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1544 ई. में अफगान बादशाह शेरशाह सूरी और मारवाड़ के राव मालदेव राठौड़ के बीच गिरी सुमेल की लड़ाई हुई
इस लड़ाई से पहले शेरशाह ने कूटनीति से राव मालदेव और उनके सामंतों के बीच अविश्वास पैदा कर दिया, जिससे राव मालदेव ने अपनी फौज पीछे हटाने का आदेश दिया
जब इस षड्यंत्र का पता वीर योद्धा कूम्पा जी को लगा, तो उन्होंने राव जी को समझाने का प्रयास किया, फिर भी राव जी न माने
तब कूम्पा जी ने कहा "सच्चे राजपूतों में ऐसा विश्वासघात पहले तो कभी न हुआ। मैं राजपूतों की प्रतिष्ठा पर लगाए गए इस कलंक को अपने रक्त से धोऊंगा या शेरशाह को अपने थोड़े से सिपाहियों के साथ पराजित करूँगा"
10-12 हजार राठौड़ों ने शेरशाह की 80 हजार की फौज पर ऐसा पुरज़ोर आक्रमण किया, कि लड़ाई के बाद शेरशाह ने कहा "मुट्ठी भर बाजरे के लिए मैं हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता"
जय भवानी 🙏🙏
जय राजपुताना ⚔️⚔️
नभ चन्द्र सुरात्रि सुशोभत हैं अरु दिवस सुशोभित दिनकर हैं।
श्रीराम सुशोभैं आठहुं जम जब से बसिगै उर के घर हैं।।
शुक पिक कोकिल तरुवर बैठे मधुमास सुवाच उचारत हैं।
कोशल में बारह मास बसे खग नैनहिं राम निहारत हैं।।
भादों मेघन भरि वारि झरै जल पाइ सलिल उछरै बिखरै।
सरयू नद तीनहुं मौसम में हरि पद परसै उमगै विहरै।।
भादों आश्विन धरि खेतन में सरसों फागुन पियराइ रही।
श्रीराम चरन रज पाइ धरनि जो बोवैं बेगि फुलाइ रही।।
सरयू तट रेणु में धेनु खड़े वैदेही के हाथन ग्रास चरैं।
गोधन वत्सल संग डोलि रहे गोरस सलिला जलवास भरैं।।
सब प्रेम तजे सब नेह तजे जगबन्धन मोह विमोह भये।
सियराम के नाम सो नेह लगी सुध-बुध सब कोशल ओर गये।।
श्री राम लगनि लगि लाज तजी घर बार तजे संसार तजे।
प्रभु चरनन पावन आस जगी मम उर निसिवासर राम भजे ।।
श्री हरि ॐ