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पहाड़ की इस बेटी से मिलेगी। ये है नीतू पंडित जो महज 22 साल की है और उनके जज्बे की बात करें तो आज फोरलेन पर 16 टायर (चक्की) का 35 टन भार क्षमता का कमर्शियल ट्राला चला रही है। नीतू सरकाघाट के समसौह गांव की रहने वाली है।
आपका बता दे नीतू पंडित को हैवी कमर्शियल लाइसेंस भी मिल चुका है इससे पहले सरकाघाट की ही नेहा ठाकुर ट्रक ड्राइविंग के लिए काफी सुर्खियां सोशल मीडिया पर बटोर चुकी है आशा करते हैं आप इस बेटी को भी उतना ही प्यार और सम्मान देंगे। हम नीतू पंडित के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते है। 💐👌💐
भारत में 13 से 19 जनवरी 2025 तक खो-खो का पहला वर्ल्ड कप नई दिल्ली में आयोजित होगा। इस आयोजन के लिए उत्तराखंड से तीन खिलाड़ी चुने गए हैं: महिला वर्ग में हल्द्वानी की अंजू आर्या, और पुरुष वर्ग में ऋषिकेश के अभिषेक त्रिशूलिया और लक्ष्मण ठाकुर। ये खिलाड़ी स्कूल स्तर से खो-खो खेल रहे हैं। वर्ल्ड कप में 24 देश भाग लेंगे, जिसमें 16 पुरुष और 16 महिला टीमें होंगी। प्रत्येक टीम में 18 सदस्य होंगे, जिनमें खिलाड़ी, कोच, मैनेजर और सपोर्ट स्टाफ शामिल होंगे
जंगल और खेत-खलिहानों में बीता बचपन
बागेश्वर की गरुड़ तहसील स्थित लखनी गांव की रहने वाली कमला देवी ने बताया, उनका बचपन गाय-भैंसों के साथ जंगल और खेत-खलिहानों के बीच बीता। छोटी उम्र में शादी हो गई तो घर, खेतीबाड़ी में ही लगी रहीं। पिता से मिली विरासत में कमला देवी न्यौली, छपेली, राजुला, मालूशाही, हुड़कीबोल आदि गीत गाती हैं।
गीत गाने का शौक था, लेकिन नहीं मिला मौका
कमला देवी ने बताया, उन्हें बचपन से गाने का शौक था, लेकिन कभी मौका नहीं मिला। एक दिन प्रसिद्ध जागर गायक शिरोमणि पंत से उनकी मुलाकात हुई और उन्होंने गाने का मौका दिया। पंत ने कहा, उत्तराखंडी लोकगीतों व संस्कृति को संरक्षित करने के लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा। वहीं, उनके पति गोपाल राम ने कहा, कमला की आवाज ने सालों बाद उनके परिवार और गांव को नई पहचान दी है।
फोटो साभार :- कमला देवी व कोक स्टूडियो
जंगल और खेत-खलिहानों में बीता बचपन
बागेश्वर की गरुड़ तहसील स्थित लखनी गांव की रहने वाली कमला देवी ने बताया, उनका बचपन गाय-भैंसों के साथ जंगल और खेत-खलिहानों के बीच बीता। छोटी उम्र में शादी हो गई तो घर, खेतीबाड़ी में ही लगी रहीं। पिता से मिली विरासत में कमला देवी न्यौली, छपेली, राजुला, मालूशाही, हुड़कीबोल आदि गीत गाती हैं।
गीत गाने का शौक था, लेकिन नहीं मिला मौका
कमला देवी ने बताया, उन्हें बचपन से गाने का शौक था, लेकिन कभी मौका नहीं मिला। एक दिन प्रसिद्ध जागर गायक शिरोमणि पंत से उनकी मुलाकात हुई और उन्होंने गाने का मौका दिया। पंत ने कहा, उत्तराखंडी लोकगीतों व संस्कृति को संरक्षित करने के लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा। वहीं, उनके पति गोपाल राम ने कहा, कमला की आवाज ने सालों बाद उनके परिवार और गांव को नई पहचान दी है।
फोटो साभार :- कमला देवी व कोक स्टूडियो
जंगल और खेत-खलिहानों में बीता बचपन
बागेश्वर की गरुड़ तहसील स्थित लखनी गांव की रहने वाली कमला देवी ने बताया, उनका बचपन गाय-भैंसों के साथ जंगल और खेत-खलिहानों के बीच बीता। छोटी उम्र में शादी हो गई तो घर, खेतीबाड़ी में ही लगी रहीं। पिता से मिली विरासत में कमला देवी न्यौली, छपेली, राजुला, मालूशाही, हुड़कीबोल आदि गीत गाती हैं।
