहीं सरस्वती देवी।
22 जनवरी को अयोध्या में तोड़ेंगी व्रत।
धनबाद की सरस्वती देवी अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को स्वामी नृत्य गोपाल दास से मिलीं।
उनकी प्रेरणा से मौन व्रत धारण किया, संकल्प लिया कि जिस दिन राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होगी, उसी दिन मौन तोड़ेंगी।
जय श्रीराम 🙏⛳

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चक्रवर्ती विक्रमादित्य...।।।।।।।
कलि काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य मालव का जन्म हुआ। उन्होंने 100 वर्ष तक राज किया।
विक्रमादित्य मालव ईसा मसीह के समकालीन थे और उस वक्त उनका शासन अरब तक फैला था। विक्रमादित्य मालव के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में भी वर्णन मिलता है। नौ रत्नों की परंपरा उन्हीं से शुरू होती है। विक्रमादित्य मालव उस काल में महान व्यक्तित्व और शक्ति का प्रतीक थे।
विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला था और संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे। विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य मालव अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।
देश में अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं, जो विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य मालव द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। इसके अनुसार विक्रमादित्य मालव ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। नेपाली राजवंशावली अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के समय (ईसापूर्व पहली शताब्दी) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य मालव के नेपाल आने का उल्लेख मिलता है।
भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्की, अफ्रीका, सऊदी अरब, नेपाल, थाईलैंड, इंडोनेशिया, कमबोडिया, श्रीलंका, चीन का बड़ा भाग इन सब प्रदेशो पर विश्व के बड़े भूभाग पर था ओर इतना ही नही सम्राट विक्रमादित्य मालव ने रोम के राजाओं को हराकर विश्व विजय भी कर लिया था।
"यो रूमदेशाधिपति शकेश्वरं जित्वा "।।
अर्थ: उन्होंने रोम के राजा और शक राजाओं को जीता। कुल मिलाकर 95 देश जीतें। आज भारत मे प्रजातंत्र है, लेकिन भारत में शांति नही है लेकिन इस प्रजातंत्र की नींव डालने की शुरुवात ही खुद महान राजा विक्रमादित्य ने की थी विक्रमादित्य की सेना का सेनापति प्रजा चुनती थी।
वह प्रजा द्वारा चुना हुआ धर्माध्यक्ष होता था प्रजा द्वारा अभिषिक्त निर्णायक होता था आज के समय मे अमरीका और रूस के राष्ट्रपति की जो शक्ति है वही शक्ति महाराज विक्रमादित्य मालव के सेनापति की होती थी। लेकिन यह सब भी अपना परम् वीर विक्रम को ही मानते थे। महाराज विक्रम ने भी अपने आप को शासक नही, प्रजा का सेवक मात्र घोषित कर रखा था।
महाराज विक्रम बहुत ही शूरवीर और दानी थे। शुंग वंश के बाद पंजाब के रास्ते से शकों ने भारत को तहस नहस कर दिया था लेकिन वीर विक्रम ने इन शकों को पंजाब के रास्ते से ही वापस भगाया। पुष्यमित्र शुंग की मृत्यु के बाद जो भारतीय असंगठित होकर शकों का शिकार हो रहे थे उन भारतीय को जीवन मंत्र देकर महाराज विक्रम ने विजय का शंख फूंककर पूरे भारत को संगठित कर दिया।
महाराजा वीर विक्रम जमीन पर सोते थे अल्पाहार लेते थे वे केवल योगबल पर अपने शरीर को वज्र सा मजबूत बनाकर रखते थे। इन्होंने महान सनातन राष्ट्र की स्थापना कर सनातन धर्म का डंका पुनः बजाया था।
महाभारत के युद्ध के बाद वैदिक धर्म का दिया लगभग बुझ गया था, हल्का सा टिमटिमा मात्र रहा था। इस युद्ध के बाद भारत की वीरता, कला, साहित्य, संस्कृति सब कुछ मिट्टी में मिल गयी थी।
ऐसा भी एक समय आया जब सारे भारतीय ही "अहिंसा परमोधर्म" वाला बाजा बजा रहे थे। विदेशों से हमले हो रहे थे ओर हम अहिंसा में पंगु होकर बैठ गये भारत के अस्ताचल से सत्य सनातन धर्म के सूर्य का अस्त होने को चला था। प्रजा दुखी थी, विदेशी शक, हूण, कुषाण शासकों के आक्रमणों से त्राहि त्राहि मची थी। ऐसे महान विपत्तिकाल में "धर्म गौ ब्राह्मण हितार्थाय" की कहानी को चरितार्थ करने वाला प्रजा की रक्षा करने वाला, सत्य तथा धर्म का प्रचारक वीर पराक्रमी विक्रम मालव पैदा हुए।
इनके पराक्रम का अंदाजा इस बात से लगा सकते है कि जावा सुमात्रा तक के सुदूर देशों तक इन्होंने अपने सेनापति नियुक्त कर रखे थे।
उत्तर पश्चिमी शकों का मान मर्दन करने के लिए मुल्तान के पास जागरूर नाम की जगह पर महाराज विक्रम और शकों के भयानक युद्ध हुआ। विशेषकर राजपुताना के उत्तरपश्चिमी राज्य में शकों ने उत्पात मचा रखा था। मुल्तान में विक्रम की सेना से परास्त होकर शक जंगलो में भाग गए उसके बाद इन्होंने फिर कभी आंख उठाने की हिम्मत नही की लेकिन उनकी संतान जरूर फिर से आती रही।
विक्रमादित्य मालव के काल के सिक्कों पर "जय मालवाना" लिखा होता था विक्रमादित्य के मातृभूमि से प्रेम से इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है सिक्को पर अपना नाम न देकर अपनी मातृभूमि का नाम दिया।
आज हमारी सनातन संस्कृति केवल विक्रमादित्य मालव के कारण अस्तित्व में है अशोक मौर्य ने बोद्ध धर्म अपना लिया था और बोद्ध बनकर 25 साल राज किया था। भारत में तब सनातन धर्म लगभग समाप्ति पर आ गया था।
जब रामायण, और महाभारत जैसे ग्रन्थ खो गए थे, महाराज विक्रम ने ही पुनः उनकी खोज करवा कर स्थापित किया। विष्णु और शिव जी के मंदिर बनवाये और सनातन धर्म को बचाया।

