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किशनगढ़ के राजा मानसिंह राठौड़ की बहन चारूमति राठौड़ की खूबसूरती के किस्से सुनकर औरंगजेब ने मानसिंह से कहा कि हम तुम्हारी बहन से शादी करेंगे
मानसिंह बादशाह को मना करने की स्थिति में नहीं थे, पर चारुमति राठौड़ ने इस विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि यदि ऐसा हुआ, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी
राजा मानसिंह ने अपने कुटुम्ब के लोगों से बातचीत कर फैसला किया कि मुगल बादशाह के खिलाफ जाना समूचे राजपूताने में मेवाड़ महाराणा राजसिंह जी के ही बस की बात है
राजा ने बहन से कहा कि तुम खुद महाराणा को पत्र लिखो, इससे महाराणा के चित्त पर प्रभाव पड़ेगा और वे मना नहीं करेंगे
चारुमति राठौड़ ने पत्र में लिखा "आप एकलिंग महादेव के उपासक व महाराणा प्रताप के प्रपौत्र हैं। जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी से विवाह किया, उसी प्रकार यदि आपने मुझसे विवाह कर उस मुगल बादशाह आलमगीर (औरंगजेब) के पंजे से ना छुड़ाया, तो मैं विष खा लूंगी और ये अपराध आपके सिर रहेगा"
इस पत्र के साथ ही एक और पत्र राजा मानसिंह ने महाराणा को लिखा कि "यदि आप हमारी इच्छा से चारुमति को ले जायेंगे, तो औरंगजेब हमें जीवित नहीं छोड़ेगा। आप अपनी फौज के साथ यहां आकर हमें कैद कर चारुमति से विवाह करके ले जाइयेगा, जिससे की बादशाह को हम पर शक ना हो"
महाराणा राजसिंह ने सहर्ष प्रस्ताव स्वीकार किया और जैसा कि तय हुआ था, महाराणा ने राजा मानसिंह को एक महल में बन्द किया व सबका आना-जाना बन्द करवाकर रानी चारुमति राठौड़ से विवाह कर मेवाड़ पधारे
औरंगज़ेब ने रानी चारूमति को लाने के लिए जो डोले भेजे थे, वो जब खाली लौटे तो औरंगजेब तिलमिला उठा पर मन मसोसकर रह गया