गीत गाने का शौक था, लेकिन नहीं मिला मौका
कमला देवी ने बताया, उन्हें बचपन से गाने का शौक था, लेकिन कभी मौका नहीं मिला। एक दिन प्रसिद्ध जागर गायक शिरोमणि पंत से उनकी मुलाकात हुई और उन्होंने गाने का मौका दिया। पंत ने कहा, उत्तराखंडी लोकगीतों व संस्कृति को संरक्षित करने के लिए हम सबको मिलकर काम करना होगा। वहीं, उनके पति गोपाल राम ने कहा, कमला की आवाज ने सालों बाद उनके परिवार और गांव को नई पहचान दी है।
फोटो साभार :- कमला देवी व कोक स्टूडियो

देश की एक होनहार बेटी, कैप्टन शिवा चौहान बाधाओं को तोड़कर एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं।
राजस्थान की रहने वाली शिवा, दुनिया के सबसे ऊंचे और सबसे कठिन युद्धक्षेत्र सियाचिन पर तैनात होने वाली पहली महिला अधिकारी बनीं। उनके लिए यह उपलब्धि देश की सेवा करने का सपना देखने वाली हर लड़की के लिए एक संदेश है। कैप्टन शिवा ने एक इंटरव्यू में बताया कि यह उनके लिए सिर्फ एक नौकरी नहीं है बल्कि जीवन जीने का एक तरीका है।
हालांकि, यह कोई आसान काम नहीं है, इसके लिए आपको शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत होना होता है और हर तरह की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना पड़ता है।
चट्टानों पर चढ़ना और ठंडी हवाओं का सामना करना, जैसी कई बड़ी-बड़ी चुनौतियाँ आती हैं। कैप्टन शिवा ने देश की सेवा के लिए एक दृढ़ संकल्प लिया और हर मुश्किल के लिए खुद की तैयार किया।
कैप्टन शिवा का साहस हर उस लड़की और उनके परिवार के लिए प्रेरणा है, जिन्हें आज भी लगता है कि ऐसी मुश्किल जगहें महिलाओं के लिए नहीं है।
#शान_से_सीनियर
“मुझे एक्टिव रहना पसंद है और मेरा मानना है कि अगर आप के पास कोई हॉबी या हुनर हो, तो उसे इस्तेमाल करना ही चाहिए। एक बार आप शुरुआत कर लेते हैं, तो फिर उम्र कोई मायने नहीं रखती।”
मुंबई में अपने बेटे तुषार और बहु प्रीति के साथ रहनेवाली कोकिला पारेख कभी एक सामान्य गृहिणी और माँ की तरह घर का काम देखती थीं। उनके घर में आया कोई भी मेहमान उनके स्पेशल मसाले से बनी चाय पिए बिना वापस नहीं जाता, और जाते-जाते थोड़ा सा मसाला अपने साथ भी पैक करके ले जाता।
लॉकडाउन के समय जब कोई कोकिलाबेन के घर नहीं आ सकता था, और ना वह कहीं आ-जा पा रही थीं; तब उनके पास काफी खाली समय था। इसका उपयोग करने के लिए, उन्होंने अपने चाय मसाले को बिज़नेस में बदलने के बारे में सोचा।
कोकिला ने अक्टूबर 2020 में अपने परिवार की मदद से एक छोटे से चाय मसाला बिज़नेस की शुरुआत की और इस तरह 79 की उम्र में जीवन की एक नई पारी की शुरुआत भी कर दी। उन्होंने अपने और अपने बेटे तुषार के नाम को मिलाकर इसका नाम ‘KT चाय मसाला’ रखा।
जिस समय, उन्होंने इस चाय मसाला को बेचना शुरू किया था, उस वक्त हर घर में कोरोना के डर से लोग काढ़ा बनाकर पी रहे थे। ऐसे में कोकिला को लगा कि उनका मसाला लोगों की इम्युनिटी बढ़ाने का काम भी करेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। देखते ही देखते उनका मसाला देश भर में बिकने लगा।
आज कोकिला हर दिन 500 से ज्यादा चाय मसाला के पैकेट्स बेच रही हैं, जो 50 ग्राम, 100 ग्राम और 250 ग्राम के पैकेट्स में आते हैं और इनकी कीमत 125 रुपये से लेकर 625 रुपये तक है।
उन्होंने अपने इस चाय मसाला बिज़नेस में भी सिर्फ उन महिलाओं को काम दिया है, जो काफी गरीब परिवार से आती हैं।
आज 80+ की उम्र में अपने हुनर और सोच के कारण वह एक सफल बिज़नेसवुमन हैं।