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Corruption: an intractable issue

Corruption: an intractable issue

<p>Corruption not only has become a pervasive aspect of Indian politics but also has become an increasingly important factor in Indian elections.</p> <p>The extensive role of the Indian state in providing services and promoting economic development has always created the opportunity for using public resources for private benefit.</p> <p>As government regulation of business was extended in the 1960s and corporate donations were banned in 1969, trading economic favours for under-the-table contributions to political parties became an increasingly widespread political practice. During the 1980s and 1990s, corruption became associated with the occupants of the highest echelons of India’s political system.</p> <p>Rajiv Gandhi’s government was rocked by scandals, as was the government of P.V. Narasimha Rao. Politicians have become so closely identified with corruption in the public eye that a Times of India poll of 1,554 adults in six metropolitan cities found that 98 percent of the public is convinced that politicians and ministers are corrupt, with 85 percent observing that corruption is on the increase.</p> <p>The prominence of political corruption in India in the 1990s is hardly unique to India. Other countries also have experienced corruption that has rocked their political systems. What is remarkable about India is the persistent anti-incumbent sentiment among its electorate. Since Indira’s victory in her 1971 “garibi hatao” election, only one ruling party has been re-elected to power in the Central Government.</p> <p> </p> <p>In an important sense, the exception proves the rule because the Congress (I) won reelection in 1984 in no small measure because the electorate saw in Rajiv Gandhi a “Mr. Clean” who would lead a new generation of politicians in cleansing the political system. Anti-incumbent sentiment is just as strong at the state level, where the ruling parties of all political persuasions in India’s major states lost eleven of thirteen legislative assembly elections held from 1991 through spring 1995.</p> <p>Corruption in simple terms may be described as ‘an act of bribery’. Corruption is defined as the use of public office for private gains in a way that constitutes a breach of law or a deviation from the norms of society. Scales of corruption can be Grand, Middling or Petty and payment of bribes can be due to collusion between the bribe taker and the bribe giver, due to coercion or even anticipatory.</p> <p>This was the outburst of Mahatma Gandhi against rampant corruption in Congress ministries formed under 1935 Act in six states in the year 1937. The disciples of Gandhi however, ignored his concern over corruption in post-Independence India, when they came to power.