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भारत पाकिस्तान बॉर्डर पर तनोट माता मंदिर में हमारे जवानों द्वारा की गई आरती की एक झलक
🙏#जय_माता_दी 🙏

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"मेरे परदादा नेहरू ने संविधान को 17 बार बदला।

मेरी दादी इंदिरा ने इसे 28 बार बदला, जिसमें आपातकाल के दौरान अवैध रूप से प्रस्तावना भी शामिल थी।

मेरे डैडी राजीव ने इसे 10 बार बदला।

मेरी इटालियन मम्मी (मौन सिंह) ने इसे 7 बार बदला।

अगर मैं 2024 का चुनाव जीत गया तो मैं MSP और जाति आधारित आरक्षण देने के लिए संविधान बदल दूंगा।

लेकिन, अगर आप मोदी को वोट देते हैं और उन्हें 400 से अधिक सीटें मिलती हैं तो वह संविधान में संशोधन कर देंगे और हमारे देश में आग लग जाएगी।

केवल मेरे परिवार को संविधान बदलने का दैवीय अधिकार है।"

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संविधान में अब तक 106 से अधिक बार संशोधन किया जा चुका है।

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राहुल गांधी का झूठ बेनकाब !

जनजातीय समाज और राष्ट्रपति पद को चुनावी मुद्दा बना रहे राहुल गांधी।

■ झूठ - राहुल गांधी ने कहा, "जनजातीय समाज से आने के कारण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में जाने से रोका।"

■ सच - विश्व हिन्दू परिषद ने राष्ट्रपति से मिलकर उन्हें राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा में आने का निमंत्रण दिया था।

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वामपंथियों ने अंबडेकर को कहा था "गद्दार"

अंबेडकर के खिलाफ नेहरू ने किया प्रचार !

ये हम नहीं कह रहे, इतिहास कह रहा है।

बात 1952 की है, देश का पहला आमचुनाव हो रहा था। डॉ. अंबेडकर नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे चुके थे और उत्तरी मुंबई से चुनाव लड़ रहे थे। उन्हें हराने के लिए नेहरु और कम्युनिस्ट पार्टी ने हाथ मिला लिया। कांग्रेस ने बाबा साहेब अंबेडकर के खिलाफ नारायण कजरोलकर को अपना उम्मीदवार बनाया। देश के प्रधानमंत्री नेहरू दो बार डॉ. अंबेडकर के खिलाफ प्रचार करने के लिए मुंबई गये। वहीं कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया बने श्रीपद अमृत दांगे ने पर्चे बंटवाये जिसमें डॉ. अंबेडकर को खुलेआम "देशद्रोही" कहा गया।

चुनाव में जमकर धांधली हुई और डॉ. अंबेडकर करीब 14 हज़ार मतों से चुनाव हार गये। हैरत की बात है कि इन चुनावों में पूरे 78 हज़ार वोट कैंसिल किये गये थे।

1952 में अपनी चुनावी हार के बाद डॉ. अंबेडकर ने अदालत में केस दायर किया। जिसमें उन्होने आरोप लगाया गया कि कॉमरेड श्रीपद अमृत दांगे की अगुआई में वामपंथियों ने उनके खिलाफ चुनाव में धोखाधड़ी की है। इन चुनावों में 78 हज़ार वोट रद्द हो गये थे। डॉ अंबेडकर ने दावा किया कि वामपंथियों ने उनके खिलाफ गलत प्रचार किया था।

चुनाव में हार ने बाबा साहब को बुरी तरह तोड़ दिया, बाबा साहब बीमार पड़ गए, बाबा कई योजनाएं बना रखी थी जिसपर उन्हें लोकसभा में जाने के बाद काम करना था। ऐसे में 2 साल बाद 1954 में महाराष्ट्र के भंडारा में हुए उपचुनाव में वे दोबारा चुनावी मैदान में उतरे। लेकिन इसबार फिर से कांग्रेस ने उनके खिलाफ उम्मीदवार खड़े कर दिया, इसबार भी बाबा साहब की 8 हजार वोटों से हार हुई।

भंडारा की हार के बाद वो और ज्यादा बीमार रहने लगे और 6 दिसंबर 1956 को उनका दुःखद निधन हो गया।

बाबा साहब के नाम का इस्तेमाल करने वाली कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी की ये सच्चाई है जो इतिहास के गर्भ में छिपी हुई है।

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