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एक तरफ मुख्तार अंसारी का जनाज़ा गाजीपुर के कालीबाग कब्रिस्तान पहुंचा और डीएम साहिबा और अफजाल अंसारी के बीच तीखी बहस चल रही थी !!
तो दूसरी तरफ मुख्तार की मौत की जांच के लिए गठित टीम #बांदा #जेल पहुंची है !!
टीम में जिला जज के साथ बांदा के डीएम, एसपी और जेलर भी हैं..
खेल अभी खत्म नहीं हुआ है !!

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नेहरु के पाप
Dynasty lickers historians like romila thapar etc

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मैं आपके विचारों से सहमत हूँ।
मज़ेदार बात ये है कि इन वामपंथियों ने हमारी आरती की किताबों में भी घुसपैठ कर ली है। इसलिए केवल और केवल गीता प्रेस से ही धार्मिक ग्रंथ लेने चाहिए।

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एक बहुत बड़ा झूठ....
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कितना बड़ा मजाक किया गया भारत वर्ष के इतिहास के साथ....

लेख साभार एक लेखक की यात्रा गाथा से.....
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एक बार मेरा मित्र अपने दोस्तों के साथ हिमाचल के पालमपुर से होकर ट्रेकिंग पर जा रहे थे, मार्ग में माँ भगवती ज्वाला जी का प्रसिद्ध मंदिर आता है, जोकि कांगड़ा नगर से 30 किलो मीटर दूर एक नदी के तट पर है। हमने सोचा चलो माँ भगवती के दर्शन करते हुए चलते हैं....
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मंदिर अति प्राचीन और हम हिन्दुओं की 51 शक्ति पीठ में से एक है। मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है। एक बड़े से हाल जैसे स्थान पर भूमि से अलग-अलग स्थानों पर 9 स्थानों पर ज्वाला प्रकट हो रही है। उसे ही माँ का स्वरूप मान कर हम हिन्दू उनकी पूजा करते हैं....
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वैसे तो अनेक कहानियाँ हैं इस मंदिर के इतिहास और मान्यता पर, किन्तु मंदिर के सूचना पट पर एक लिखी हुई सूचना को पढने के बाद मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ....
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उस पर लिखा है कि एक बार अकबर इस मंदिर के दर्शन करने आया था , उसने मंदिर में जलती ज्वाला को बुझाने के लिए अपने लोगों को लगाया, किन्तु ज्वाला जब नहीं बुझी तो माता के चमत्कार से प्रभावित होकर अकबर नंगे पैर माँ के दर्शन करने आया, और माता पर सोने का छत्र चढाया, साथ ही मंदिर को कई सौ बीघा भूमि दान दी।
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मुझे उस लिखित सूचना पर विश्वास नहीं हो रहा था, मैंने वहां के पुजारियों, और अन्य अधिकारियों से इस विषय पर बात की किन्तु सभी ने एक सा ही उत्तर दिया की ये सब सत्य लिखा है....
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पर मुझे भली भांति ज्ञात था कि अकबर मूर्ति भंजक था, उसने हिन्दू धर्म को मिटाने के अनेक प्रयास किये थे। जो इतिहास में लिखे हैं। वो क्रूर इस्लामी जिहादी किसी हिन्दू आस्था पर कभी श्रद्धा नहीं दिखा सकता था....
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जो अकबर अपने अहंकार और इस्लामी जिहादी फितूर के कारण मेवाड़ को तबाह करने के मनसूबे रखता हों...! जो एक ही दिन में चित्तोड़ो दुर्ग के पास 30 हजार साधारण नागरिकों को केवल हिन्दू होने कारण क़त्ल करवा सकता है वो किसी हिन्दू आस्था पर सोने का छत्र चढ़ाएगा.... ये संभव ही नहीं...!
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मैंने अपनी जिज्ञासा की पूर्ति के लिए प्रयास जारी रखे। मेरे मित्र थके हुए थे, इसलिए वे आगे पालमपुर होटल चले गए, और मैं मंदिर में सत्य की खोज पर निकल पड़ा ..!
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बहुत प्रयास करने पर भी कोई सूत्र हाथ नहीं आ रहा था, तभी वहां सुरक्षा में तैनात एक हिमाचल के महानुभाव जो कि भारतीय सेना से सेवा निवृत्य भाई है। उन्होंने मेरी जिज्ञासा को समझा और मुझे लेकर परिसर के पास अपने निवास पर आये। मुझे जल पान करवाया, और कहा क्यूंकि मुझे अधिक कुछ ज्ञात नहीं है, किन्तु मैं तुमको एक विद्वान का पता देता हूँ। उनसे मिलो, अवश्य ही कुछ न कुछ सत्य पता चल जायेगा।
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उन्होंने मुझे एक पता दिया, जो पालमपुर के पास एक गाँव का है। वहां रामशरण भारद्वाज जी से मिलना है।
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मैं किसी तरह से उनके गाँव पहुंचा, तब तक रात्रि के 8 बज चुके थे, बरसात से मैं भीग गया था ..!
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भारद्वाज जी ने मुझे देख कर पहले तो समझा कि कोई बालक है जो किसी सहायता के लिए आया होगा। किन्तु मैंने जब उनसे ज्वाला देवी मंदिर पर लिखे सुचना पट्ट के विषय में जानकरी चाही, तो वे पहले तो कुछ असहज दिखे, किन्तु मुझ से दो प्रश्न करने के बाद मुझे उन्होंने गंभीरता से लिया और अंदर बुला लिया। कपडे बदलने के लिए दिए, फिर दूध और गुड़ देकर मेरी कंपकंपी को बंद करवाया। फिर हम चर्चा पर आये...!
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भारद्वाज जी सेवा निवृत प्रोफ़ेसर है। उन्होंने इतिहास पर कई थीसिस लिखी हैं।
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मुझे बताया की, ये सत्य है कि नूरपुर और चम्बे पर हमला करने के लिए अकबर ज्वाला मंदिर पर आया था। और ये भी सत्य है कि मंदिर की ज्योति को बुझाने के प्रयास भी किये थे, किन्तु जब पानी की नहर लाकर भी अकबर ज्योति को बुझा नहीं पाया, तब मंदिर का विध्वंस करवा कर चला गया था...!
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ज्वाला स्थल पर बने मंदिर को नष्ट करवाया, वहां के सभी सेवादार और पुजारी आदि सबको मृत्यु दंड देकर मार दिया, ज्योति स्थल को बड़े बड़े शिलाओं से ढक कर चला गया था...!
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बाद में चंबा के राजा संसार चंद ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था और महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर पर सोने का छत्र लगवाया था,, साथ ही महाराजा के पुत्र शेरसिंह ने मंदिर के मुख्य द्वार को चांदी के द्वारों से सजाया था....
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मैंने जब मंदिर परिसर में लिखे सूचना पर उनका ध्यान दिलाया तो प्रोफ़ेसर साहब ने कहा कि ये सूचना हिन्दू समाज की मूर्खता और जिहादी कौम की चालाकी दिखाता एक झूठ है..?
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सरकारी आदेश से ये सूचना इसलिए लिखवाई गई है जिससे हिन्दू मुस्लिम में भाई चारा बढ़े और अकबर को महान बनाया जा सकें...!
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हमारे देश के वामपंथी इतिहासकारों ने हमसे किस तरह एक एजेंडे के तहत झूठ बोला है, आप समझ गए होंगे।
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ज्वाला देवी की जय🚩🙏