</p> <p>Over sixty years of democratic rule has made the people so immune to corruption that they have learnt how to live with the system even though the cancerous growth of this malady may finally kill it. The Tehelka episode surcharged the political atmosphere of the country but it hardly exposed anything that was unknown to the people of this biggest democratic polity.</p> <div class="code-block code-block-5"> <p> </p> </div> <p>Politicians are fully aware of the corruption and nepotism as the main reasons behind the fall of Roman Empire, the French Revolution, October Revolution in Russia, fall of Chiang Kai-Shek Gov­ernment on the mainland of China-and even the defeat of the mighty Congress party in India. But they are not ready to take any lesson from the pages of history.</p>
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कितना काम और कितना आराम

कितना काम और कितना आराम

कोई अपने जीवन में सही संतुलन कैसे लाए? अगर आप छोटे-मोटे काम करते हैं, तो आप तय कर सकते हैं कि आप छह घंटे काम करेंगे, छह घंटे आराम करेंगे, ये करेंगे, वो करेंगे। लेकिन अगर आप वाकई कोई महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं तो ऐसा कुछ नहीं होगा... जाने-माने मनोवैज्ञानिक एरिक एरिकसन का मानना था कि जीवन में संतुलन की जरूरत है। एक शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए आपके काम, प्रेम और खेल में संतुलन होना चाहिए। कोई अपने जीवन में सही संतुलन कैसे लाए? 100 प्रतिशत समर्पण के बिना कुछ संभव नहीं आप अपने जीवन में कभी संतुलन नहीं ला पाओगे। आप बस इस तरह की किताबें बेच सकते हैं, लेकिन आप जीवन को वैसा नहीं बना सकते। अगर आप छोटे-मोटे काम करते हैं, तो आप तय कर सकते हैं कि आप छह घंटे काम करेंगे, छह घंटे आराम करेंगे, ये करेंगे, वो करेंगे। लेकिन अगर आप वाकई कोई महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं तो ऐसा कुछ नहीं होगा। यह 24घंटे का काम होगा। अगर आप कुछ भी अर्थपूर्ण करना चाहते हैं, तो आपको उस काम को मर कर भी करना होगा। आप उस काम के लिए सिर्फ जीते ही नहीं है, उसमें आपको डूब जाना होगा, जान तक दे देनी होगी। आपकी मौत इस काम के लिए एक खाद की तरह होगी। अगर आपने कोई महत्वपूर्ण कार्य अपने हाथ में ले रखा है तो क्या आप कह सकते हैं कि ठीक है भई, छह घंटे हो गए, अब हम आराम करेंगे, हम खेलेंगे, यह करेंगे, वह करेंगे? अगर आप इस तरह काम करेंगे, तो आप कुछ भी सार्थक नहीं कर पाएंगे। अगर आप कुछ भी अर्थपूर्ण करना चाहते हैं, तो आपको उस काम को मर कर भी करना होगा। आप इस काम के लिए सिर्फ जीते ही नहीं हैं, इसमें आपको डूब जाना होगा, जान तक दे देनी होगी। आपकी मौत इस काम के लिए एक खाद की तरह होगी। अगर ऐसा है तभी आप कुछ सार्थक कर पाएंगे। कला, संगीत, मनोरंजन, विज्ञान, अध्यात्म, कोई भी क्षेत्र हो, क्या कभी किसी ने 100 फीसदी समर्पित हुए बिना कुछ भी सार्थक किया है? क्यों हो जाता है ज्यादा काम से तनाव? अगर आप छोटे-मोटे काम करते हैं, तो इस