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!! नर्मदा नदी के हर पत्थर में हैं शिव आखिर क्यों..!!
प्राचीनकाल में नर्मदा नदी ने बहुत वर्षों तक तपस्या करके ब्रह्माजी को प्रसन्न किया। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा। नर्मदाजी ने कहा:- ’ब्रह्मा जी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे गंगाजी के समान कर दीजिए।’
ब्रह्माजी ने मुस्कराते हुए कहा - ’यदि कोई दूसरा देवता भगवान शिव की बराबरी कर ले, कोई दूसरा पुरुष भगवान विष्णु के समान हो जाए, कोई दूसरी नारी पार्वतीजी की समानता कर ले और कोई दूसरी नगरी काशीपुरी की बराबरी कर सके तो कोई दूसरी नदी भी गंगा के समान हो सकती है।'
ब्रह्माजी की बात सुनकर नर्मदा उनके वरदान का त्याग करके काशी चली गयीं और वहां पिलपिलातीर्थ में शिवलिंग की स्थापना करके तप करने लगीं।
भगवान शंकर उनपर बहुत प्रसन्न हुए और वर मांगने के लिए कहा।
नर्मदा ने कहा - ’भगवन्! तुच्छ वर मांगने से क्या लाभ...? बस आपके चरणकमलों में मेरी भक्ति बनी रहे।'
नर्मदा की बात सुनकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हो गए और बोले - ’नर्मदे! तुम्हारे तट पर जितने भी प्रस्तरखण्ड (पत्थर) हैं, वे सब मेरे वर से शिवलिंगरूप हो जाएंगे। गंगा में स्नान करने पर शीघ्र ही पाप का नाश होता है, यमुना सात दिन के स्नान से और सरस्वती तीन दिन के स्नान से सब पापों का नाश करती हैं परन्तु तुम दर्शनमात्र से सम्पूर्ण पापों का निवारण करने वाली होगी। तुमने जो नर्मदेश्वर शिवलिंग की स्थापना की है, वह पुण्य और मोक्ष देने वाला होगा।’
भगवान शंकर उसी शिवलिंग में लीन हो गए। इतनी पवित्रता पाकर नर्मदा भी प्रसन्न हो गयीं। इसलिए कहा जाता है ‘नर्मदा का हर कंकर शिव शंकर है।'
🔱☘️ !! हर हर महादेव !! 🔱☘️
शर्मनाक स्थिति संस्कृत यूनिवर्सिटी के बच्चे नहीं, दारुल उलूम के बनेंगे अग्निवीर…😠
घोर शर्मनाक है उस भारत देश के लिये जहां संस्कृत में पढ़ाने वाले गुरुओं ने गुरुकुल से धर्म, संस्कृति सहित 64 कलाओं की विद्या दी, सेना ही नही बनायी बल्कि हज़ारों लाखों राजाओं की निर्मिती करी, एक से बढ़कर एक धुरंधर वीर शूरवीर और महावीर बनायें जिनका आज तक विश्व ही नही ब्रह्मांड में अमर नाम है।
इसलिए इस देश की हिंदुवादी सरकार के द्वारा इस देश में आज़ादी में योगदान देने वाले बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी सहित 18 विश्वविद्यालयों को सेना की भर्ती सूची से बाहर के दिया गया। देवभाषा संस्कृत का ऐसा अपमान संवैधानिक और शासकीय तौर पर कभी नही हुआ है। वर्तमान में मैं संस्कृत विद्यार्थी नहीं हूँ लेकिन नैतिक रूप में संस्कृत के इस अपमान पर आपत्ति ही नही बल्कि निंदा कर सभी संस्कृतभाषी, संस्कृतप्रेमी, आचार्यों, शास्त्रीयों एवं गुरुजनों से निवेदन करता हूँ कि इसका विरोध सड़क पर, शासकीय तौर पर जाना ही चाहिए।
इस फ़ैसले को यदि भारतीय लोग, संस्कृत के मुर्धन्य विद्वान वापिस नही करा पाये तो यह भारत में संस्कार, संस्कृति के पतन के बाद संस्कृत को समाप्त करने को न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की विनाशकरी नीति बनेगी।
और दारुल उलूम जैसे मदरसे क्या कर रहे हैं उसके बारे में लिखने जी आवश्यकता नही…
और यह सब स्तिथि IAS से लेकर हर जगह बड़ती जा रही है…क्यूँकि हिंदू गांधारी बन उसी डाल को काटने दे रहे हैं जिससे उनके वजूद है लेकिन मोदी जी के ग़लत फ़ैसलों पा भी मौन बनकर तमाशा देख रहे हैं…
धिक्कार हो…