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“हर धमकी का जवाब ज़रूरी नहीं”—अमेरिका से पीएम मोदी को मिला समर्थन, मैरी मिलबेन ने कही बड़ी बात
नई दिल्ली: अमेरिकी सिंगर और भारत की खुली प्रशंसक मानी जाने वाली मैरी मिलबेन ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। इस बार वजह है—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति उनका समर्थन और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत को लेकर हालिया टिप्पणियों पर उनकी प्रतिक्रिया।
मैरी मिलबेन ने साफ शब्दों में कहा कि भारत जैसे मित्र देश के साथ अनावश्यक तनाव से बचना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि वे देश के सर्वोत्तम हित में काम कर रहे हैं और उन्हें इसी तरह आगे बढ़ते रहना चाहिए। उनके मुताबिक, हर धमकी या बयान का तुरंत जवाब देना जरूरी नहीं होता—कभी-कभी संयम ही सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए मिलबेन ने लिखा कि उन्हें विश्वास है कि डोनाल्ड ट्रंप दिल से प्रधानमंत्री मोदी का सम्मान करते हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें भारत के प्रति गलत सलाह दी जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि वे इस मुद्दे पर ट्रंप के लिए प्रार्थना कर रही हैं, ताकि वे सही दृष्टिकोण अपनाएं।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती साख के बीच ऐसे समर्थन देश की सॉफ्ट पावर को और मजबूत करते हैं।
मैरी मिलबेन का यह संदेश सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन और परिपक्व नेतृत्व की ओर भी इशारा करता है—जहां हर शब्द का जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि दूरदर्शिता से दिया जाता है।
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मुफ्ती शमाइल नदवी के बयान पर बहस: संविधान, आस्था और क़ानून का टकराव

मुफ्ती शमाइल नदवी से जुड़े बयानों ने तीखी प्रतिक्रियाएँ पैदा कर दी हैं। आलोचकों का कहना है कि इन टिप्पणियों से राष्ट्रभाव और क़ानून के प्रति एक चयनात्मक दृष्टिकोण झलकता है—जहाँ संविधान के प्रति निष्ठा सुविधानुसार स्वीकार की जाती है, लेकिन धार्मिक क़ानून को उससे ऊपर रखे जाने पर उसे किनारे कर दिया जाता है। कई पर्यवेक्षकों के अनुसार, यही विरोधाभास एक चिंताजनक दोहरे मानदंड की ओर इशारा करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता नवजोत शर्मा ने इस मुद्दे को और आगे बढ़ाते हुए चेतावनी दी कि यदि कोई भारत में खुले तौर पर संविधान की सर्वोच्चता को चुनौती देता है, तो इससे समान न्याय की नींव हिलती है। उनका तर्क है कि ऐसी चुनौतियाँ उन संस्थाओं में भरोसे को कमजोर कर सकती हैं, जिनका उद्देश्य धर्म या आस्था से परे हर नागरिक की रक्षा करना है। एक उकसाने वाले प्रतिवाद में उन्होंने कहा कि यदि संवैधानिक सर्वोच्चता पर सवाल उठाए जाते हैं, तो हिंदू भी अपने धार्मिक ग्रंथ—जैसे गीता—को मार्गदर्शक क़ानून के रूप में आगे रखने की बात करने लगेंगे।

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चीन का आरोप: अमेरिका “दुनिया का न्यायाधीश” नहीं बन सकता 🌍🔥

चीन ने अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति Nicolás Maduro की गिरफ्तारी और उनके न्यूयॉर्क ले जाने के कदम की कड़ी निंदा की है, इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कोई भी देश खुद को दुनिया का “पुलिसकर्मी” या “विश्व का न्यायाधीश” नहीं घोषित कर सकता — यह रुख चीन ने बार-बार दोहराया है।

चीनी अधिकारियों का कहना है कि ऐसे एकतरफा सैन्य या न्यायिक कदम राष्ट्रीय संप्रभुता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों का घोर अपमान हैं। उन्होंने अमेरिका से अपील की है कि वह बल प्रयोग और दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप जैसे व्यवहार बंद करे और विवादों का समाधान वार्ता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और क़ानूनी प्रक्रियाओं के जरिए करे।
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गंगा जल बँटवारा संधि पर पुनर्विचार: बदलते हालात, बढ़ती चिंताएँ

भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बँटवारा संधि अब एक अहम मोड़ पर खड़ी है। वर्ष 1996 में हुआ यह ऐतिहासिक समझौता, जिसके तहत बांग्लादेश को करीब 35,000 क्यूसेक पानी मिलता रहा, अब 30 साल पूरे कर 2026 में समाप्त होने जा रहा है। ऐसे में भारत ने संकेत दिए हैं कि वह इस संधि की शर्तों पर दोबारा विचार कर सकता है।

भारत में जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण, कृषि आवश्यकताओं और औद्योगिक विकास के कारण जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। इन्हीं घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखते हुए भारतीय अधिकारी गंगा जल संधि की अवधि और शर्तों की पुनर्समीक्षा के पक्ष में हैं। सूत्रों के अनुसार, भारत अब 30 साल की जगह 10 से 15 साल की अवधि वाला समझौता चाहता है, ताकि बदलती परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर संशोधन संभव हो सके।

इस बीच, पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौते को निलंबित करने के भारत के हालिया कदम ने भी क्षेत्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों से जुड़े मामलों में वह पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगा। इस फैसले ने बांग्लादेश की चिंताओं को और गहरा कर दिया है।

बांग्लादेश के लिए गंगा का पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि कृषि, आजीविका और सामाजिक स्थिरता का आधार है। यही कारण है कि भारत के सख्त रुख और संधि की समाप्ति की समय-सीमा ने ढाका में बेचैनी बढ़ा दी है। वहां के नीति-निर्माता आशंकित हैं कि नए समझौते में पानी की मात्रा या शर्तों में बदलाव हो सकता है।

स्पष्ट है कि 30 साल पहले की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ अब वैसी नहीं रहीं। गंगा जल बँटवारा संधि का भविष्य दोनों देशों के बीच संवाद, संतुलन और आपसी हितों की समझ पर निर्भर करेगा। आने वाला समय तय करेगा कि यह सहयोग नई शक्ल लेता है या जल कूटनीति में तनाव का नया अध्याय जुड़ता है।

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