तरह के फिलासफी काम कर सकते हैं। काम का तनाव क्यों होता है? क्योंकि आप कुछ ऐसा कर रहे हैं, जिसकी आपको कोई खास परवाह नहीं है, जिससे आपको कोई लगाव नहीं है। अगर आपका काम ऐसा है, जिसमें आपको आनंद आता है, आप उसकी परवाह करते हैं, तो आपको उसे करने के जितने ज्यादा मौके मिलें, उतना ही अच्छा। आराम जैसी कोई चीज नहीं होती। आराम तो अपने अंदर होने का एक ढंग है, आराम कोई काम नहीं होता। अगर आप एक दिन में 10 घंटे सो रहे हैं तो आपका 50 फीसदी वक्त तो सर्विसिंग में ही चला गया। यह तो बड़ी अफसोस की बात है। अगर आप चैन में जी रहे हैं, तो आप आराम में हैं। अभी मैं यहां बैठा हूं और बोल रहा हूं। मेरी नब्ज 45 से 50 के बीच में होगी। अगर मैं यहां आराम से बिना कुछ बोले 10 मिनट तक बैठा रहूं तो मेरी नब्ज 35 से 40 के बीच कहीं होगी। यह शांति है। आप इस चीज को चौबीसों घंटे जारी रख सकते हैं, तनाव नहीं होगा। अगर आपकी मशीन अच्छी है तो आप बहुत सारा काम कर सकते हैं। अगर आपकी मशीन ही खराब है, उसमें घर्षण बहुत ज्यादा होगा, तो यह शोर करेगी ही। अच्छी से अच्छी मशीन को भी अगर आप जरूरी चिकनाहट या तेल आदि न उपलब्ध कराएं, तो वह रुक जाएगी। अगर इसे तेल सही से दिया जाए, तो यह चलती रहेगी और इसके सर्विसिंग की भी कम से कम आवश्यकता होगी। क्या हर रोज़ आठ घंटे की नींद जरुरी है? आजकल डॉक्टर कहते हैं कि आपको हर रोज आठ घंटे की अगर आप जीवन को जानना चाहते हैं तो इसके लिए जीवन से गहराई में जुडऩा होगा। पूरी तरह से जुडक़र आप जो भी करेंगे, उसका अनुभव शानदार होगा। अगर आपके पास एक कार है जिसे महीने में एक दिन सर्विस की जरूरत पड़ती है तो यह अपने आप में खीझ पैदा करने वाला काम होगा। हम ऐसी कारों के आदी हैं जिन्हें तीन या छह महीने में एक बार सर्विस की जरूरत पड़ती है, लेकिन अगर किसी कार को 30 में से 15 दिन सर्विस की जरूरत हो तो उसे इस्तेमाल करने से तो बेहतर होगा कि आप पैदल ही चल लें। अब अगर आप एक दिन में 10 घंटे सो रहे हैं तो आपका 50 फीसदी वक्‍त तो सर्विसिंग में ही चला गया। यह तो बड़ी अफसोस की बात है। अपने काम में खुद को झोंक दें तो तरीका यह है कि आप जो भी करना चाहते हैं, अपने आप को उसमें झोंक दीजिए। इस काम को करते हुए अगर आप खुद को मार भी डालते हैं तो भी इसका महत्व है। आराम, काम आदि का संतुलन कैसे बनाएं, इस तरह की बेकार की बातों में मत पड़िए। ऐसे तो आप जी भी नहीं पाएंगे, मरने की तो बात ही छोड़ दीजिए। बिना जीवन से जुड़े क्या आप जीवन जी सकते हैं? जीवन को संतुलित बनाने की कोशिश से निराशा मिलेगी अगर आप जीवन को जानना चाहते हैं तो इसके लिए जीवन से गहराई में जुडऩा होगा। पूरी तरह से जुडक़र आप जो भी करेंगे, उसका अनुभव शानदार होगा। वह आदमी जो चाकरी कर रहा है, तुच्छ काम कर रहा है, वही ऐसा कह सकता है कि वक्‍त खत्म तो काम खत्म। जिस किसी ने भी कोई महत्वपूर्ण काम हाथ में ले रखा है, वह कभी यह नहीं कहेगा कि वक्‍त पूरा हो गया। अगर आप कुछ सार्थक कर रहे हैं तो आप उस काम में 24 घंटे डूबे रहते हैं। यह ऐसे है जैसे आप इस मशीन को इस तरह से तेल दे रहे हैं कि अगर आप इससे 24 घंटे भी काम लेते रहें तो भी यह आराम से कम आरपीएम पर चलती रहे। यह महत्वपूर्ण बात है। अगर आप इस तरह से जी रहे हैं तो ही जीवन में संतुलन और शांति जैसी चीजें आ सकती हैं, नहीं तो अगर आप जीवन को संतुलित बनाने की कोशिश में लगे रहे तो आखिर में आपके हाथ निराशा और अवसाद ही लगेगा।
