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कुँवर रघुराज प्रताप सिंह (जन्मः 31 अक्टूबर 1967, उत्तर प्रदेश) एक सुप्रसिद्ध भारतीय राजनेता है[1], जो राजा भैया के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

रघुराज प्रताप सिंह विशेन (राजा भैया) ये विशेन क्षत्रिय है ये सन 1993 से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिला के विधान सभा क्षेत्र कुंडा से निर्दलीय विधायक निर्वाचित किए जाते हैं। विधानसभा चुनाव 2012 में भी भारी मतों से जीतकर विधानसभा सदस्य हैं। राजा भैया का बसपा सरकार में मुकदमे में मायावती ने जेल में भेज दिया था सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री भी बने

रजनीतिक प्रचारक राजस्थान - ठाकुर श्याम सिंह , मोहन सिंह , कुँवर शिवमंगल सिंह जादौन

जीवन परिचय
रघुराज का जन्म 31 अक्टूबर 1967 को प्रतापगढ़ विशेन क्षत्रिय के भदरी रियासत में पिता श्री उदय प्रताप सिंह और माता श्रीमती मंजुल राजे के यहाँ हुआ। इनके दादा राजा बजरंग बहादुर सिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल थे। राघुराज के पिता राजा उदय प्रताप सिंह विश्व हिंदू परिषद व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मानद पादाधिकारी रह चुके हैं। इनकी माता श्रीमती मंजुल राजे भी एक शाही परिवार की है। राजा भैया अपने परिवार के पहले ऐसे सदस्य थे जिन्होंने पहली बार राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश किया।

रघुराज प्रताप की प्राथमिक शिक्षा नारायणी आश्रम, इलाहाबाद के महाप्रभु बाल विद्यालय में हुआ। सन 1985 में भारत स्काउट एंड गाइड हाई स्कूल से दसवी तथा सन 1987 में इलाहाबाद के एक इंटरमीडिएट स्कूल से बारहवी की पढ़ाई की। लखनऊ विश्वविद्यालय से इन्होंने कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की। घुड़सवारी और निशानेबाजी के शौकीन राजा भैया लखनऊ विश्वविद्यालय से मिलिट्री साइंस और भारतीय मध्यकालीन इतिहास में स्नातक हैं। राजा भैया के बारे में कहा जाता है कि वे साइकिल चलाने से लेकर हवाई जहाज उड़ाने तक का कारनामा करते हैं।

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया का विवाह बस्ती रियासत की राजकुमारी भान्वी देवी से हुआ। इनके दो पुत्र शिवराज एंव ब्रृजराज, दो पुत्रियाँ राधवी और ब्रृजेश्वरी है।

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बनारस में एक मराठी करहाडे ब्राह्मण परिवार में जन्मी, लक्ष्मीबाई ने 1842 में झांसी के महाराजा गंगाधर राव से शादी की। 1853 में जब महाराजा की मृत्यु हुई, तो गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी के अधीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने उनके दत्तक उत्तराधिकारी के दावे को मान्यता देने से इनकार कर दिया। और व्यपगत के सिद्धांत के तहत झाँसी पर कब्जा कर लिया। रानी 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में भाग लेने के लिए तैयार नहीं थी। उन्होंने कंपनी के सहयोगियों के खिलाफ झांसी की सफल रक्षा का नेतृत्व किया, लेकिन 1858 की शुरुआत में झांसी ह्यूग रोज की कमान में ब्रिटिश सेना के अधीन हो गई। रानी घोड़े पर सवार होकर भागने में सफल रही और ग्वालियर पर कब्जा करने के लिए विद्रोहियों में शामिल हो गई, जहाँ उन्होंने नाना साहेब को पुनर्जीवित मराठा साम्राज्य के पेशवा के रूप में घोषित किया। ग्वालियर में ब्रिटिश जवाबी हमले के दौरान घातक रूप से घायल होने के बाद जून 1858 में उनकी मृत्यु हो गई।

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