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श्रीमती मनोरमा देवी जी, उम्र 60 वर्ष, पैर में घाव, हाथ में छड़ी।
घर से निकलते ही छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चलती दिखीं मुझे। लिफ्ट देने के लिए उन्हें गाड़ी में बैठाया। मुझे सुन्दरपुर जाना था और उन्हें दुर्गाकुण्ड। पता नहीं क्यों, पर मन किया कि पहले उन्हें पहुंचा दें, फिर अपने काम करें।
मैंने सोचा वह दुर्गाकुंड दर्शन के लिए जा रही हैं। पर बातचीत के दौरान पता चला कि वह इस उम्र में अपनी आजीविका के लिए काम करती हैं। प्रतिदिन 4 किलोमीटर टेंपो बदल-बदल कर अपने कार्य स्थल पर पहुंचती हैं और रात में उनके दयालु नियोक्ता उन्हें अपनी गाड़ी से घर पहुंचा देते हैं।
यह भी जानकारी मिली कि वह मेरे बचपन के मित्र प्रेमप्रकाश की भाभी हैं। घर से इतना कम निकलती हैं कि मुझसे कभी भेंट ही नहीं होती। हालांकि उनकी विधवा पेंशन मैंने ही प्रारम्भ करवाई थी।
उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हार नही मानना है और सदैव प्रसन्नचित्त रहना है।
श्रीमती मनोरमा देवी जी, उम्र 60 वर्ष, पैर में घाव, हाथ में छड़ी।
घर से निकलते ही छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चलती दिखीं मुझे। लिफ्ट देने के लिए उन्हें गाड़ी में बैठाया। मुझे सुन्दरपुर जाना था और उन्हें दुर्गाकुण्ड। पता नहीं क्यों, पर मन किया कि पहले उन्हें पहुंचा दें, फिर अपने काम करें।
मैंने सोचा वह दुर्गाकुंड दर्शन के लिए जा रही हैं। पर बातचीत के दौरान पता चला कि वह इस उम्र में अपनी आजीविका के लिए काम करती हैं। प्रतिदिन 4 किलोमीटर टेंपो बदल-बदल कर अपने कार्य स्थल पर पहुंचती हैं और रात में उनके दयालु नियोक्ता उन्हें अपनी गाड़ी से घर पहुंचा देते हैं।
यह भी जानकारी मिली कि वह मेरे बचपन के मित्र प्रेमप्रकाश की भाभी हैं। घर से इतना कम निकलती हैं कि मुझसे कभी भेंट ही नहीं होती। हालांकि उनकी विधवा पेंशन मैंने ही प्रारम्भ करवाई थी।
उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हार नही मानना है और सदैव प्रसन्नचित्त रहना है।
श्रीमती मनोरमा देवी जी, उम्र 60 वर्ष, पैर में घाव, हाथ में छड़ी।
घर से निकलते ही छड़ी के सहारे धीरे-धीरे चलती दिखीं मुझे। लिफ्ट देने के लिए उन्हें गाड़ी में बैठाया। मुझे सुन्दरपुर जाना था और उन्हें दुर्गाकुण्ड। पता नहीं क्यों, पर मन किया कि पहले उन्हें पहुंचा दें, फिर अपने काम करें।
मैंने सोचा वह दुर्गाकुंड दर्शन के लिए जा रही हैं। पर बातचीत के दौरान पता चला कि वह इस उम्र में अपनी आजीविका के लिए काम करती हैं। प्रतिदिन 4 किलोमीटर टेंपो बदल-बदल कर अपने कार्य स्थल पर पहुंचती हैं और रात में उनके दयालु नियोक्ता उन्हें अपनी गाड़ी से घर पहुंचा देते हैं।
यह भी जानकारी मिली कि वह मेरे बचपन के मित्र प्रेमप्रकाश की भाभी हैं। घर से इतना कम निकलती हैं कि मुझसे कभी भेंट ही नहीं होती। हालांकि उनकी विधवा पेंशन मैंने ही प्रारम्भ करवाई थी।
उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, हार नही मानना है और सदैव प्रसन्नचित्त रहना है।