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ईश्वर क्या है ? - क्या ईश्वर सत्य है ?

ईश्वर क्या है ? - क्या ईश्वर सत्य है ?

<p>कुछ ईश्वर को मानते हैं तो कुछ उसके अस्तित्व को नकारते हैं। ऐसे इंसान कम ही हैं जो असलियत को जानना चाहते हैं। आईए देखते हैं सद्‌गुरु क्या कहते हैं:</p> <p> </p> <p><em>धर्म या अध्यात्म की साधना में, अक्सर जो सबसे पहला सवाल मन में उठता है, वो ये है कि क्या सच में इश्वर का अस्तित्व है?  कैसे मिलेगा इसका उत्तर? कैसे पैदा होगी उत्तर जानने की संभावना?</em></p> <h2>जो कुछ भी अनुभव में नहीं, उसे समझ नहीं सकते</h2> <p>अब अगर मैं किसी ऐसी चीज़ के बारे में बात करूँ जो आपके वर्तमान अनुभव में नहीं है, तो आप उसे नहीं समझ पाएंगे। मान लीजिए, आपने कभी सूर्य की रोशनी नहीं देखी और इसे देखने के लिए आपके पास आंखें भी नहीं हैं।</p> <p> </p> <div class="isha-article-quote-bg"> <div class="article-right-blue"> <div class="isha-article-quote">अगर आप यह स्वीकार नहीं कर पाते कि, 'मैं नहीं जानता हूँ’, तो आपने अपने जीवन में जानने की सभी संभावनाओं को नष्ट कर दिया है। अगर आप वाकई जानना चाहते हैं तो आपको अपने भीतर मुडऩा होगा, अपनी आंतरिक प्रकृति से जुडऩा होगा।</div> </div> </div> <p> </p> <p>ऐसे में अगर मैं इसके बारे में बात करूं, तो चाहे मैं इसकी व्याक्या कितने ही तरीके से कर डालूं, आप समझ नहीं पाएंगे कि सूर्य की रोशनी होती क्या है। इसलिए कोई भी ऐसी चीज़ जो आपके वर्तमान अनुभव में नहीं है, उसे नहीं समझा जा सकता। इसलिए इसके बाद जो एकमात्र संभावना रह जाती है, वह है कि आपको मुझ पर विश्वास करना होगा। मैं कह रहा हूँ, वही आपको मान लेना होगा। अब अगर आप मुझ पर विश्वास करते हैं, तो यह किसी भी तरह से आपको कहीं भी नहीं पहुंचाएगा। अगर आप मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं, तब भी आप कहीं नहीं पहुँच पाएंगे। मै आपको एक कहानी सुनाता हूं।</p> <h2>इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया था गौतम बुद्ध ने?</h2> <p>एक दिन, सुबह-सुबह, गौतम बुद्ध अपने शिष्यों की सभा में बैठे हुए थे। सूरज निकला नहीं था, अभी भी अँधेरा था। वहां एक आदमी आया। वह राम का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपना पूरा जीवन ''राम, राम, राम” कहने में ही बिताया था। इसके अलावा उसने अपने पूरे जीवन में और कुछ भी नहीं कहा था। यहां तक कि उसके कपड़ों पर भी हर जगह ''राम, राम” लिखा था। वह केवल मंदिरों में ही नहीं जाता था, बल्कि उसने कई मंदिर भी बनवाए थे। अब वह बूढ़ा हो रहा था और उसे एक छोटा सा संदेह हो गया। ''मैं जीवन भर 'राम, राम’ कहता रहा, लेकिन वे लोग जिन्होंने कभी ईश्वर में विश्वास नहीं किया, उनके लिए भी सूरज उगता है।</p> <p> </p> <div class="isha-article-quote-bg"> <div class="article-right-blue"> <div class="isha-article-quote">देखिए, अगर आप मुझ पर विश्वास करते हैं, तो आप स्वयं को मूर्ख बना रहे हैं। बिना जाने आप केवल जानने का बहाना करेंगे। अगर आप मुझ पर अविश्वास करते हैं, तो आप जानने की उस संभावना को नष्ट कर देंगे जो आपके अनुभव में नहीं है।</div> </div> </div>
