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52 w - çevirmek

कांग्रेस आईटी सेल ने राहुल गांधी की फ्लाइट में बिठाकर ली गई, एक तस्वीर डालकर लिखा कि देखो यह कहलाती है, सादगी!
ऐसा लिखने वाले को सबसे पहले यह पता नहीं है कि आज भी नब्बे फीसदी भारतीय आबादी के लिए फ्लाइट में बैठना, उनके हिस्से की सादगी को परिभाषित नहीं करता।
दूसरी बात सोशल मीडिया की थोड़ी सी भी समझ रखने वाले को पता है कि यह तस्वीर सिर्फ एक PR स्टंट है
राहुल गांधी एसपीजी प्रोटेक्टिव हैं बिना उनकी इजाजत के इस तरह कोई प्लेन में उनकी तस्वीर नहीं ले सकता और उनके आसपास कोई आम यात्री नहीं बैठ सकता
यह एसपीजी प्रोटोकॉल है आसपास उनके ही लोगों को बिठाया गया और बाकायदा एक फोटो शूट करवाया गया ताकि दुनिया को यह बताया जा सके की यूं तो राहुल गांधी के जीजा भले ही 22 प्राइवेट जेट रखते हैं उनकी ब्लूब्रिज एविएशन कंपनी भाड़े पर प्राइवेट जेट देती है लेकिन राहुल गांधी जनता पर एहसान कर रहे हैं कि वह इकोनॉमी क्लास में सफर कर रहे हैं
तीसरी बात राहुलजी की छुट्टियां और सादगी से कौन ऐसा जागरूक भारतीय होगा जो परिचित नहीं होगा। वे तो बचपन से सादगी पसंद रहे हैं। उनके चार्टर प्लेन और बिजनेस क्लास का शौक किसी से छुपा है क्या?
जब पिताजी प्रधानमंत्री थे तब उनकी माता जी के इटली के दोस्त आईएनएस विक्रांत को ड्यूटी से हटकर बाकायदा 25 दिनों तक समुद्र में क्रूज जैसी छुट्टियां मनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था

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पाकिस्तान के एक हिंदू रवि कुमार और एक लड़की ने भारत के वीजा के लिए अप्लाई किया क्योंकि पाकिस्तान में हिंदुओं पर बहुत जुल्म होता है
लेकिन दो बार उनका वीजा रिजेक्ट हो गया
और उसी समय उनके एरिया में एक ही हिन्दू परिवार के 7 हिन्दू बच्चों का जबर्दस्ती धर्मांतरण करवा दिया गया फिर वह बिना किसी वीजा के बिना किसी दस्तावेज़ के चुपचाप इंटरनेशनल बॉर्डर पार करके भारत में आने का प्लानिंग किया
क्योंकि दोनों तरफ मीलो लंबा रेगिस्तान है वह पैदल चलते-चलते भारत की सीमा में आ तो गए लेकिन अफसोस रेगिस्तान में प्यास से दोनों का मौत हो चुका था
2 दिन के बाद चरवाहों ने जब उनकी लाश देखी और पुलिस को बताया और जब उनकी तलाशी ली गई और पाकिस्तान के रेंजर से संपर्क किया गया तब उनकी यह दुखद कहानी सामने आई
PMO India
Narendra Modi
Dr S. Jaishankar
लेकिन पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास पाकिस्तानी हिंदुओं को वीजा जारी करने में इतना सख्त क्यों रहता है

