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नंदा राजजात स्थगित!
हमारे अध्यात्म और संस्कृति व परंपरा का समागम — नंदा राजजात।
इतिहास से हमारा गंभीर साक्षात्कार — नंदा राजजात।
चाहे नंदा राजजात हो या लोकजात हो, दोनों की तिथियाँ और आवश्यकताएँ परंपरागत तरीके से निर्धारित होती आ रही हैं। इस बार ऐसा क्या खास है कि नंदा राजजात को 1 वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया है?
इस क्षेत्र में मौसम तो हमेशा से बेगाना रहा है। सुतोल और सूफखंड क्षेत्र में यात्रा हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। फिर 2013–14 से अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति तो उत्तराखंड के न अतीत में रही, न भविष्य में कभी 2013–14 जैसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और तब नंदा राजजात सुगमता और सुचारू रूप से, सुव्यवस्थित तरीके से संचालित हुई थी।
#nandarajjat #uttarakhandculture #lokparampara #sanatanparampara #devbhoomi #faithandtradition #uttarakhand

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नंदा राजजात स्थगित!
हमारे अध्यात्म और संस्कृति व परंपरा का समागम — नंदा राजजात।
इतिहास से हमारा गंभीर साक्षात्कार — नंदा राजजात।
चाहे नंदा राजजात हो या लोकजात हो, दोनों की तिथियाँ और आवश्यकताएँ परंपरागत तरीके से निर्धारित होती आ रही हैं। इस बार ऐसा क्या खास है कि नंदा राजजात को 1 वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया है?
इस क्षेत्र में मौसम तो हमेशा से बेगाना रहा है। सुतोल और सूफखंड क्षेत्र में यात्रा हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। फिर 2013–14 से अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति तो उत्तराखंड के न अतीत में रही, न भविष्य में कभी 2013–14 जैसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और तब नंदा राजजात सुगमता और सुचारू रूप से, सुव्यवस्थित तरीके से संचालित हुई थी।
#nandarajjat #uttarakhandculture #lokparampara #sanatanparampara #devbhoomi #faithandtradition #uttarakhand

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नंदा राजजात स्थगित!
हमारे अध्यात्म और संस्कृति व परंपरा का समागम — नंदा राजजात।
इतिहास से हमारा गंभीर साक्षात्कार — नंदा राजजात।
चाहे नंदा राजजात हो या लोकजात हो, दोनों की तिथियाँ और आवश्यकताएँ परंपरागत तरीके से निर्धारित होती आ रही हैं। इस बार ऐसा क्या खास है कि नंदा राजजात को 1 वर्ष के लिए स्थगित कर दिया गया है?
इस क्षेत्र में मौसम तो हमेशा से बेगाना रहा है। सुतोल और सूफखंड क्षेत्र में यात्रा हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। फिर 2013–14 से अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति तो उत्तराखंड के न अतीत में रही, न भविष्य में कभी 2013–14 जैसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है और तब नंदा राजजात सुगमता और सुचारू रूप से, सुव्यवस्थित तरीके से संचालित हुई थी।
#nandarajjat #uttarakhandculture #lokparampara #sanatanparampara #devbhoomi #faithandtradition #uttarakhand

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कैप्टन हंसा शर्मा ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। उन्हें आगामी गणतंत्र दिवस परेड में 251 आर्मी एविएशन स्क्वाड्रन का नेतृत्व करने के लिए चुना गया है - एक ऐसा सम्मान जो साहस, कौशल और नेतृत्व का प्रतीक है।
कैप्टन हंसा शर्मा भारतीय सेना की पहली महिला पायलट हैं जिन्होंने अत्याधुनिक रुद्र सशस्त्र हेलीकॉप्टर उड़ाया। इससे पहले उन्होंने नासिक स्थित कॉम्बैट आर्मी एविएशन ट्रेनिंग स्कूल (CAATS) में फर्स्ट इन ऑर्डर ऑफ मेरिट हासिल कर इतिहास बनाया और प्रतिष्ठित सिल्वर चीता ट्रॉफी जीतने वाली पहली महिला बनीं।
परेड की रिहर्सल के दौरान कैप्टन हंसा शर्मा को HELINA मिसाइल सिस्टम से लैस कमांड व्हीकल में अपनी स्क्वाड्रन का नेतृत्व करते देखा गया - जो न सिर्फ सेना की आधुनिक युद्ध क्षमताओं को दर्शाता है, बल्कि उनके अग्रणी नेतृत्व को भी रेखांकित करता है।
कैप्टन हंसा शर्मा आज उन हजारों युवतियों के लिए प्रेरणा हैं जो वर्दी में देश सेवा का सपना देखती हैं।
#captainhansjasharma #indianarmy #womeninuniform #republicdayparade #armyaviation #rudrahelicopter #helina #narishakti #indiandefense #prideofindia #yourstoryhindi