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भगवान से भक्ति नहीं, भक्ति से भगवान हैं

भगवान से भक्ति नहीं, भक्ति से भगवान हैं

इस संसार में जीवन जीने का सबसे समझदारी भरा तरीका है - हमेशा भक्ति की अवस्था में रहना। हालांकि ज्यादातर विचारशील लोग मेरी बात से सहमत नहीं होंगे, क्योंकि तथाकथित भक्त अकसर इस धरती के सबसे बड़े मूर्ख नजर आते हैं। एक कारण तो यह है कि लोग बस भक्त होने का ढोंग और दावा करते हैं, वे वास्तव में भक्त हैं नहीं। वे बस जबरदस्त प्रशंसक हैं, उन्हें आप बस फैन के रूप में देख सकते हैं, लेकिन आमतौर पर उन्हें भक्त की तरह समझ लिया जाता है। हो सकता है उसने कभी किसी की कोई पूजा न की हो लेकिन फिर भी वह भक्त है। हो सकता है वह उस अवस्था तक ध्यान, प्रेम या पूजा के जरिये पहुंचा हो, लेकिन अगर वह हरदम लगा हुआ है तो वह भक्त है। भक्त होने का मतलब प्रशंसक या फैन होना नहीं है। भक्त तो सभी कारणों से परे होता है। भक्त एक ऐसी दुनिया में होता है जहां कुछ भी सही या गलत नहीं है, जहां कोई पसंद या नापसंद नहीं है। भक्ति वह तरीका है जो आपको उस दुनिया में आसानी से ले जाता है। भक्ति, प्रेम भी नहीं है। प्रेम तो एक फूल की तरह होता है, फूल सुंदर होता है, सुगंधित होता है लेकिन मौसम के साथ वह मुरझा जाता है। भक्ति एक बाड़ कि तरह होती है http://isha.sadhguru.org/blog/hi/sadhguru/sadhguru-spot/bhakti-ek-baadh-hai क्ति पेड़ की जड़ की तरह होती;। चाहे जो भी हो, यह कभी नहीं मुरझाती, हमेशा वैसी ही बनी रहती है। बसंत का समय हो तो पेड़ पर खूब पत्तियां आती हैं। पतझड़ आता है, तो यह फूलों से लद जाता है। सर्दियां आती हैं, यह उजड़ जाता है। बाहर चाहे जो चल रहा हो, लेकिन जड़ें अपना काम लगातार करती रहती हैं। एक पल के लिए भी इधर-उधर विचलित नहीं होतीं। पेड़ का पोषण करने का जड़ों का जो मकसद होता है, वह एक भी पल के लिए कम नहीं होता, भले ही उसकी सतह पर कैसे भी बदलाव हो रहे हों। जड़ें कभी ऐसा नहीं सोचतीं कि अरे, कोई पत्ती ही नहीं बची, अब मैं क्यों काम करूं? कोई फूल नहीं है, कोई फल नहीं आ रहा है, मैं क्यों काम करूं? ऐसा नहीं होता है। जड़ें बस हमेशा काम करना जारी रखती हैं। अगर कोई हमेशा सजगता पूर्वक काम में लगा रहता है, नींद में भी उसका काम जारी है, तो वह भक्त है। एक भक्तिमय प्रस्तुति केवल भक्त ही हमेशा लगा रह सकता है। हो सकता है उसने कभी किसी की कोई पूजा न की हो लेकिन फिर भी वह भक्त है। हो सकता है वह उस अवस्था तक ध्यान, प्रेम या पूजा के जरिये पहुंचा हो, लेकिन अगर वह हरदम लगा हुआ है तो वह भक्त है। एक बड़ी सुंदर कहानी है। एक राजा था जो एक आश्रम को संरक्षण दे रहा था। यह आश्रम एक जंगल में था। इसके आकार और इसमें रहने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही थी और इसलिए राजा उस आश्रम के लोगों के लिए भोजन और वहां की इमारत आदि के लिए आर्थिक सहायता दे रहा था। यह आश्रम बड़ी तेजी से विकास कर रहा था। जो योगी इस आश्रम का सर्वेसर्वा था वह मशहूर होता गया और राजा के साथ भी उसकी अच्छी नजदीकी हो गई। ज्यादातर मौकों पर राजा उसकी सलाह लेने लगा। ऐसे में राजा के