(सोमनाथ मंदिर पर प्रथम आक्रमण के १००० वर्ष)
"सोमनाथ मंदिर बार-बार नष्ट किया गया और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़ा हुआ। पहले की तरह सशक्त-जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है।"
स्वामी विवेकानंद
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(सोमनाथ मंदिर पर प्रथम आक्रमण के १००० वर्ष)
"सोमनाथ मंदिर बार-बार नष्ट किया गया और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़ा हुआ। पहले की तरह सशक्त-जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है।"
स्वामी विवेकानंद
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🌹🙏श्रीरामचरितमानस 🙏🌹
🦋बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ
नहिं कछु केवट लेइ ।
बिदा कीन्ह करुनायतन
भगति बिमल बरु देइ ।।🦋
🌹🙏राम जी के चरण धोकर केवट ने राम लक्ष्मण सीता को गंगा पार उतारा है । राम जी उसे उतराइ देने लगे हैं , वह लेता नहीं है । राम सीता लक्ष्मण ने बहुत आग्रह किया पर केवट कुछ नहीं लेता है तब राम जी ने उसे निर्मल भक्ति का वर देकर विदा किया है । 🙏🌹
🌹🙏राम कृपा चाहते हैं तो केवल अपना कर्म कीजिए , बिना फल की इच्छा रखते हुए अपना कर्म करते रहिए, फिर राम कृपा की अनुभूति कीजिए । 🙏🌹
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मारने वाला है भगवान, बचाने वाला है भगवान #gaurd #killer #reelsvideoシ #healthwithdrmukesh
#त्रेतायुग की घटना है, जब भगवान #शिव अपनी अर्धांगिनी #माता_सती के साथ नंदी पर आरूढ़ होकर भूतल का भ्रमण कर रहे थे।
घूमते-घूमते वे दंडकारण्य पहुँचे। वहां उन्होंने देखा कि एक राजकुमार (श्रीराम) अपनी पत्नी के वियोग में साधारण मनुष्यों की तरह विलाप कर रहे हैं और वृक्षों-लताओं से सीता का पता पूछ रहे हैं।
जगदीश्वर महादेव, जो स्वयं पूर्ण ब्रह्म हैं, ने जब अपने आराध्य श्रीराम को देखा, तो वे भाव-विभोर हो उठे। उन्होंने दूर से ही "सच्चिदानंद" कहकर उन्हें प्रणाम किया। सती यह देखकर चकित रह गईं कि उनके स्वामी, जिन्हें संपूर्ण विश्व प्रणाम करता है, वे एक साधारण वनवासी राजकुमार को प्रणाम क्यों कर रहे हैं?
सती के मन में द्वंद्व उत्पन्न हो गया। उन्होंने शिवजी से पूछा, "हे नाथ! आप तो देवाधिदेव हैं। फिर आपने इस साधारण मनुष्य को प्रणाम क्यों किया, जो स्त्री के विरह में रो रहा है?"
भगवान शिव ने मुस्कुराकर कहा, "देवी! ये साधारण मनुष्य नहीं, साक्षात् भगवान विष्णु हैं, जो दुष्टों का संहार करने के लिए मनुष्य रूप में अवतीर्ण हुए हैं।" परंतु सती का संशय शांत नहीं हुआ। शिवजी ने जब देखा कि सती को उनकी बात पर विश्वास नहीं हो रहा, तो उन्होंने कहा— "यदि तुम्हें मेरे वचनों पर संशय है, तो तुम स्वयं जाकर उनकी परीक्षा ले लो। मैं तब तक इस वटवृक्ष के नीचे तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूँ।"
सती ने परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण किया और उसी मार्ग पर पहुँच गईं जहाँ श्रीराम आ रहे थे। उन्होंने सोचा कि यदि राम साधारण मनुष्य होंगे, तो वे उन्हें अपनी पत्नी 'सीता' समझकर गले लगा लेंगे।
परंतु जैसे ही वे श्रीराम के समीप पहुँचीं, प्रभु ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा— "हे माता! आप यहाँ वन में अकेली कैसे? भगवान शिव कहाँ हैं? आपने यह रूप क्यों धारण किया है?"
श्रीराम के इन वचनों को सुनकर सती स्तंभित रह गईं। उनका सारा अहंकार और संशय कपूर की भांति उड़ गया। वे लज्जित हो गईं कि उन्होंने साक्षात् पूर्ण ब्रह्म को पहचानने में भूल की और अपने स्वामी की बात का अनादर किया।
सती ने अपना असली रूप प्रकट किया और श्रीराम से पूछा, "प्रभो! आप साक्षात् विष्णु हैं, यह तो प्रमाणित हो गया। किंतु महादेव आपके भक्त क्यों बन गए? वे आपको प्रणाम क्यों करते हैं?"