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लुधियाना के पक्खोवाल रोड स्थित शादी समारोह से सोने के गहनों और शगुन के लिफाफों से भरा बैग चोरी, चोर फरार

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मुगल आक्रांताओं से मातृभूमि की रक्षा में अपने जीवन का क्षण-क्षण समर्पित करने वाले अमर बलिदानी योद्धा, मेवाड़ गौरव महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

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Shame on Humanity: In Haryana, a 9-year-old girl was made pregnant by her 11-year-old brother. This is not just a crime, it is a brutal reflection of moral collapse, parental failure, and a society that keeps failing its children. Where protection was needed, silence and neglect ruled.
#haryana

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गोरखपुर के एक स्कूल में उस दिन कोई शोर नहीं था,
लेकिन एक पिता की सिसकियों ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया।
सुबह जब वह आदमी अपनी छोटी-सी बेटी का हाथ थामे स्कूल पहुँचा,
तो उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था,
आँखों में कोई धमकी नहीं थी—
बस डर, बेबसी और टूटे हुए इंसान की थकी हुई उम्मीद थी।
बेटी ने कई दिनों से कहा था—
“पापा, मुझे स्कूल मत भेजो… टीचर मारती हैं…”
लेकिन पिता ने सोचा—
शायद बच्चा है, बहाना बना रही होगी।
क्योंकि उसे भरोसा था—
स्कूल मंदिर होते हैं, वहाँ डर नहीं सिखाया जाता।
आज वह खुद क्लास में गया।
जैसे ही बच्ची ने अपनी टीचर को देखा,
उसका छोटा-सा शरीर काँप गया…
वह तुरंत पिता के सीने से चिपक गई,
मानो वही उसकी दुनिया का आख़िरी सुरक्षित कोना हो।
और फिर…
जो हुआ, उसने देखने वालों की आँखें नम कर दीं।
वह पिता—
जिसने अपनी बेटी को माँ के बिना पाला,
जिसने अपने आँसू कभी दिखाए नहीं—
आज सबके सामने हाथ जोड़कर रो पड़ा।
काँपती आवाज़ में बस इतना बोला—
“मैडम… अब इसे मत मारना…
मैंने इसे बिना माँ के पाला है…”
न कोई आरोप,
न कोई झगड़ा,
न कोई ऊँची आवाज़।
बस एक टूटे हुए पिता की विनती—
जो अपनी बेटी को पढ़ा तो सकता है,
लेकिन उसके डर को अकेले नहीं झेल सकता।
बच्ची डर के मारे पिता से और ज़ोर से लिपट गई,
जैसे कह रही हो—
“पापा, मुझे छोड़कर मत जाना…”
🌸 यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं है
यह उन हज़ारों बच्चों की कहानी है
जो पढ़ना चाहते हैं,
लेकिन डर के साए में नहीं।
यह उन शिक्षकों से एक मौन सवाल है—
अनुशासन और डर में फर्क समझिए।
डाँट से सुधार हो सकता है,
डर से नहीं।
और यह समाज से एक अपील है—
अगर कोई बच्चा स्कूल से डरता है,
तो उसे ज़िद्दी मत कहिए…
पहले उसकी आँखों में झाँकिए।
क्योंकि
बच्चों की यादें किताबों से नहीं,
व्यवहार से बनती हैं।
और जिस दिन स्कूल डर की जगह बन जाए—
उस दिन शिक्षा हार जाती है।
🙏 हर उस पिता के सम्मान में,
जो बेटी के लिए भगवान से नहीं,
इंसानों से हाथ जोड़कर गुहार लगाता है।
🙏 हर उस बच्ची के लिए,
जो पढ़ना चाहती है—
डरना नहीं।