मंत्रियों को ईर्ष्या होने लगी और वे असुरक्षित महसूस करने लगे। एक दिन उन्होंने राजा से बात की -हे राजन, राजकोष से आप इस आश्रम के लिए इतना पैसा दे रहे हैं। आप जरा वहां जाकर देखिए तो सही। वे सब लोग अच्छे खासे, खाते-पीते नजर आते हैं। वे आध्यात्मिक लगते ही नहीं। राजा को भी लगा कि वह अपना पैसा बर्बाद तो नहीं कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर योगी के प्रति उसके मन में बहुत सम्मान भी था। उसने योगी को बुलवाया और उससे कहा- 'मुझे आपके आश्रम के बारे में कई उल्टी-सीधी बातें सुनने को मिली हैं। ऐसा लगता है कि वहां अध्यात्म से संबंधित कोई काम नहीं हो रहा है। वहां के सभी लोग अच्छे-खासे मस्तमौला नजर आते हैं। ऐसे में मुझे आपके आश्रम को पैसा क्यों देना चाहिए योगी बोला- हे राजन, आज शाम को अंधेरा हो जाने के बाद आप मेरे साथ चलें। मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं। रात होते ही योगी राजा को आश्रम की तरफ लेकर चला। राजा ने भेष बदला हुआ था। सबसे पहले वे राज्य के मुख्यमंत्री के घर पहुंचे। दोनों चोरी-छिपे उसके शयनकक्ष के पास पहुंचे। उन्होंने एक बाल्टी पानी उठाया और उस पर फेंक दिया। मंत्री चौंककर उठा और गालियां बकने लगा। वे दोनों वहां से भाग निकले। फिर वे दोनों एक और ऐसे शख्स के यहां गए जो आश्रम को पैसा न देने की वकालत कर रहा था। वह राज्य का सेनापति था। दोनों ने उसके भी शयनकक्ष में झांका और एक बाल्टी पानी उस पर भी उड़ेल दिया। वह व्यक्ति और भी गंदी भाषा का प्रयोग करने लगा। इसके बाद योगी राजा को आश्रम ले कर गया। बहुत से संन्यासी सो रहे थे। भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है। उन्होंने एक संन्यासी पर पानी फेंका। वह चौंककर उठा और उसके मुंह से निकला शिव-शिव। फिर उन्होंने एक दूसरे संन्यासी पर इसी तरह से पानी फेंका। उसके मुंह से भी निकला - हे शंभो। योगी ने राजा को समझाया - महाराज, अंतर देखिए। ये लोग चाहे जागे हों या सोए हों, इनके मन में हमेशा भक्ति रहती है। आप खुद फर्क देख सकते हैं। तो भक्त ऐसे होते हैं। भक्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दिन और रात आप पूजा ही करते रहें। भक्त वह है जो बस हमेशा लगा हुआ है, अपने मार्ग से एक पल के लिए भी विचलित नहीं होता। वह ऐसा शख्स नहीं होता जो हर स्टेशन पर उतरता-चढ़ता रहे। वह हमेशा अपने मार्ग पर होता है, वहां से डिगता नहीं है। अगर ऐसा नहीं है तो यात्रा बेवजह लंबी हो जाती है। भक्ति की शक्ति कुछ ऐसी है कि वह सृष्टा का सृजन कर सकती है। जिसे मैं भक्ति कहता हूं उसकी गहराई ऐसी है कि यदि ईश्वर नहीं भी हो, तो भी वह उसका सृजन कर सकती है, उसको उतार सकती है। जब भक्ति आती है तभी जीवन में गहराई आती है। भक्ति का अर्थ मंदिर जा कर राम-राम कहना नहीं है। वो इन्सान जो अपने एकमात्र लक्ष्य के प्रति एकाग्रचित है, वह जो भी काम कर रहा है उसमें वह पूरी तरह से समर्पित है, वही सच्चा भक्त है। उसे भक्ति के लिए किसी देवता की आवश्यकता नहीं होती और वहां ईश्वर मौजूद रहेंगे। भक्ति इसलिए नहीं आई, क्योंकि भगवान हैं। चूंकि भक्ति है इसीलिए भगवान हैं।
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भगवान ने ये दुनिया क्यों बनाई?

भगवान ने ये दुनिया क्यों बनाई?

