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khatu shyam ji mandir: खाटू श्याम जी का मंदिर राजस्थान के सीकर शहर में स्थित खाटू नामक गांव में है। यह मंदिर श्याम बाबा मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है और भव्यता के साथ साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण केंद्र है, श्याम बाबा जी को श्री कृष्ण जी के रूप में पूजा जाता है, खाटू में श्री कृष्ण जी का बहुत भव्य मंदिर है और इस मंदिर की प्रसिद्धि पूरे भारत देश में है, यहां पर सालाना लाखों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
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khatu shyam ji mandir: खाटू श्याम जी का मंदिर राजस्थान के सीकर शहर में स्थित खाटू नामक गांव में है। यह मंदिर श्याम बाबा मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है और भव्यता के साथ साथ ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण केंद्र है, श्याम बाबा जी को श्री कृष्ण जी के रूप में पूजा जाता है, खाटू में श्री कृष्ण जी का बहुत भव्य मंदिर है और इस मंदिर की प्रसिद्धि पूरे भारत देश में है, यहां पर सालाना लाखों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।
नमस्कार दोस्तों आज के आर्टिकल में आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है, इस आर्टिकल में हम प्रसिद्ध खाटू श्याम जी के मंदिर (khatu shyam ji mandir) के बारे में पूरी जानकारी देखेंगे, इस आर्टिकल में मैं आपको खाटू श्याम मंदिर के संपूर्ण इतिहास, मंदिर की विशेषता और बनावट की वास्तुकला के बारे में भी पूरी जानकारी दूंगा, अगर आप प्रसिद्ध खाटूश्यामजी मंदिर को गहनता से जानना चाहते हैं तो इस आर्टिकल को आखिर तक जरूर देखिए। आइए दोस्तों समय खराब ना करते हुए जल्दी से जल्दी आर्टिकल को शुरू कर लेते हैं, और प्रसिद्ध खाटू श्याम जी के मंदिर के बारे में पूरी जानकारी देख लेते हैं।
खाटू श्याम मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा –History of Khatu Shyam Mandir
खाटूश्यामजी पांडु पुत्र भीम के पोते माने जाते हैं, यानी कि खाटू श्याम जी का इतिहास महाभारत काल से शुरू होता है। इनका असली नाम बर्बरीक था और इनके पिता का नाम घटोत्कच था। बर्बरीक अपने पिता घटोत्कच से भी महान योद्धा था। बर्बरीक देवी का बहुत बड़ा उपासक था और देवी की उपासना से उसे तीन मायावी बाण प्राप्त हुए थे। इसकी वजह से बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन गया था।
बर्बरीक के तीन मायावी बानो की शक्ति इतनी थी कि वह एक साथ सभी पांडवों और कौरवों को समाप्त कर सकते थे। जब महाभारत का युद्ध हो रहा था, तो बर्बरीक एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए थे और उन्होंने यह ऐलान कर दिया कि वह उसकी तरफ से लड़ेगा जो हार रहा होगा। श्री कृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा लेनी चाही, इसलिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक के पास आकर कहा कि मुझे अपनी माया दिखाओ और जिस पेड़ के नीचे तुम खड़े हो एक ही तीर में पेड़ के सारे पत्ते भेद कर दिखाओ।
बर्बरीक ने अपना मायावी तीर छोड़ दिया मायावी तीर वृक्ष के सभी पत्तों को एक-एक करके भेदने लगा और एक पत्ता टूट कर नीचे गिर गया, जिस पर श्रीकृष्ण ने पैर रख लिया और ऐसा सोचा कि यह पता छूट गया है और बर्बरीक का तीर इसके पार नहीं हो पाएगा, लेकिन बर्बरीक का तीर श्री कृष्ण के पैरों के सामने आकर खड़ा हो गया। उसके उपरांत बर्बरीक ने श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु अपने पैर हटाइए, मैंने तीर को पत्ते भेदने को कहा है आप का पैर नहीं।
बरबरी की कितनी भयंकर मायावी शक्ति देखकर श्री कृष्ण भयभीत हो गए, क्योंकि बर्बरीक ने यह ऐलान कर रखा था कि जो भी हारेगा, बर्बरीक उसकी तरफ से लड़ाई लडेगा, यानी कि अगर कौरव हारने लगेंगे, तो बर्बरीक अपने एक ही तीर से सभी पांडवों को खत्म कर देगा और अगर पांडू हारने लगे तो बर्बरीक अपने एक ही तीर से सभी कोरवों का अंत कर सकता है और युद्ध का पासा पलट सकता है।
इस घटना के दूसरे ही दिन श्री कृष्णा एक साधु का भेष बनाकर बरबरी पर के पास पहुंचे और उनसे भिक्षा का आग्रह किया। बर्बरीक ने पूछा कि बताइए साधु जन आपको दान में क्या चाहिए, तो श्री कृष्ण ने कहा कि मैं मांग लूंगा लेकिन
रिलिजन डेस्क. देवभूमि उत्तराखंड के टिहरी जनपद में स्थित जौनुपर के सुरकुट पर्वत पर सुरकंडा देवा का मंदिर है। यह मंदिर देवी दुर्गा को समर्पित है जो कि नौ देवी के रूपों में से एक है। यह मंदिर 51 शक्ति पीठ में से है। इस मंदिर में देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। केदारखंड व स्कंद पुराण के अनुसार राजा इंद्र ने यहां मां की आराधना कर अपना खोया हुआ साम्राज्य प्राप्त किया था।यह स्थान समुद्रतल से करीब 3 हजार मीटर ऊंचाई पर है इस कारण यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री अर्थात चारों धामों की पहाड़ियां नजर आती हैं। इसी परिसर में भगवान शिव एवं हनुमानजी को समर्पित मंदिर भी है। ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि व गंगा दशहरे के अवसर पर इस मंदिर में देवी के दर्शन से मनोकामना पूर्ण होती है।
ऐसा माना जाता है कि मनसा देवी का एक पुत्र था जिसका नाम आस्तिक था. बता दें कि मनसा देवी का ये खूबसूरत और भव्य मंदिर शिवालिक पहाड़ियों पर बसा हुआ है जो हरिद्वार से 3 किलोमिटर की दूरी पर स्थित है. हर साल यहां हजारों लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं. कहा जाता है कि यहां धागा बांधने से आपकी हर इच्छा पूरी हो जाती है.
ऐसा माना जाता है कि मनसा देवी का एक पुत्र था जिसका नाम आस्तिक था. बता दें कि मनसा देवी का ये खूबसूरत और भव्य मंदिर शिवालिक पहाड़ियों पर बसा हुआ है जो हरिद्वार से 3 किलोमिटर की दूरी पर स्थित है. हर साल यहां हजारों लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं. कहा जाता है कि यहां धागा बांधने से आपकी हर इच्छा पूरी हो जाती है.