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दुनिया ने हमेशा छल को समझदारी का नाम दिया है। यहाँ जो सबसे चालाक है, वही सबसे बुद्धिमान माना जाता है।
लोग अपने फायदे के लिए योजनाएँ बनाते हैं, सच को मोड़ते हैं, रिश्तों को साधन बना लेते हैं।
पर इस सबके बीच मैंने कभी छल को नहीं चुना....
मैने #कृष्ण को चुना। क्योंकि कृष्ण कोई तुलना नहीं हैं, वो तो स्वयं में पूर्ण हैं।
अगर आज दुनिया छल की तरफ़ भाग रही है, तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसने उस महान छलिये को उसकी गहराई में उतरकर देखा ही नहीं।
कृष्ण को लोग छलिया कहते हैं,
पर उनके हर खेल के पीछे सृष्टि का संतुलन था। उन्होंने जीवन को प्रयोगशाला बनाया, कभी प्रेम का प्रयोग, कभी विरह का,
कभी युद्ध का,कभी गहन खामोशी का। और हर प्रयोग के बाद कुछ टूटा नहीं, कुछ बचा....धर्म, करुणा और आशा।
मुझे इसीलिए उन पर अटूट भरोसा है, क्योंकि जिसने पूरी सृष्टि को इतने धैर्य से रचा हो,
वो मेरे दुखों को अनदेखा नहीं कर सकता।
मैं जानती हूँ कृष्ण सीधे मेरे सामने नहीं आएँगे।
वो हमेशा किसी न किसी रूप में आते हैं,
कभी किसी अजनबी की बात बनकर,
कभी अचानक मिले सहारे बनकर,
कभी किसी ऐसे इंसान के रूप में जो बिना जाने
मेरे लिए दुआ बन जाता है।
और मुझे पूरा विश्वास है
कि जब मेरा हृदय सच में टूटेगा, जब बोझ असहनीय होगा, तो कृष्ण किसी को ज़रिया बनाकर
इसी धरती पर भेजेंगे, मेरे दुखों से मुझे मुक्ति दिलाने के लिए।
क्योंकि जो सृष्टि का रचयिता है,
वो अपने विश्वास करने वाले को
कभी अकेला नहीं छोड़ता ही नहीं है...
कृष्ण में रमने वाला एक जिद्दी भक्त का भाव है मुझमें..
जो कभी मुझे भीतर से खत्म नहीं होने देता।
और जो विश्वास मेरे इष्ट पर है,
वही मेरी सबसे बड़ी ताक़त है,
जो हमेशा बनी रहनी चाहिए।
सुप्रभात🙏🏻
आप सभी का दिन मंगलमय हो 🙏🏻🌺
Note
“यह मेरी स्वयंलिखित रचना है। कृपया बिना उचित क्रेडिट दिए कॉपी-पेस्ट न करें। आप इसे मेरे पेज के वॉटरमार्क के साथ ही साझा कर सकते हैं।”
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