<p>प्रश्न : सद्‌गुरु, आपने कहा कि स्रष्टा ने जो सृजन किया है, वह वाकई अद्भुत है और यह उसकी बेहतरीन सृजनशीलता को दिखाता है। मैं जानना चाहती हूं कि उसने सृष्टि बनाई क्यों?</p> <h2>ये सवाल आपमें गहरा नहीं उतरा है</h2> <p>सद्‌गुरु : जब आप पूछते हैं कि स्रष्टा ने सृष्टि की रचना क्यों की, तो सबसे पहले आप एक बेतुकी और मूर्खतापूर्ण कल्पना कर रहे हैं कि कहीं पर कोई स्रष्टा बैठा है और वह ये सब कर रहा है।</p> <p> </p> <p>पर आपको तो लगता है कि यह कोई विद्वतापूर्ण सवाल है, ‘सृष्टि क्यों बनी?’ तो मैं कहूंगा कि एक दिन ईश्वर के पास कुछ करने को नहीं था, इसलिए वह कंचे खेल रहा था। एक कंचा नीचे गिरा और धरती बन गई।दूसरी चीज यह है कि जब आप ‘यह सृष्टि क्यों’ कहते हैं, तो आप मुख्य रूप से यह पूछ रहे हैं कि ‘इस पूरी रचना का मूल क्या है?’ यह सवाल तो तभी उठना चाहिए जब आप जीवन को या तो बहुत आनंदमय महसूस कर रहे हैं या यह आपके लिए बेहद पीड़ादायक हो गया है। अगर आप जीवन को परम आनंद के रूप में जानते हैं, तो आप पूछते हैं, ‘वाह! आखिर इन सब का आधार क्या है?’ या आपने अगर अपने अंदर सबसे अधिक पीड़ा महसूस की है, फिर आप पूछते हैं, ‘आखिर इन सब का मतलब क्या है?’ दोनों ही स्थिति में एक संभावना होगी।</p> <p> </p> <p>फिलहाल आपके साथ ये दोनों चीजें नहीं हुई हैं। <a title="मैं कौन हूँ? ये जानने की पीड़ा" href="http://isha.sadhguru.org/blog/hi/sadhguru/main-kaun-hoon/">अज्ञानता</a> की पीड़ा अगर आपको भीषण कष्ट पहुंचा रही हो कि आप खा नहीं पा रहे हों, सो नहीं पा रहे हों, कुछ नहीं कर पा रहे हों, अगर आपके अंदर जानने की इतनी तीव्र इच्छा और पीड़ा हो, तो मैं बिल्कुल अलग तरीके से इसका जवाब दूंगा। पर आपको तो लगता है कि यह कोई विद्वतापूर्ण सवाल है, ‘सृष्टि क्यों बनी?’ तो मैं कहूंगा कि एक दिन ईश्वर के पास कुछ करने को नहीं था, इसलिए वह कंचे खेल रहा था। एक कंचा नीचे गिरा और धरती बन गई। एक ऊपर उड़ा और सूर्य बन गया। एक छोटा कंचा चांद बन गया। क्या आगे और बताऊं? आप जैसा सवाल पूछ रहे हैं, उसके जवाब में आपको इसी तरह की कहानी मिलेगी। रोज, दिन-रात, इस सवाल से खुद को परेशान कीजिए। जब यह सवाल इतना पैना हो जाए कि आपको चीरने लगे, तब मैं इस सवाल का जवाब दूंगा, चाहे आप कहीं भी हों। तब आपको मेरे पास आकर यह सवाल पूछने की जरूरत नहीं होगी।</p> <h2>भीतर कुछ है जो संघर्ष कर रहा है</h2> <p>जब बात सृष्टि की हो, तो आपको कभी नहीं पूछना चाहिए ‐ क्यों? क्योंकि आप इस सृष्टि में सिर्फ एक मामूली कण की तरह हैं। एक इंसान के रूप में आपने जो व्यवस्थाएं की हैं, जैसे - परिवार, सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा आदि, उसकी वजह से आप धीरे-धीरे यह मानने लगे हैं कि कई रूपों में आप ही दुनिया का केंद्र हैं।</p> <div class="isha-article-quote-bg"> <div class="article-right-blue"> <div class="isha-article-quote">कुछ लोग इस बारे में जागरुक हो चुके हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को अभी इस बारे में जागरूकता नहीं है। वे बस खुद को व्यस्त रखते हैं, ताकि अंदरूनी संघर्ष का सामना नहीं करना पड़े।