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फिल्म का सबसे शानदार सीन कौन सा है।
जो आपको अंदर तक हिला देगा
हफ्तों तक आपको याद रहेगा।
यह काला पानी के अमानवीय अत्याचार वाला सीन नहीं है
वो तो आपको पता ही है काला पानी में किस हद तक प्रताड़ित किया जाता था। यह वो सीन भी नहीं है जब वर्षों बाद पका हुआ भोजन देखकर सावरकर भावुक हो जाते हैं। या जब वर्षों बाद वो पहली बार पैन पकड़ते हैं।
वो सीन है जब सावरकर 14 साल की जेल के बाद रत्नागिरी जेल से पहली बार बाहर निकलते हैं।
वो सीन आपको अंदर तक तोड़ देता है
जब वो जेल से बाहर निकल रहे होते हैं तब पीछे से भीड़, ढोल और सावरकर जिंदाबाद की नारे सुनाई दे रहे होते हैं ऐसा लगता है कि जेल के उस पार सैकडों लोग इस क्रांतिकारी के छूटने का इंतजार कर रहे होंगे।
लेकिन जब जेल का गेट का खुलता है
बाहर एक आदमी नहीं होता
एक भी नहीं
सिर्फ उनके बड़े बाई उन्हें जेल से लेने के लिए आए होते हैं
और कोई नहीं होता
उस सीन को देखकर महसूस होता है
पानीपत में खड़े सदाशिवराव भाऊ भी अकेले थे
1857 में अंग्रेजों से लड़ते तात्या टोपे भी अकेले थे
और 14 साल की जेल काटकर बाहर निकले सावरकर भी अकेले ही हैं
जब इनके बेटे की मृत्यु हो जाती है और मराठी भाषा में सागरा प्राण तडमडला कविता का वाचन होता हैं!
यह समाज ही ऐसा है
जो अपना सबकुछ इसके लिए दांव पर लगाता है
समाज उसे ही अकेला छोड़ देता है
इसलिए संघ सामूहिकता पर चलता है
जो कराना है पूरे समाज को खड़ा करके सारे समाज से कराना है
ताकि फिर कोई सावरकर परिवार की तरह
सब कुछ लुटाकर भी
अकेले, निसाह न रह जाए।
सावरकर को समझना सामान्य व्यक्ति के औकात से बाहर है,
अटल जी के शब्दों में
सावरकर माने तेज
सावरकर माने तलवार
सावरकर माने तारून्य,
सावरकर माने तप, त्याग .........जितने शब्दकोष है जेहन में लिखते जाओ का मिश्रण है वीर सावरकर
जय हिन्दुस्थान ।।

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