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ज़िंदगी ने तारीख़ दी-
दिल को हाज़िर करने की।
कहती है इसे अदा समझो-
जीने में माहिर करने की।
उसको जिद है अपने जादू से-
मुझको साहिर करने की।
मैंने कहा मैं आदमी अदब का-
बात क्यूँ शातिर करने की।
फिर रूठ गई ये कहकर वो-
बात न कभी फिर करने की।
ठुकरा के उसकी चालें-
इन होठों को स्थिर करने की।
मैंने चुकाई है अक्सर क़ीमत-
नाराज़गी ज़ाहिर करने की।
रिश्तों का संतुलित अनुपात निकाल देते थे।
प्यार से नफ़रत की औक़ात निकाल देते थे।।
जिस तरह निकाल देते हैं दालों से पत्थर-
पुराने लोग बिगड़ी हुई बात निकाल देते थे।
इंसानियत मोहताज नही थी सुविधा की-
गर्मी में गत्ते की हवा से रात निकाल देते थे।
पहचान कर चोट जिस्म की है या रूह की-
मिलकर मुश्किल हालात निकाल देते थे।
इकट्ठे हो के मोहल्ले में बिन किसी मुहूर्त के-
बच्चे गुड्डे-गुड़ियों की बारात निकाल देते थे।
घुटते नही थे मन ही मन किसी बात को ले-
साथियों के बीच सारे जज़्बात निकाल देते थे।
उड़ जाते थे शामियाने जब किसी ग़रीब के-
सब लोग मदद की कनात निकाल देते थे।
अब ख़ुशियाँ नही बाँटी जाती बस्तियों में-
पहले ख़ुशियों की सौग़ात निकाल देते थे।
वो वक़्त था सिनेमा के किरदारों का ‘शेखर’-
छोटे से संवाद में पूरे ख्यालात निकाल देते थे।
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जो जिया है वही लिखा है।
वही लिखा है जो जिया है।।
हमने हथेली पर लेकर के-
घूँट घूँट जीवन पिया है।
दुनिया भर की बात सुनी हैं,
ख़ुद को चुप कर,ख़ुद को चुप कर।
हमने उनको भी देखा है,
जो देख रहे थे हमको छुप कर।
इन मतलब के स्तंभों पर,
रिश्तों का विश्वास टिका है।
जो जिया है वही लिखा है,
वही लिखा है जो जिया है।।
आँखों के दोनों कोरों में-
चाँद चमका,चाँद चमका।
बारी बारी निकला आसूँ-
एक ख़ुशी का,एक ग़म का।
अम्बर में बादल का खिलौना-
कभी बना है कभी मिटा है।
जो जिया है वही लिखा है,
वही लिखा है जो जिया है।।
एक जुगनू दीपक से बोला-
लड़ो तिमिर से,लड़ो तिमिर से।
हर लेंगे हम भी अंधियारा-
हम क्या कम हैं कहो मिहिर से।
उम्मीदों की इन्ही ज़िदों पर-
दर्द थोक के भाव बिका है।
जो जिया है वही लिखा है।
वही लिखा है जो जिया है।।
जो कहते हैं बोलो कि कहाँ-
सन्नाटा है,सन्नाटा है,
उनके तन्हापन को अपनी,
तन्हाई में काटा है।
सबके साथ चले हम उतना-
जितना हमसे सफ़र निभा है।
जो जिया है वही लिखा है।
वही लिखा है जो जिया है।।
जो कतरा कतरा
आती हैं,
उन यादों का एक
समंदर हुआ करता था।
आज जहाँ ये
मकान है,
वहाँ कभी घर हुआ
करता था।
हाँ,इसी कोने से जहाँ
ये नाश्ते के लिए
कुर्सियाँ मेज़ रखी हैं,
और उस कोने तक
जहाँ उस
दीवार में टंगे
छीके में प्लेटें सहेज रखी हैं।
वहीं सब ख़ाली
बोरियों को बिछा कर
एक साथ ख़ाना
खाया करते थे,
जमीं पर पड़ी
प्लेटों को एक दूसरे
के लिए सरकाया
करते थे।
लकड़ियों का गठ्ठर
रखा होता था,
माँ की फूँक के
इशारे पर चूल्हा
धधका होता था।
हाँ,यहीं रसोई वाला
छप्पर हुआ करता था।
आज जहाँ ये
मकान है,
वहाँ कभी घर हुआ
करता था।
ये जहाँ अपना
गोलू बैठकर
मोबाइल चला रहा है,
वो जहाँ सोफ़े पर बैठा
टॉमी अपनी
पूँछ हिला रहा है।
वहीं मोहल्ले
के ख़ास दोस्तों के
साथ हम डाकन
डब्बा करते थे,
रूठ जाने मना लेने
का खेल कुट्टा अब्बा
खेला करते थे।
हमारी गाय का बछड़ा
और बकरी
का मेमना यहीं
गुलाची मारा करते थे,
यहीं एक खिलौना
लेकर हम हमारा-
तुम्हारा करते थे।
यहाँ कच्चा आँगन था
और उसमें
परिंदों से आबाद एक
शज़र हुआ करता था।
आज जहाँ ये
मकान है,
वहाँ कभी घर हुआ
करता था।
….और वो जहाँ
कार और स्कूटी खड़ी है,
वह जगह जहाँ
चप्पल जूतों से
दराज़ें अटी पड़ी हैं।
वहाँ बापू की
साइकल खड़ी हुआ
करती थी,
गर्म फुंकनी से
निशां करी चप्पलें
बेतरतीब पड़ी हुआ
करती थी।
जहाँ ये चौबीस घंटे बंद रहने
वाला दरवाज़ा है,
उस पर जो घंटी का
बटन लगा है,
वहाँ अंट-शंट लकड़ी
तारों से बना हुआ
एक दरवाज़ा था,
उस पर आने जाने वालों का
मज़मा दिन भर
हुआ करता था।
आज जहाँ ये
मकान है,
वहाँ कभी घर हुआ
करता था।
बात जारी रहेगी….🙏🙏
पर्दा गिरा कर क्या होगा।
राज छुपा कर क्या होगा।।
ज़ख़्म लगा हो दिल पर-
दवा पिला कर क्या होगा।
हवा तुम्हारे ख़िलाफ़ हो-
धूआँ उड़ा कर क्या होगा।
कोई तुम्हें अनसुना कर दे-
फिर चिल्ला कर क्या होगा।
जब झूठ नंगा हो जाये तो-
नज़र बचा कर क्या होगा।
जिसका हल साधारण है-
घुमा फिरा कर क्या होगा।
अपने मतलब की ख़ातिर-
अपने बिखरा कर क्या होगा-
ख़ुद को आगे ले जाने में-
ग़ैरों को गिरा कर क्या होगा।
‘शेखर’ चलो फ़ैसला कर लें-
बात बढ़ा कर क्या होगा।
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