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महाभारत शांतिपर्व में भीष्म पितामह के श्रीमुख से राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसाधर्मकी प्रशंसा तथा चिरकारीका उपाख्यान
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर ! राजा विचख्नुने प्राणियोंपर दया करनेके विषयमें जो कुछ कहा है, वह प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।
एक समय किसी यज्ञशालामें राजाने देखा कि बैलकी गर्दन कटी हुई है और वहाँ बहुत-सी गौएँ आर्तनाद कर रही हैं। हिंसाकी यह क्रूर प्रवृत्ति देखकर राजासे नहीं रहा गया; वे अपना निश्चित सिद्धान्त इस प्रकार सुनाने लगे, 'ओह ! बेचारी गौएँ बड़ा कष्ट पा रही हैं, इनकी हत्या न करो। संसारकी समस्त गौओंका कल्याण हो। जो धर्मकी मर्यादासे भ्रष्ट हो चुके हैं, मूर्ख हैं, जिन्हें आत्मतत्त्वके विषयमें भारी संदेह है तथा जो छिपे हुए नास्तिक हैं, उन्हीं लोगोंने हिंसाका समर्थन किया है।
मनुष्य अपनी ही इच्छासे यज्ञवेदीपर पशुओंका बलिदान करते हैं। धर्मात्मा मनुने तो सब कर्मोंमें अहिंसाकी ही प्रशंसा की है; इसलिये विज्ञ पुरुषको वैदिक प्रमाणसे धर्मके सूक्ष्म स्वरूपका निर्णय करके उसका पालन करना चाहिये। किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही सब धर्मोंसे श्रेष्ठ माना गया है। मिताहारी होकर कठोर नियमोंका पालन करे, वेदकी फल-श्रुतियोंमें आसक्त न होकर उनका त्याग करे, आचारके नामपर अनाचारमें प्रवृत्त न हो।
कृपण मनुष्य ही फलकी इच्छा करते हैं। यज्ञमें मद्य, मांस और मीन आदिका उपयोग धूर्तोंका चलाया हुआ है। वेदोंमें इसकी कहीं भी चर्चा नहीं है। लोग मान, मोह और लोभके वशीभूत होकर जिह्वाकी लोलुपताके कारण निषिद्ध वस्तुओंको खाते-पीते हैं। श्रोत्रिय ब्राह्मण तो सम्पूर्ण यज्ञोंमें भगवान् विष्णुका ही आविर्भाव मानते हैं और पुष्प तथा खीर आदिसे उनकी पूजा करते हैं।
वेदोंमें जो यज्ञसम्बन्धी वृक्ष बताये गये हैं, उन्हींका हवनमें उपयोग होता है। शुद्ध चित्तवाले सत्त्वगुणी पुरुष अपनी विशुद्ध भावनासे प्रोक्षण आदिके द्वारा संस्कार करके जिस हविष्यको तैयार करते हैं, वही देवताओंको अर्पण करनेके योग्य होता है।