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“भाजपा का कांग्रेसीकरण”
भारतीय जनता पार्टी धीरे धीरे कांग्रेस बनने के तरफ अग्रसर है, ये बात अलग है कि कांग्रेस उससे भी तेज गति से मुस्लिम लीग बनती जा रही है।
अब बीजेपी में वो बात नहीं रही, जो एक ज़माने में हुआ करती थी। पिछले दिनों में मनीष कश्यप और राजा सिंह जैसे दो कट्टर हिन्दू नेताओं ने पार्टी को टाटा-बाय बाय कर दिया।
मैं ये नहीं कहता कि इन दोनों के या किसी के जाने से भाजपा खत्म हो जाएगी लेकिन इसके जो दूरगामी प्रभाव होगें आइए थोडा विस्तार से बताता हूं ........ 👇👇
दोनों ने साफ कह दिया कि हिन्दुत्व से कोई समझौता नहीं होगा, लेकिन बीजेपी का सिस्टम अब सहन नहीं होता। कार्यकर्ताओं को सिर्फ दिखावे में सम्मान मिलता है, असल में नहीं।
अब ये दोनों क्या बोले, कितना सही बोले, वो पार्टी जाने—but ये तय है कि जब ज़मीनी नेता छोड़-छोड़ कर जा रहे हैं, तो कहीं न कहीं अंदर ही अंदर पार्टी सड़ रही है।
बीजेपी पहले वो पार्टी थी जो अनुशासन, संगठन और विचारधारा के लिए जानी जाती थी। जनसंघ से लेकर मोदी युग तक बीजेपी ने कई उतार-चढ़ाव देखे।
अटल, आडवाणी और जोशी की तिकड़ी से होते हुए आज मोदी, शाह और नड्डा की तिकड़ी तक बात आ पहुंची है। लेकिन इस ट्रांजिशन में पार्टी की आत्मा कहीं खो सी गई है। पहले बीजेपी में विचार चलता था, अब सिर्फ आदेश चलते हैं।
मोदी-शाह के नेतृत्व में पार्टी ने बहुत से बाहरी नेताओं को अपनाया, जो कांग्रेस छोड़कर आए। और इनमें से कई आज बीजेपी में ऊँची कुर्सियों पर बैठकर चमक रहे हैं।