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सिखों का प्रतीक चिन्ह - दरअसल शिवजी ( अर्धनारीश्वर ) का ही एक प्रतीक है । यही चिन्ह ईरान ग्रीक आदि देशों का हुआ करता था, चीन के काफी क्षेत्रो में भी इसका प्रयोग होता था ।।
यह मूर्ति भारत के चोल राजवंश के शासनकाल के समय की है । चोल राजवंश जब खत्म हो गया था, तब भी सिख पंथ का जन्म तो क्या, चर्चा तक नही हुई थी।
सिखों को हिंदुओ से अलग मानना मूर्खता है, आज सिख हिन्दू आमने सामने खड़े है, यह किसी ओर का नही, देवो का, सनातन धर्म का ही दुर्भाग्य है।

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धार्मिक अनुष्ठानों में कुश (दर्भ) नामक घास से निर्मित आसान बिछाया जाता है। पूजा पाठ आदि कर्मकांड करने से व्यक्ति के भीतर जमा आध्यात्मिक शक्ति पुंज का संचय कहीं लीक होकर पृथ्वी में न समा जाए, उसके लिए कुश का आसन विद्युत कुचालक का कार्य करता है।

कुश की महिमा इतनी की भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को कुशग्रहणी अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है।

कुशग्रहणी अमावस्या के दिन वर्ष भर किए जाने वाले धार्मिक कामों तथा श्राद्ध आदि कामों के लिए कुश (एक विशेष प्रकार की घास, जिसका उपयोग धार्मिक व श्राद्ध आदि कार्यों में किया जाता है) एकत्रित किया जाता है। हिंदुओं के अनेक धार्मिक क्रिया-कलापों में कुश का उपयोग आवश्यक रूप से होता है-

पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया।।
(शब्दकल्पद्रुम)

अत: प्रत्येक गृहस्थ को इस दिन कुश का संचय (इकट्‌ठा) करना चाहिए। शास्त्रों में दस प्रकार के कुशों का वर्णन मिलता है-

कुशा: काशा यवा दूर्वा उशीराच्छ सकुन्दका:।
गोधूमा ब्राह्मयो मौन्जा दश दर्भा: सबल्वजा:।।

इनमें से जो भी कुश इस तिथि को मिल जाए, वही ग्रहण कर लेना चाहिए। जिस कुश में पत्ती हो, आगे का भाग कटा न हो और हरा हो, वह देव तथा पितृ दोनों कार्यों के लिए उपयुक्त होता है। कुश निकालने के लिए इस तिथि को सूर्योदय के समय उपयुक्त स्थान पर जाकर पूर्व या उत्तराभिमुख बैठकर यह मंत्र पढ़ें और दाहिने हाथ से एक बार में कुश उखाड़ें-

विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव।।

धार्मिक अनुष्ठानों में कुश नाम की घास से बना आसन बिछाया जाता है। पूजा-पाठ आदि कर्मकांड करने से इंसान के अंदर जमा आध्यात्मिक शक्ति पुंज का संचय पृथ्वी में न समा जाए, उसके लिए कुश का आसन वि्द्युत कुचालक का काम करता है। इस आसन के कारण पार्थिव विद्युत प्रवाह पैरों से शक्ति को खत्म नहीं होने देता है। कहा जाता है कि कुश के बने आसन पर बैठकर मंत्र जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं।

कुश धारण करने से सिर के बाल नहीं झड़ते और छाती में आघात यानी दिल का दौरा नहीं होता। उल्लेखनीय हे कि वेद ने कुश को तत्काल फल देने वाली औषधि, आयु की वृद्धि करने वाला और दूषित वातावरण को पवित्र करके संक्रमण फैलने से रोकने वाला बताया है।

पूजा पाठ के समय कुश की पवित्री पहनना जरूरी है।धर्म मे कुश की अंगुठी बनाकर अनामिका उंगली मे पहनने का विधान है। ताकि हाथ में संचित आध्यात्मिक शक्ति पुंज दूसरी उंगलियों में न जाए, क्योंकि अनामिका के मूल में सूर्य का स्थान होने के कारण यह सूर्य की उंगली है। सूर्य से हमें जीवनी शक्ति, तेज और यश मिलता है। दूसरा कारण इस ऊर्जा को पृथ्वी में जाने से रोकता है।

कर्मकांड के दौरान यदि भूल से हाथ जमीन पर लग जाए तो बीच में कुश का ही स्पर्श होगा। इसलिए कुश को हाथ में ही धारण किया जाता है। इसके पीछे मान्यता यह है कि हाथ की ऊर्जा की रक्षा न की जाए, तो इसका बुरा असर हमारे दिल और दिमाग पर पड़ता है।

