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वे इस संसार के सबसे सुंदर वर हैं। इतने सुंदर, कि जब जनकपुर में आये तो पूरे नगर में हलचल मच गई। पूरा नगर बउआ गया जैसे... अभी धनुष टूटने की कोई आशा भी नहीं दिखाई दे रही थी, पर पूरा नगर हाथ जोड़ कर देव को गोहराने लगा, "हे सूरज बाबा! हे संझा माई! राजा जी की बिटिया के लिए इनसे अच्छा वर नहीं मिलेगा। किरपा कीजिये कि ये ही धनुष उठा लें..."
जनकपुर के मार्ग पर भगदड़ मची है। सारे नर नारी बेचैन हैं उन दो युवकों को देख लेने के लिए, जो स्वयं जनकपुर देखने निकले हैं। एक युवती अपनी सखी से कहती है- "राजकुमारी से इनका विवाह हो जाय तो हमारा भला हो जाएगा। ससुराल के नाते ई जब जब जनकपुर आएंगे, तब तब इन्हें निहार लेने का सौभाग्य तो मिलेगा। पर यह राजा इतना मूरख हो गया है कि जाने किस धनुष उठाने वाले प्रण पर अटका हुआ है। इतने कोमल लड़के भला क्या ही धनुष उठाएंगे। काश! कि यही उठा लेते..."
बच्चे उन्हें छू कर देख रहे हैं। एकाएक जाने कितनी प्रकार की हवाएं बहने लगी हैं। कोयल, तोता, चकोर, पपीहा सब एक साथ ही गाने लगे हैं। समूचे जनकपुर में जैसे एक पवित्र गंध पसर गयी है। लोग बाग सबकुछ भूल गए हैं, बस याद हैं तो वे दो युवक, जो अजोध्या वाले राजा दशरथ के बेटे हैं और विश्वामित्र बाबा के साथ आये हैं।
मुनि बाबा के साथ दोनों भाई धनुष यज्ञ मंडप पहुँचे हैं। सभा में अनेक राजा महाराजा बैठे हैं पर राजकुटुम्ब के हर नर नारी की दृष्टि बस उसी युवक पर टिकी हुई है। माताओं को उनमें अभी से अपना पुत्र दिखने लगा है। वे उनकी ओर देखती हैं तो अनायास ही आंखों में जल उतर आता है।
एक एक कर के राजा लोग धनुष के पास अपनी शक्ति दिखाने पहुँच रहे हैं। जैसे ही कोई राजा धनुष तक पहुँचता है, सारी स्त्रियां हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने लगती हैं- हे भगवान! इससे न उठे! जब वह हार कर वापस लौटता है तो सबके कलेजे को शांति मिलती है। मन ही मन कहती हैं, "भाग भकचोन्हरा! जाने कहाँ से आ गया था धनुष उठाने..." सब हाथ जोड़ कर प्रार्थना करती हैं- किसी से धनुष न उठे, बस वह साँवला सा जो बैठा है... अजोध्या वाला...
नाता कोई एक दिन के लिए थोड़ी जुड़ रहा है! वर ऐसा ढूंढना है जिससे लाख बरस तक नाता निभे... वैसा अब तक बस एक ही दिखा है...
सबके हार जाने पर राजा जनक उदास हो कर कहते हैं- "क्षत्रित्व समाप्त हो गया क्या देव?" इसपर लक्ष्मण जी का क्रोध और समूची पृथ्वी को उठा लेने का दावा... पर आम मैथिल जन का मन नहीं मानता! महिलाएं सोच रही हैं, "ये पश्चिम वाले ऐसे ही लम्बी लम्बी हाँकते हैं क्या रे? कहाँ महादेव का विशाल धनुष और कहाँ ये कोमल किशोर..."
सबके हाथ प्रार्थना में जुड़े हैं। लखन की बातों पर भरोसा नहीं होता, फिर भी सभी चाहते हैं कि उनकी बात सत्य हो... धनुष सँवरके उठाये हे देव! हे मइया, हे महादेव, किरपा करो...
गुरुजी ने साँवले को आदेश दिया है। वे उठ कर धीरे धीरे धनुष की ओर बढ़ते हैं। अचानक हजारों लोगों की धड़कन बढ़ गयी है। गला भर आया है, आंखों में जल उतर आया है... सब मन ही मन जोर जोर से जप रहे हैं- महादेव, महादेव, महादेव.... बस यही, यही, यही...
वे धीरे धीरे चल रहे हैं। बाबा लिखते हैं, जैसे हजार 'काम' चल रहे हों, वैसे हमारे राम चल रहे हैं। कोटि मनोज लजावन हारे...
वे धनुष के पास पहुँचे हैं। भयभीत मैथिलों ने क्षण भर के लिए अचानक अपनी आंखें बंद कर ली है। उसी एक क्षण में बिजली चमकी है, आकाश गरजा है, धरती कांपी है... लोग आँख खोलते हैं तो दिखता है, धनुष टूट गया है और सिया के राम मुस्कुरा रहे हैं।
बोलिये दूल्हा सरकार की जय।
लगे हाथ बाबा तुलसीदास जी महाराज की जय।
प्रभु श्री राम और माता जानकी के वैवाहिक वर्षगांठ की समस्त संसार को बधाई...