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कारगिल की जमी हुई चोटियों पर जब मौत हर कदम पर घात लगाए बैठी थी, तब एक 19 वर्षीय सैनिक ने वह कर दिखाया जिसे इतिहास असंभव मानता था। गले और कंधे में कई गोलियाँ धंसी होने के बावजूद, हलवदार योगेंद्र सिंह यादव ने 60 फीट ऊँची बर्फीली चट्टान पर चढ़कर दुश्मन पर धावा बोला—और युद्ध की दिशा ही बदल दी।

3 जुलाई 1999, कारगिल युद्ध के निर्णायक क्षणों में, 18 ग्रेनेडियर्स की घातक प्लाटून के साथ योगेंद्र यादव ने टाइगर हिल पर हमला किया। दुश्मन की भारी गोलाबारी में उन्हें 15 गोलियाँ लगीं, फिर भी उन्होंने दुश्मन के बंकर तबाह किए, अपने साथियों तक अहम जानकारी पहुँचाई और हमले को सफल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

जब टाइगर हिल की चोटी पर तिरंगा फहराया गया, तो वह सिर्फ एक सैन्य विजय नहीं थी—वह भारतीय जज़्बे की जीत थी। इतनी कम उम्र में दिखाई गई इस अद्वितीय वीरता के लिए योगेंद्र सिंह यादव को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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🚩 बांग्लादेशी घुसपैठ और राजनीति: क्या अब जागने का समय है? 🚩

सोशल मीडिया पर इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक बयान तेज़ी से चर्चा में है, जिसने राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। अपने बयान में प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को कांग्रेस ने बसाया और वही उन्हें संरक्षण दे रही है, इसी वजह से वे SIR (Surveillance of Illegal Residents) जैसे कदमों का विरोध कर रहे हैं।

यह मुद्दा केवल सियासी बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन से जुड़ा एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।

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1971 का युद्ध, बसंतर की लड़ाई और 21 साल का अमर योद्धा — सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल
1971 के भारत-पाक युद्ध में लड़ी गई बसंतर की ऐतिहासिक लड़ाई भारतीय सैन्य इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। इसी रणभूमि पर मात्र 21 वर्ष की उम्र में अरुण खेतरपाल ने ऐसा साहस दिखाया, जिसने पीढ़ियों को प्रेरणा दी।
चारों ओर दुश्मन के टैंकों की घेराबंदी थी। उनका टैंक आग की लपटों में घिर चुका था। पीछे हटने की सलाह दी गई, लेकिन जवाब आया —
“मेरी तोप अभी चल रही है, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूँगा।”
यह शब्द आज भी गूंजते हैं। जलते टैंक के भीतर बैठे हुए अरुण खेतरपाल ने दुश्मन के कई टैंकों को ध्वस्त कर दिया और बसंतर सेक्टर में दुश्मन की बढ़त को रोक दिया। उन्होंने अंतिम सांस तक लड़ाई लड़ी और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनकी इस अद्वितीय वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र, भारत का सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता पुरस्कार, प्रदान किया गया।
इस रविवार रक्षा सूत्र कार्यक्रम में उनके अमर साहस की कहानी सुनिए — उनके भाई मुकेश खेतरपाल की स्मृतियों के माध्यम से। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि भारत के उस बेटे की गाथा है जो कर्तव्य और शौर्य की मिसाल बन गया।
कुछ वीर कभी मरते नहीं…
वे इतिहास में अमर हो जाते हैं।

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श्रीराम की परम कृपा: जब माता सीता के निंदक को यमराज ने भी ठुकरा दिया!

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राज्यपाल Lt Gen Gurmit Singh से आज लोक भवन में गुरुद्वारा स्त्री सत्संग, मोहिनी रोड, देहरादून की अध्यक्ष श्रीमती हरजीत कौर गंभीर, सचिव श्रीमती गुलशरण कौर राजन, संयुक्त सचिव श्रीमती कोमल दीप कौर गंभीर एवं ट्रेजरार श्रीमती रमिंदर कौर मान ने शिष्टाचार भेंट की।

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राज्यपाल Lt Gen Gurmit Singh से आज लोक भवन में गुरुद्वारा स्त्री सत्संग, मोहिनी रोड, देहरादून की अध्यक्ष श्रीमती हरजीत कौर गंभीर, सचिव श्रीमती गुलशरण कौर राजन, संयुक्त सचिव श्रीमती कोमल दीप कौर गंभीर एवं ट्रेजरार श्रीमती रमिंदर कौर मान ने शिष्टाचार भेंट की।

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राज्यपाल Lt Gen Gurmit Singh से आज लोक भवन में गुरुद्वारा स्त्री सत्संग, मोहिनी रोड, देहरादून की अध्यक्ष श्रीमती हरजीत कौर गंभीर, सचिव श्रीमती गुलशरण कौर राजन, संयुक्त सचिव श्रीमती कोमल दीप कौर गंभीर एवं ट्रेजरार श्रीमती रमिंदर कौर मान ने शिष्टाचार भेंट की।

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