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जय सियाराम सुमंगल सुप्रभात प्रणाम बन्धु मित्रों। राम राम जी।
श्रीरामचरितमानस नित्य पाठ पोस्ट ६१२, बालकाण्ड दोहा १५५/१-४, राजा प्रतापभानु कि कथा।
हृदय न कछु फल अनुसंधाना।
भूप बिबेक परम सुजाना।।
करइ जे धरम करम मन बानी।
बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी।।
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा।
मृगया कर सब साजी समाजा।।
विंध्याचल गंभीर बन गयऊ।
मृग पुनित बहु मारत भयऊ।।
भावार्थ:- राजा प्रतापभानु के मन में किसी फल की कामना न थी। राजा बड़ा ही बुद्धिमान, ज्ञानी था। वह कर्म, मन और वाणी से जो जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान वासुदेव को अर्पित करके करता था। एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजा कर विंध्याचल के घने जंगल में गया और वहां उसने बहुत से उत्तम - उत्तम हिरन थे।
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