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घटना 19 मार्च 2013 की है जब प्रदेश में सपा सरकार थी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे।
इटावा जिले का संतोषपुर गांव और गांव के सब से प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति शिव कुमार बाजपेई।
सपाई ब्राह्मण थे बेचारे..
शिव कुमार बाजपेई की पत्नी उर्मिला बाजपेई अपने घर में बैठी थीं। एकाएक 20 -25 आदमी घर में प्रवेश करते हैं और उर्मिला बाजपेई.......
आगे पढ़िए .... 👇
उर्मिला बाजपेयी को लातों से मारना शुरू कर देते हैं। वह गिर जाती हैं , उनका बाल और पैर पकड़कर खींचते हुए बाहर लाते हैं।
उनके मुख पर कालिख पोतते हैं,
उनके गले में जूतों और चप्पलों की माला पहनाते हैं और उन्हें गांव में घुमाते हैं....
और जब वे दर्द और अपमान से रोते हुए अपना मुंह हथेलियों से छुपाना चाहती हैं तो उनका हाथ पीछे बांध देते हैं।
आपको यह घटना अविश्वसनीय लगती होगी लेकिन इसमें एक-एक शब्द अखबारों का है। तारीख 20 मार्च 2013)
उर्मिला बाजपेई का दोष क्या था?
कोई दोष नहीं। घटना कुछ इस तरह थी कि उनके पति शिव कुमार बाजपेई के पड़ोसी प्रदीप त्रिपाठी के बेटे के साथ राज बहादुर यादव की बेटी फरार हो गई।
प्रदेश में यादव शासन था....
और यादवों की लड़की भागी थी....
तो पुलिस को तो सक्रिय होना ही था।
बेटा न मिला तो बाप ही सही।
पुलिस ने प्रदीप त्रिपाठी को पकड़ मंगाया और कुछ दिन तो थाने में उन्हें बैठाकर, प्रताड़ित करके लड़के का पता पूछती रही और जब वह नहीं बता पाए तो उन्हें जेल भेज दिया।
उर्मिला बाजपेई के पति शिवकुमार का दोष बस इतना था कि वह प्रदीप त्रिपाठी की जमानत के लिए भागदौड़ कर रहे थे।
शिव कुमार बाजपेई के सिर्फ इस गुनाह के कारण ही उनकी पत्नी उर्मिला बाजपेई के मुंह पर कालिख पोत कर, चप्पलों की माला पहनाकर और हाथ पीछे बांधकर पूरे गांव में घुमाया गया और उसके बाद यादवों का झुंड पूरे गांव में घूमा।
जो भी ब्राह्मण सामने मिलता, उसे पीट-पीटकर गिरा देते और बेहद फूहड़ गालियां बकते हुए तथा औरतों को घर से निकाल कर पूरे गांव में नंगी घुमाने की धमकी देते हुए।
गांव के प्राय: सभी ब्राह्मण परिवार घर के अंदर बंद , भय से कांप रहे थे और बाहर यादवों का चीख- चीख कर गालियां देने का क्रम चालू था।
गांव के कुछ युवक हिम्मत करके पुलिस स्टेशन पहुंचे लेकिन वहां कोई सुनवाई नहीं हुई।
यह सूचना कुछ ही देर में पूरे जिले में फैल गई और करीब 7 घंटे बाद आई. जी. के आदेश पर गांव में पी.ए.सी तैनात हुई और यादवी अत्याचार रुका।
लेकिन अभी सपा छाप पुलिस का परिचय बाकी है। इतने शर्मनाक कांड के बाद और ग्राम प्रधान सुशील यादव सहित कई पर नाम सहित की गई रिपोर्ट पर भी पुलिस ने एक भी गिरफ्तारी नहीं की।
लेकिन पीड़ित परिवारों को सांत्वना देने गए लोगों में जिसमें ब्राह्मण सभा और परशुराम सेना के पदाधिकारी भी शामिल थे, उनमें से एक दर्जन से अधिक लोगों को जेल भेज दिया गया कि इनसे शांति भंग का अंदेशा है।
और जानते हैं कि शासन स्तर पर क्या हुआ ?
पीड़ितों का एक दल जीप में लदकर इटावा से लखनऊ पहुंचा और ब्राम्हण प्रतिनिधि तथा मुख्यमंत्री का विश्वासपात्र समझकर राज्य सरकार के मंत्री अभिषेक मिश्र से मिला।
उस दिन (20 मार्च 2013) प्रायः सभी अखबारों में यह घटना बहुत विस्तार से छपी थी । अतःश्री अभिषेक मिश्र जी भी इससे पूरी तरह अवगत थे लेकिन उन्होंने यह कह कर प्रतिनिधिमंडल को लौटा दिया कि यह मुख्यमंत्री के जिले का मामला है,
मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।
वही ब्राह्मण द्रौही अभिषेक मिश्र सपा में आज भी हैं।
माता प्रसाद पाण्डेय भी सपा का मोहरा बने हैं।
अयोध्या के पवन पाण्डेय सदैव अखिलेश यादव की चापलूसी में रहता है कि क्षेत्र के सारे ब्राम्हण वोट उनके कारण सपा को मिलेंगे।
लम्भुआ के संतोष पाण्डेय भी भगवान परसुराम की दुहाई देकर ब्राह्मणों से वोट मांगते हैं।
यह एक बानगी है उस जंगलराज की जब एक यादव सिपाही अपने अधिकारी दरोगा को बिल्ला उतरवा लेने की धमकी देता था।
बहुतों को याद होगा हजरतगंज (लखनऊ ) के सी.ओ अतर सिंह यादव की जिसने अपने एस.एस.पी. को कभी सैल्यूट नहीं किया बल्कि हमेशा उनसे हाथ मिलाया।
एस.एस .पी .की भी बर्दाश्त करने की मजबूरी थी क्योंकि अतर सिंह के नाम के साथ 'यादव' जुड़ा था।
यादवी सेना ने हजरतगंज में जीप की बोनट पर एक पुलिस अधिकारी को घुमाया था।
वह बोनट पर न बैठ जाता तो सरेआम उसे कुचल देते। पीसीएस परीक्षाओं में आधे एसडीएम यादव चुने जाते थे।
सब छोड़िए,,,
आपको झांसी की घटना याद है ?
अखिलेश यादव के ही कार्यकाल का है। 20 जनवरी 2014 को क्षेत्र के जाने-माने भाजपा नेता बृजेश तिवारी अपनी पत्नी ,बेटे और भतीजे के साथ जा रहे थे।
एक स्थानीय स.पा. नेता तेजपाल यादव के नेतृत्व में करीब एक दर्जन सपाइयों ने उन्हें घेर लिया और बृजेश तिवारी सहित उनके पूरे परिवार को भून डाला।
पूरे शहर में जैसे मातम छा गया।
हत्या की रिपोर्ट लिखी गई। तत्कालीन पुलिस एस.पी. अपर्णा गांगुली के नेतृत्व में पुलिस ने तेज कार्यवाही की और पुलिस ने शीघ्र ही हत्या में प्रयुक्त हथियार सहित मुख्य अभियुक्त तेजपाल यादव को गिरफ्तार कर लिया।
एस.पी.अपर्णा गांगुली ने प्रेस को बताया कि साक्ष्य तो यही मिल रहे हैं कि हत्या राजनीतिक कारणों से की गई है।

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