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#चितौड़गढ़ के पहले #जौहर की वीरांगनाओं को याद करने के साथ साथ हमें #मेवाड़ के 2 कोहीनूर ( #गोरा - #बादल) को भी याद करना चाहिए। ये वही महावीर योद्धा थे, जिन्होंने दिल्ली जाकर, ख़िलजी की हलक से रावल रत्न सिंह को आजाद किया था...इन्ही दो परमवीरो के ऊपर ,उस इतिहास को दर्शाती कुछ लाइनें लिख रहा हूँ , जो मेवाड़ के राजकवि प. नरेंद्र मिश्र जी द्वारा लिखी गयी है..
● दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई कुर्बानी
जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
रावल रत्न सिंह को छल से कैद किया खिलजी ने
कालजई मित्रों से मिलकर दगा किया खिलजी ने
खिलजी का चित्तौड़दुर्ग में एक संदेशा आया
जिसको सुनकर शक्ति शौर्य पर फिर अँधियारा छाया
दस दिन के भीतर न पद्मिनी का डोला यदि आया
यदि ना रूप की रानी को तुमने दिल्ली पहुँचाया
तो फिर राणा रत्न सिंह का शीश कटा पाओगे
शाही शर्त ना मानी तो पीछे पछताओगे
यह दारुण संवाद लहर सा दौड़ गया रण भर में
यह बिजली की तरह क्षितिज से फैल गया अम्बर में
महारानी हिल गयीं शक्ति का सिंहासन डोला था
था सतित्व मजबूर जुल्म विजयी स्वर में बोला था
रुष्ट हुए बैठे थे सेनापति गोरा रणधीर
जिनसे रण में भय खाती थी खिलजी की शमशीर
अन्य अनेको मेवाड़ी योद्धा रण छोड़ गए थे
रत्न सिंह की संधि नीति से नाता तोड़ गए थे
पर रानी ने प्रथम वीर गोरा को खोज निकाला
वन वन भटक रहा था मन में तिरस्कार की ज्वाला
गोरा से पद्मिनी ने खिलजी का पैगाम सुनाया
मगर वीरता का अपमानित ज्वार नहीं मिट पाया
बोला मैं तो बहुत तुच्छ हू राजनीति क्या जानूँ
निर्वासित हूँ राज मुकुट की हठ कैसे पहचानूँ
बोली पद्मिनी, समय नहीं है वीर क्रोध करने का
अगर धरा की आन मिट गयी घाव नहीं भरने का
दिल्ली गयी पद्मिनी तो पीछे पछताओगे
जीते जी राजपूती कुल को दाग लगा जाओगे
राणा ने जो कहा किया वो माफ़ करो सेनानी
यह कह कर गोरा के क़दमों पर झुकी पद्मिनी रानी
यह क्या करती हो गोरा पीछे हट बोला
और राजपूती गरिमा का फिर धधक उठा था शोला
महारानी हो तुम सिसोदिया कुल की जगदम्बा हो
प्राण प्रतिष्ठा एक लिंग की ज्योति अग्निगंधा हो
जब तक गोरा के कंधे पर दुर्जय शीश रहेगा
महाकाल से भी राणा का मस्तक नहीँ कटेगा
तुम निश्चिन्त रहो महलो में देखो समर भवानी
और खिलजी देखेगा केसरिया तलवारो का पानी
राणा के सकुशल आने तक गोरा नहीँ मरेगा
एक पहर तक सर कटने पर धड़ युद्ध करेगा
एक लिंग की शपथ महाराणा वापस आएँगे
महा प्रलय के घोर प्रभंजन भी न रोक पाएँगे
शब्द शब्द मेवाड़ी सेनापति का था तूफानी
शंकर के डमरू में जैसे जाएगी वीर भवानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई कुर्बानी
खिलजी मचला था पानी में आग लगा देने को
पर पानी प्यास बैठा था ज्वाला पी लेने को
गोरा का आदेश हुआ सज गए सात सौ डोले
और बाँकुरे बदल से गोरा सेनापति बोले
खबर भेज दो खिलजी पर पद्मिनी स्वयं आती है
अन्य सात सौ सखियाँ भी वो साथ लिए आती है
स्वयं पद्मिनी ने बादल का कुमकुम तिलक किया था
दिल पर पत्थर रख कर भीगी आँखों से विदा किया था
और सात सौ सैनिक जो यम से भी भीड़ सकते थे
हर सैनिक सेनापति था लाखो से लड़ सकते थे
एक एक कर बैठ गए सज गयी डोलियाँ पल में
मर मिटने की होड़ लग गयी थी मेवाड़ी दल में
हर डोली में एक वीर था चार उठाने वाले
पांचो ही शंकर के गण की तरह समर मतवाले
बजा कूच का शंख सैनिकों ने जयकार लगाई
हर हर महादेव की ध्वनि से दशों दिशा लहराई
गोरा बादल के अंतस में जगी जोत की रेखा
मातृ भूमि चित्तौड़दुर्ग को फिर जी भरकर देखा
कर अंतिम प्रणाम चढ़े घोड़ो पर सुभट अभिमानी
देश भक्ति की निकल पड़े लिखने वो अमर कहानी
जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी
दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई कुर्बानी
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