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"विश्वगुरु" बनने का सपना और जमीनी हकीकत!
एक तरफ चीन का भारी-भरकम शिक्षा बजट ($800, और दूसरी तरफ हमारे देश के ये आंकड़े ($12। क्या वाकई हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?
सच्चाई कड़वी है, लेकिन ज़रूरी है—क्या देश का युवा सिर्फ 5 किलो मुफ्त राशन पर निर्भर रहेगा, या उसे बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलेंगे? 80 करोड़ लोगों की निर्भरता विकास है या लाचारी?
भारत का बजट और एक कड़वी सच्चाई!
आंकड़े साफ बता रहे हैं— जहाँ हर वर्ग के उत्थान के लिए करोड़ों का बजट आवंटित किया गया है, वहीं सामान्य श्रेणी के लिए यह आंकड़ा शून्य नजर आता है।
सवाल यह है कि क्या सामान्य वर्ग की भूमिका सिर्फ टैक्स भरने तक सीमित रह गई है? क्या 'सबका साथ, सबका विकास' में सामान्य वर्ग शामिल नहीं है?
ऊपर से UGC जैसे काले कानून को और लागू कर दिया।
समाज को अब इस पर विचार करना होगा। आपकी इस पर क्या राय है? कमेंट में लिखें। 👇
व्यवस्था का यह दोहरा चरित्र देखिए
क्या यही समानता है? यह सवाल हम सबका है।
जब देश के विकास और टैक्स देने की बात आती है, तो हम गर्व से 'हिन्दुस्तानी' होते हैं।
जब धर्म और राजनीति को समर्थन चाहिए होता है, तो हमें 'हिन्दू' कहकर याद किया जाता है।
लेकिन जब सरकारी योजनाओं, सुविधाओं और हक़ की बात आती है... तो अचानक हम 'सवर्ण' हो जाते हैं और कतार से बाहर कर दिए जाते हैं।
ऊपर से UGC जैसे काले कानून और लगा देते।