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सांस्कृतिक-झरोखा
हिमालय के प्रहरी - परमवीर मेजर शैतानसिंह
मैं संभवत: तीसरी कक्षा में था, तब मेजर शैतानसिंह शहीद हुए थे | तब उनकी कीर्ति का बखान करने वाली एक काव्य कृति ‘परमवीर’ के नाम से डॉ॰ नारायणसिंह भाटी की आई थी, जिसके कुछ दोहे मुझे आज भी याद है—
‘पांणी जठै पँयाळ में, उण धर ऊग्यौ रूंख |
छाँय करी हिम डूंगरां, ऊजाळी धर कूख ||’
घमसाणां घमसांण में, सीस झुकीजै सेस |
अबकालै घमसांण में, हरगिर झुकण अंदेस||
परमवीर मेजर शैतानसिंह आधुनिक भारत को गौरवान्वित करनेवाले वीर योद्धा हैं, जिन्होंने सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में अद्भुत वीरता दिखाई | जैसलमेर के भाटी राजवंश में रावल घड़सी (घट्टसी) के उत्तराधिकारी रावल केहर के बड़े पुत्र केल्हण के वंशज राव बरसिंह बीकमपुर में शासक थे | बरसिंहोत भाटियों की बाप-अंचल से बीकमपुर तक के क्षेत्र में अमलदारी रही | फलोदी के पास ही बाणासर, जिसे स्थानीय लोग छीला भी पुकारते हैं, परमवीर मेजर शैतानसिंह की जन्मभूमि रही है | यह गाँव अब परमवीर के नाम से शैतानसिंहनगर कहलाता है| शैतानसिंहनगर जोधपुर-फलोदी रेलवे लाइन पर रेलवे स्टेशन भी है |
लेफ्टिनेंट कर्नल हेमसिंह के यहाँ इस वीर का जन्म 1 दिसम्बर1924 में हुआ| जोधपुर की सुप्रसिद्ध स्कूल चौपासनी में इनकी शिक्षा-दीक्षा हुई | राजपूत बालकों के लिए यह स्कूल एक ऐसा गुरुकुल था, जहां अक्षर ज्ञान के साथ ही शौर्य, स्वास्थ्य और स्वाभिमान स्वत: ही रग-रग में उतर आता था | फुटबाल का खेल और जिमनास्टिक यहाँ पढने वाले बालकों को सर्वाधिक लुभाते थे | गीता में भगवान श्री कृष्ण के उपदेश को महत्वपूर्ण बताते हुए स्वामी विवेकानंदजी ने युवाओं को फुटबाल खेलने का परामर्श दिया था, ताकि वे स्वस्थ और बलवान बनें और गीता के मर्म को साकार कर सकें -
‘अर्जुन को गीता का ज्ञान | इसीलिए देते भगवान |
क्योंकि अर्जुन बड़ा बली था| वीरत्व की कुंदकली था|
जब बाणों को लहराता था | रण में काल उतरआता था|
इसीलिए भारत के लाल | तुम सब खेलो रे ! फुटबाल |’
चौपासनी स्कूल स्वामी विवेकानंदजी के सपनों को साकार करने वाला स्थल था, जहां अभावग्रस्त क्षेत्रों की प्रतिभाएं निखरती थीं | अंग्रेजों के समय के ‘विक्टोरिया क्रास’( रिसालदार गोविन्दसिंह) से लेकर आजाद भारत के सर्वोच्च सैनिक सम्मान ‘परमवीर-चक्र’ ( मेजर शैतानसिंह ) तक इस स्कूल के विद्यार्थियों ने प्राप्त किये हैं | युवा शैतानसिंह के मन में इस स्कूल ने जो शौर्य-संस्कृति के बीज बोये थे वे ‘परमवीर-चक्र’ के रूप में प्रस्फुटित हुए| सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ॰ नारायणसिंह भाटी जो उन दिनों इस स्कूल के पढ़ते थे, परमवीर-काव्य की भूमिका में उनके व्यक्तित्व के सम्बन्ध में लिखते हैं—
