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प्राचीनकाल से आधुनिक काल तक यह तथ्य सर्वविदित है। कि धर्मों, सम्प्रदायों का विस्तार राजसत्ताओं के माध्यम से ही हुआ है।
भगवान राम कि 10 हजार किलोमीटर कि यात्रा धर्म के लिये ही थी। गीता में श्रीकृष्ण अनेक बार कहते हैं। मैं धर्म के लिये ही सारथी बना हूँ।
तथागत के धम्म को 12 महाजनपदों का समर्थन था। अशोक ने पूरे एशिया में फैला दिया।
फिर उजड़े सनातन को महाराज विक्रमादित्य ने पुनः स्थापित किया। वह सवंती हो 12 ज्योतिर्लिंग हो या प्राचीन राममंदिर हो या कुंभ संगम मेला हो। सब कुछ विक्रमादित्य द्वारा ही किया गया।
ईसाईयत का तभी विस्तार हुआ जब रोम के शासकों ने इसे स्वीकार करके दुनियाभर में फैला दिया।
इस्लाम का सबसे तेजी से विस्तार हुआ। उसका एक ही कारण है। खानाबदोश जातियां शासक बनकर पूरी दुनिया मे तलवार के बल पर फैला दिया।
जिन मजहबों को शासकों का समर्थन नही मिला वह विलुप्त हो गये। वह फ़ारसी हो या अन्य।
यहूदी अत्याचार के सबसे अधिक शिकार हुये। जैसे ही उन्होंने एक इजरायल नाम का देश बनाया उनके उपर अत्याचार रुक गये।
यदि आज कोई सत्ता धर्म के सरंक्षण में खड़ी है तो उसका उपयोग धर्म विकास, विस्तार में होना चाहिये। लेकिन कुछ दम्भी धर्माचार्य अपने महत्व के लिये आलोचक बने है। उन्होंने उन राजनितिज्ञों को निकल जाने का सुरक्षित मार्ग दिया है। जो आमंत्रण के बाद भी। प्राण प्रतिष्ठा में न आकर द्रोह किया है।
जो स्वयं दिग्भ्रमित है। वह क्या समाज का मार्गदर्शन करेंगें। यह दुखद ही है। व्यक्तियों ने धार्मिक पदों की गरिमा गिराई है।।डॉ Ravishankar Singh जी की वाल से साभार
पिता वेदों, उपनिषदों के ज्ञाता के साथ रामभक्त थे। माँ, माता भगवती की पूजा करती थी। इनकी सबसे छोटी संतान होने के कारण बहुत प्यार दुलार मुझे मिला था।
विद्रोह, क्रोध, ज्ञान यह तीनों का सम्मिश्रण थे। वामपंथ ने आकर्षित किया। लाइब्रेरी में मार्क्सवाद पढ़ डाले। यहां तक कि मार्क्स की '#पूँजी\' जैसी पुस्तक नहीं छूटी।
मार्क्सवाद अच्छा है या बुरा है, यह बहस हो सकती है लेकिन यह भारतीय समाज जहां वर्ण व्यवस्था है, उसके लिये तो कदापि नहीं है।
फिर समाज में असमानता है, भेदभाव है। ऐसे समाज का भविष्य क्या है, इसका उत्तर मिल नहीं सका।
एक दिन लाइब्रेरी में एक बहुत छोटी से पुस्तक पड़ी थी। उसके उपर लिखा था 'अग्निमंत्र', मैंने जिज्ञासावस उठा लिया। उसमें लिखा था...'' किसी समाज का निर्माण सदियों में होता है। जिस काल में हुआ था उसके सर्वोत्तम नियमों से हुआ होगा, जैसे आज तुम नियम बनाते हो। कालांतर में समाज और उसकी आवश्यकता बदल जाती है। फिर वह व्यवस्था भी अनुपयोगी हो जाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कभी उपयोगी नहीं थी। उसकी आलोचना मत करो, उससे घृणा मत करो।
मेरे बच्चों! समाज एक वृक्ष कि तरह होता है। समय समय पर शाखाएँ सूख जाती हैं। तुम वृक्ष मत काटो, सूख चुकी शाखाओं को हटा दो जिससे नये कपोल आ सकें। तुम्हारा धर्म शताब्दियों का अन्वेषण है। समाज की कुरीतियों को धर्म से मत जोड़ो। समाज को व्यवस्थित करो, धर्म स्वतः खिल उठेगा।"
पलटकर देखा तो यह पुस्तक 19वीं सदी के महान संत #स्वामी_विवेकानंद के वचन थे। फिर तो स्वामी जो को पढ़ते ही गये। मेरे चिंतन, व्यक्तित्व पर स्वामी जी का बहुत प्रभाव है।
यह भारत का सौभाग्य है कि उसकी धरती पर विवेकानंद जैसे ज्ञानी, विद्वान, वक्ता, संन्यासी पैदा हुये थे। यह भूमि धन्य है जो ऐसे महापुरुषों को जन्म देती है।