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भाजपा की भ्रष्टाचार की गंगोत्री इलेक्टोरल बॉन्ड पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगाई और खीज में फासीवादी सरकार ने विपक्षी पार्टी कॉंग्रेस के खातों को फ्रीज करवा दिया .. तानाशाही की ऐसी कारर्वाइयां आगे भी देखने को मिलेंगी , कानून - नियम - कायदों को ताखे पर रख कॉंग्रेस के साथ - साथ वैसे तमाम विपक्षी दलों के आर्थिक स्रोतों - संसाधनों पर रोक - अंकुश लगाई जाएगी/जाएगा जो मोदी - शाह की शर्तों पर सरेंडर करना नहीं स्वीकार कर थोड़ी भी चुनौती पेश करने की हिमाकत करेंगे
आम चुनाव अब बस कुछ ही दिनों की बात है , परिस्थितियां सरल नहीं दुरह हैं , जिससे लड़ाई है वो अकूत संसाधनों व् विखंडनकारी नरेटिव के बेजा इस्तेमाल के साथ नतीजों को हर हाल में अपने पक्ष में करने को आमादा है , ऐसे में जनता के बीच जा कर अपनी बात रखने - पहुँचाने का निर्णय स्वागत योग्य है ..
वैसे मेरी व्यक्तिगत राय , जो आम कार्यकर्ताओं व् समर्पित समर्थकों की राय पर आधारित है , में ये निर्णय पहले लिया जाता तो और प्रभावी व् असरदार तरीके से आम जनता के बीच अपने पक्ष में माहौल कायम करने में कामयाबी मिलती .. ऐन चुनावों के वक्त ही नहीं अपितु आम जनता के बीच जाने का कार्यक्रम निरंतर जारी रहना चाहिए , फिर भी देर आए दुरुस्त आए ..
मगर यात्रा के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि जनसंवाद दोतरफा हो और मंच पर चेहरा दिखाऊ - फोटो खिंचाऊ चेहरों की जगह नेता के साथ स्थानीय कार्यकर्ताओं , जमीनी स्तर पर सक्रिय व् समर्पित युवा साथियों को जगह व् तरजीह मिलनी चाहिए और बोलने का अवसर भी ...
अब देर हो रही है और समर्थकों के बीच उहापोह की स्थिति भी कायम होती दिख रही है.. राज्यवार विपक्ष की सीट शेयरिंग की तस्वीर अब स्पष्ट हो जानी चाहिए थी , जिन राज्यों में गठबंधन में आपसी सहमति की अड़चनें हैं , उनको छोड़ कर बाकी उन राज्यों की स्थिति तो अवश्य ही स्पष्ट होनी चाहिए जहाँ सहयोगी दलों के बीच समन्वय बेहतर है ...
अगर सही मायनों में भाजपा को चुनौती देने के प्रति कॉंग्रेस गंभीर है तो उसे अपनी " Delayed Decision Making" की परंपरागत प्रथा - चलन से बाहर निकल कर त्वरित फैसले लेने होंगे ..
आम चुनाव अब बस कुछ ही दिनों की बात है , परिस्थितियां सरल नहीं दुरह हैं , जिससे लड़ाई है वो अकूत संसाधनों व् विखंडनकारी नरेटिव के बेजा इस्तेमाल के साथ नतीजों को हर हाल में अपने पक्ष में करने को आमादा है , ऐसे में जनता के बीच जा कर अपनी बात रखने - पहुँचाने का निर्णय स्वागत योग्य है ..
वैसे मेरी व्यक्तिगत राय , जो आम कार्यकर्ताओं व् समर्पित समर्थकों की राय पर आधारित है , में ये निर्णय पहले लिया जाता तो और प्रभावी व् असरदार तरीके से आम जनता के बीच अपने पक्ष में माहौल कायम करने में कामयाबी मिलती .. ऐन चुनावों के वक्त ही नहीं अपितु आम जनता के बीच जाने का कार्यक्रम निरंतर जारी रहना चाहिए , फिर भी देर आए दुरुस्त आए ..
मगर यात्रा के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि जनसंवाद दोतरफा हो और मंच पर चेहरा दिखाऊ - फोटो खिंचाऊ चेहरों की जगह नेता के साथ स्थानीय कार्यकर्ताओं , जमीनी स्तर पर सक्रिय व् समर्पित युवा साथियों को जगह व् तरजीह मिलनी चाहिए और बोलने का अवसर भी ...