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गोरखपुर के एक स्कूल में उस दिन कोई शोर नहीं था,
लेकिन एक पिता की सिसकियों ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया।
सुबह जब वह आदमी अपनी छोटी-सी बेटी का हाथ थामे स्कूल पहुँचा,
तो उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था,
आँखों में कोई धमकी नहीं थी—
बस डर, बेबसी और टूटे हुए इंसान की थकी हुई उम्मीद थी।
बेटी ने कई दिनों से कहा था—
“पापा, मुझे स्कूल मत भेजो… टीचर मारती हैं…”
लेकिन पिता ने सोचा—
शायद बच्चा है, बहाना बना रही होगी।
क्योंकि उसे भरोसा था—
स्कूल मंदिर होते हैं, वहाँ डर नहीं सिखाया जाता।
आज वह खुद क्लास में गया।
जैसे ही बच्ची ने अपनी टीचर को देखा,
उसका छोटा-सा शरीर काँप गया…
वह तुरंत पिता के सीने से चिपक गई,
मानो वही उसकी दुनिया का आख़िरी सुरक्षित कोना हो।
और फिर…
जो हुआ, उसने देखने वालों की आँखें नम कर दीं।
वह पिता—
जिसने अपनी बेटी को माँ के बिना पाला,
जिसने अपने आँसू कभी दिखाए नहीं—
आज सबके सामने हाथ जोड़कर रो पड़ा।
काँपती आवाज़ में बस इतना बोला—
“मैडम… अब इसे मत मारना…
मैंने इसे बिना माँ के पाला है…”
न कोई आरोप,
न कोई झगड़ा,
न कोई ऊँची आवाज़।
बस एक टूटे हुए पिता की विनती—
जो अपनी बेटी को पढ़ा तो सकता है,
लेकिन उसके डर को अकेले नहीं झेल सकता।
बच्ची डर के मारे पिता से और ज़ोर से लिपट गई,
जैसे कह रही हो—
“पापा, मुझे छोड़कर मत जाना…”
🌸 यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं है
यह उन हज़ारों बच्चों की कहानी है
जो पढ़ना चाहते हैं,
लेकिन डर के साए में नहीं।
यह उन शिक्षकों से एक मौन सवाल है—
अनुशासन और डर में फर्क समझिए।
डाँट से सुधार हो सकता है,
डर से नहीं।
और यह समाज से एक अपील है—
अगर कोई बच्चा स्कूल से डरता है,
तो उसे ज़िद्दी मत कहिए…
पहले उसकी आँखों में झाँकिए।
क्योंकि
बच्चों की यादें किताबों से नहीं,
व्यवहार से बनती हैं।
और जिस दिन स्कूल डर की जगह बन जाए—
उस दिन शिक्षा हार जाती है।
🙏 हर उस पिता के सम्मान में,
जो बेटी के लिए भगवान से नहीं,
इंसानों से हाथ जोड़कर गुहार लगाता है।
🙏 हर उस बच्ची के लिए,
जो पढ़ना चाहती है—
डरना नहीं।

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गोरखपुर के एक स्कूल में उस दिन कोई शोर नहीं था,
लेकिन एक पिता की सिसकियों ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया।
सुबह जब वह आदमी अपनी छोटी-सी बेटी का हाथ थामे स्कूल पहुँचा,
तो उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था,
आँखों में कोई धमकी नहीं थी—
बस डर, बेबसी और टूटे हुए इंसान की थकी हुई उम्मीद थी।
बेटी ने कई दिनों से कहा था—
“पापा, मुझे स्कूल मत भेजो… टीचर मारती हैं…”
लेकिन पिता ने सोचा—
शायद बच्चा है, बहाना बना रही होगी।
क्योंकि उसे भरोसा था—
स्कूल मंदिर होते हैं, वहाँ डर नहीं सिखाया जाता।
आज वह खुद क्लास में गया।
जैसे ही बच्ची ने अपनी टीचर को देखा,
उसका छोटा-सा शरीर काँप गया…
वह तुरंत पिता के सीने से चिपक गई,
मानो वही उसकी दुनिया का आख़िरी सुरक्षित कोना हो।
और फिर…
जो हुआ, उसने देखने वालों की आँखें नम कर दीं।
वह पिता—
जिसने अपनी बेटी को माँ के बिना पाला,
जिसने अपने आँसू कभी दिखाए नहीं—
आज सबके सामने हाथ जोड़कर रो पड़ा।
काँपती आवाज़ में बस इतना बोला—
“मैडम… अब इसे मत मारना…
मैंने इसे बिना माँ के पाला है…”
न कोई आरोप,
न कोई झगड़ा,
न कोई ऊँची आवाज़।
बस एक टूटे हुए पिता की विनती—
जो अपनी बेटी को पढ़ा तो सकता है,
लेकिन उसके डर को अकेले नहीं झेल सकता।
बच्ची डर के मारे पिता से और ज़ोर से लिपट गई,
जैसे कह रही हो—
“पापा, मुझे छोड़कर मत जाना…”
🌸 यह कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं है
यह उन हज़ारों बच्चों की कहानी है
जो पढ़ना चाहते हैं,
लेकिन डर के साए में नहीं।
यह उन शिक्षकों से एक मौन सवाल है—
अनुशासन और डर में फर्क समझिए।
डाँट से सुधार हो सकता है,
डर से नहीं।
और यह समाज से एक अपील है—
अगर कोई बच्चा स्कूल से डरता है,
तो उसे ज़िद्दी मत कहिए…
पहले उसकी आँखों में झाँकिए।
क्योंकि
बच्चों की यादें किताबों से नहीं,
व्यवहार से बनती हैं।
और जिस दिन स्कूल डर की जगह बन जाए—
उस दिन शिक्षा हार जाती है।
🙏 हर उस पिता के सम्मान में,
जो बेटी के लिए भगवान से नहीं,
इंसानों से हाथ जोड़कर गुहार लगाता है।
🙏 हर उस बच्ची के लिए,
जो पढ़ना चाहती है—
डरना नहीं।

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