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पानी और तमन्नाओं की तासीर ...
एक जैसी होती है..
मुकम्मल चाहिए.....
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© असलियत यही है।
आप जानते भी हो अच्छे से यह सब
बावजूद इसके भी --- हम बार बार इसे कहते रहेंगे और भांति भांति के संदर्भों, घटनाओं व दृष्टांतों के सहारे इसे निरूपित करते रहेंगे साथियों ----
[ ••• राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान एक भी मुस्लिम नेता चाहे वह मुस्लिम लीग का जेहादीकरण करने वाला मुहम्मद अली जिन्ना हो, रहमत अली हो, अल्लामा इक़बाल हो, चौधरी खलीकुज्जमा हो ---- किसी के पास भारत विभाजन किए जाने का ठोस सैद्धांतिक विचार उनके लेखों या कृतियों में आपको नहीं मिलेगा।
इन सबमें तथा मुस्लिम लीग के समस्त नेताओं और इस्लामी मौलवियों, मौलानाओं में इस्लामी अहंकार का तर्क छोड़ कुछ नहीं मिलेगा आपको।
चौधरी रहमत अली हो, आगा खान हो, मुहम्मद अली जिन्ना हो, इकबाल हो, इनकी रचनाओं और भाषणों में सिर्फ एक जिद और मुहावरा बार बार मिलेगा जिसे सातवीं सदी से इसलामी मौलानाओं और इसके आक्रांताओं ने स्थापित कर रखा है।
वह जिद यही है कि इस्लाम ही एकमात्र सच है, जिसे दुनिया के ऊपर साम्राज्य कायम करने का खुदाई अधिकार है।
अतः राज तो मुसलमान ही करेंगे,
अभी यदि पूरे हिन्दुस्तान में नहीं तो फिलहाल जितना हिस्सा अलग करके कर सकते हैं।
इसके अलावा पाकिस्तान के लिए कोई तर्क इस्लामी सिद्धांतकारों के पास नहीं था।
नीच और नराधम कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने सच्चाई के एकदम विपरीत "असुरक्षा के तर्क का अतिरिक्त हथियार" इस मुस्लिम जमात को अलग से पकड़ा और रखा है और अनुभवी, धूर्त योद्धा की तरह इसलामी प्रतिनिधियों ने इसे अपने जखीरे में रख भी लिया है।
जरूरत पड़ने पर इस हथियार को वे बखूबी तरीके से अपने परम अज्ञानी हिन्दू शिक्षित वर्ग के नुमाइंदे --- अंग्रेजी पत्रकारों के सामने जमकर प्रयुक्त करते हैं और उनके वक्तव्यों की वैधता लेकर अपना मूलभूत एजेंडा आगे बढ़ाते रहते हैं।
भारत में इस्लामी जनमत के इस देशविरोधी तबके की तरफ से कुतर्क और लंतरानी पेलने का काम अर्हनिश भाव से मार्क्सवादियों ने सदैव जारी रखा है।
यह बात हरेक अध्येता को ठीक से पता होनी चाहिए कि, इतिहास के भीतर इस्लाम ने अपने जन्मकाल के समय से लेकर आज की तारीख के बीच तक कभी अपनी बात को शब्द और तर्क से रखना नहीं सीखा है।
अपने जन्म के समय भी, स्वयं मक्का में ही, छल, धूर्तता और बल के उपयोग से ही स्थानीय लोगों को इस्लाम के झण्डे तले लाया गया था।
विचार और विवेक से लोगों को कायल कर सकने की स्थिति उसमे न तब थी न अब है।
इस्लाम को केवल ताकत की भाषा आती है।
अपनी जन्मभूमि ही नहीं, वहां से दूर देशों में भी उसे केवल तलवार या सत्ता के बल पर ही फैलाया गया।
यह एक सामान्य तथ्य है जिसे इसलामी विद्वान और नेता गर्व से स्वीकार करते रहे हैं।
मुहम्मद गोरी के तुर्क गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली में हिंदू मन्दिर को ध्वस्त करके जो तथाकथित कुतुबमीनार बनाई गई, उसे नाम दिया गया था ---- कुव्वत उल इस्लाम अर्थात इसलाम की ताकत।
तबसे शतियां बीत गई।
इस्लाम का यह मुख्य गुणधर्म यथावत रहा है।
इसीलिए उन्नीसवीं बीसवीं शती में मौलाना हाली और अल्लामा इकबाल जैसे प्रसिद्ध कवि, चिंतक, रचनाकारों ने भी इसलामी तलवार के ही गुण गाए थे।
ताकत के अलावा उसमें किसी गुण का उल्लेख नहीं है।
आज भी एम जे अकबर जैसे प्रतिभावान मुस्लिम लेखक भी तलवार के ही रंग("शेड ऑफ स्वॉर्ड्स" को देखते हैं।
सबसे बडे़ इमाम और आलिम मुख्यत: ताकत और धमकी की ही भाषा बोलते हैं।
इसलाम का यही अंदाज सारी दुनिया में रहा है।
शुरू से लेकर आज तक, हर कहीं ताकत और तलवार की शब्दावली पर बल देना किसी तरह संयोग नहीं है।
न यह कोई प्रतिरक्षात्मक अंदाज है।
इसलाम सदैव ताकत, वह भी आक्रमण की ताकत, की भाषा में बोलता रहा है।
यह चुनी हुई बातें नहीं, पूरा इतिहास है।
पाकिस्तान बनाने की जिद किसी भी तरह का तर्क या विचार विमर्श करके नहीं, बल्कि 1946 के "डायरेक्ट एक्शन" की ताकत और कलकत्ता की सड़कों पर खूनी खेल दिखाकर, भयंकर दहशत पैदा करके पूर्ण की गई थी।
मुसलमान राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर में उत्पीड़ित नहीं, बल्कि खुद को मुग़ल शासन के उत्तराधिकारी के तौर पर सदियों से अपने को हिन्दुस्तान का शासक समझते थे।
मुस्लिम लीग और उसके नेताओं का तर्क यही था कि जिन हिंदुओं को अंगूठे के नीचे दबाकर रखा, उनके साथ बराबरी कैसी या उनके बहुमत में बनी सरकार के भीतर कैसे हम रह सकते हैं।
कांग्रेस का तथाकथित राष्ट्रवादी मुस्लिम चेहरा और गांधी नेहरू का दाहिना हाथ तथा भारत का प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद पाकिस्तान बनने से मात्र इसलिए दुखी रहता था क्योंकि उसका बड़ा उद्देश्य था ---- संपूर्ण हिन्दुस्तान का इस्लामीकरण धीरे धीरे करना।
वह इस बात को कहता भी था कि हमारे पूर्वजों ने हिन्दुस्तान में 700 वर्ष राज किया है, इसका एक एक कोना उन्होंने अपने शौर्य और भुजाओं के बल पर विजित किया है, हम हिन्दुस्तान को यूं ही नहीं छोड़ देंगे...!

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