</div> </div> </div> <p>मगर यह सच्चाई नहीं है, आप अस्तित्व में बस एक छोटा सा कण हैं। अगर कल सुबह आप गायब हो जाएं, तो किसी को आपकी कमी महसूस नहीं होगी। तो इस मामूली से कण के द्वारा यह सवाल पूछने कि ‘सृष्टि क्यों है’ का कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि इस सवाल का संदर्भ सही नहीं है। ‘सृष्टि क्यों’ का सवाल इसलिए सामने आया है, क्योंकि कहीं न कहीं जीवन का अनुभव आनंदपूर्ण नहीं रहा है। अगर जीवन का अनुभव आनंददायक होता, तो आप नहीं पूछते, ‘सृष्टि क्यों?’ कहीं न कहीं आपके अंदर यहां अपनी मौजूदगी को लेकर संघर्ष है, पीड़ा है। हो सकता है कि आपने बहुत सुविधाएं, सुरक्षा जुटा ली हों, मगर फ र भी उसमें अंतर्निहित संघर्ष व पीड़ा ऐसी है कि आपको रोजाना कई सारी चीजें करनी पड़ती हैं, खुद को घसीटना पड़ता है। आप खुद को जोश से भरते हैं, कई तरह के कामों को करने के लिए नई-नई वजहें ढूंढते हैं, मगर अंदर कहीं न कहीं कुछ है, जो हर इंसान में लगातार संघर्ष कर रहा है। जब तक कि वह एक खास कृपा को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक वह जूझता रहता है। कुछ लोग इस बारे में जागरुक हो चुके हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों को अभी इस बारे में जागरूकता नहीं है। वे बस खुद को व्यस्त रखते हैं, ताकि अंदरूनी संघर्ष का सामना नहीं करना पड़े।</p> <p> </p> <h2>कैसे बनें संघर्ष के प्रति जागरूक</h2> <p>लोग खुद को इतना व्यस्त और जीवन में इतना उलझाकर इसलिए नहीं रखते, क्योंकि उन्हें जीवन से प्रेम है, वे बस अपने आंतरिक संघर्ष से बचना चाहते हैं। इनमें से बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो अगर शादी नहीं करते, बच्चे नहीं पैदा करते, कारोबार नहीं शुरू करते और रोजाना की चीजों में नहीं उलझते, तो वे खुद में ही कहीं खो जाते। सिर्फ  अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए, वे इस तरह की गतिविधियों में लगे रहते हैं। अगर वे सिर्फ  दो दिन तक चुपचाप एक जगह बैठ जाएं, तो वे उस अंदरूनी संघर्ष के प्रति जागरूक हो जाएंगे, जो हर प्राणी के अंदर सीमित शरीर में कैद होने की वजह से चलता रहता है। कुछ लोग इसके प्रति जागरूक हो जाते हैं। एक बार जागरूक होने के बाद वे उस पर ध्यान देना शुरू करते हैं, तभी हम कहते हैं कि वह व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग पर है, क्योंकि वह आंतरिक <a title="एक भीतरी अधूरापन" href="http://isha.sadhguru.org/blog/hi/sadhguru/aadhyatmik-gyan-sab-kuch-milne-par-bhi-kyon-hai-adhurapan/">संघर्ष</a> के बारे में जानता है। उसे पता चल जाता है कि चाहे आप कुछ भी कर लें, अंदर कोई चीज हर समय जूझती रहती है। मगर बाकी लोग अब भी बहुत व्यस्त हैं।</p> <h2>'क्यों' नहीं 'कैसे' पूछना होगा</h2> <p>तो यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि भीतर एक संघर्ष है। हो सकता है कि आप इस संघर्ष से पूरी तरह अवगत न हों, मगर कहीं न कहीं यह आपको छूता है। इसलिए अभी आपके लिए ज्यादा बुद्धिमानी वाला सवाल यह होगा, ‘मैं इस संघर्ष से परे कैसे जा सकता हूं?’ अगर आप ‘कैसे’ पूछेंगे, तो मेरे पास रास्ता है। अगर आप ‘क्यों’ पूछेंगे, तो मुझे आपको कोई कहानी सुनानी पड़ेगी। अलग-अलग संस्कृतियों के पास अलग-अलग कहानी होगी, हर धर्म अलग-अलग कहानी सुनाएगा, हर व्यक्ति अपनी कहानी खुद गढ़ सकता है, मगर कहानियां आपको मुक्त नहीं कर सकतीं। लेकिन अगर आप ‘कैसे’ पूछेंगे, तो हम रास्ता खोल सकते हैं।</p> <p> </p>

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