‘श्री शैतानसिंह जिस प्रताप-हाउस (बोर्डिंग भवन) में रहा करते थे, उसी हाउस में रहने के कारण उनके निरंतर संपर्क में आने का मुझे बराबर सौभाग्य मिलता रहा था | वर्षों तक हम साथ रहे | उनका सभी विद्यार्थी बड़ा सम्मान करते थे | वे बहुत कम बोलते थे और सादगी उनकी मुख्य पसन्द थी | क्रोध में आना तो वे कभी जानते ही नहीं थे | उनका जीवन वास्तव में बड़ा निश्छल और निर्मल था | चौपासनी स्कूल का बच्चा-बच्चा ही नहीं अपितु जोधपुर के अधिकाँश विद्यार्थी उन्हंन फुटबाल के असाधारण खिलाडी के नाते भली प्रकार जानते थे |....हमारे एक अध्यापक ऐसे अवश्य थे जो उन्हें इतना शांत देख कर कभी – कभी मजाक के तौर पर कहा करते थे – यह बहुत सीधा लड़का है, पर कभी बहुत बड़ी शैतानी करेगा | शायद उनके ये शब्द चरितार्थ होने के लिए 18 नवंबर 62 के युद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे |’
1 अगस्त 1949 को कुमाऊं रेजीमेंट में उन्हें कमीशन मिला था | चीन के आक्रमण के समय मेजर शैतानसिंह की 13 वीं बटालियन चुशूल क्षेत्र में तैनात थी | भारतीय नेताओं की ‘हिन्दी-चीनी भाई- भाई’ की नीति की असफलता की यह लड़ाई अब एक ऐतिहासिक कहानी बन कर रह गई है | देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन रक्षामंत्री वी. के. कृष्ण मेनन आदर्शवाद और सिद्धांतों की स्वप्न-निद्रा में सोये हुए थे | वे चीन की सामरिक तैयारियों से अनजान थे और हमारे फौजी कमाण्डर उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे | तत्कालीन समय का सच्च जबकि कुछ और ही कह रहा था –
‘अपने हिमगिरि को सुनसान बताते हो ,
कच्छ के रन को बियाबान बताते हो ,
दे रहे हो दुश्मन को धरित्री-सीता और,
अपने को तुम राम की संतान बताते हो?
हिमालय भारत का मुकट रहा है, उसे सुनसान बताने वाली नजरें कितनी खोखली और मदान्ध थी, इतिहास इसका आकलन कर चुका है | सितम्बर 1962 में जब चीन भारतीय सीमा में घुस आया तब भी हमारे नेता नहीं जागे थे और ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के नारे लगा रहे थे | देश उबल रहा था, जनता जवाबी कार्यवाही चाहती थी, पर सरकार की नींद खुल नहीं रही थी | पहल के अवसर तो वह खो ही चुकी थी | ‘परम वीर चक्र’ पुस्तक के लेखक मेजर जनरल इयान कारडोजो ने इन दिनों का विवेचन करते हुए लिखा है – ‘अब सरकार ने जनता को शांत करने के लिए अपने आप को अचानक साहसी और निर्णायक बनाने बनाने का फैसला किया | इससे पहले कि कोई वरिष्ठ अधिकारी चीनी खतरे का आकलन करने के लिए नामका चू पहुँचता, सरकार ने इलाके को चीनियों से खाली कराने का आदेश फ़ौज को दे दिया | इसके बावजूद प्रधानमंत्री व रक्षा मंत्री यह भी मानते रहे कि चीनी भारत पर बड़े पैमाने पर आक्रमण नहीं करेंगे | वे भारतीय जनता को मूर्ख बनाने का प्रयास भी करते रहे | रक्षा मंत्री ने सेना-प्रमुख को आदेश दिया | सेना-प्रमुख ने कमांडर को, कमांडर ने स्थानीय ब्रिगेड कमांडर को नामका चू भेज दिया |
1956 ई. में 19 रियासतों का एकीकरण होने के बाद राजस्थान राज्य बना। इन 19 रियासतों में 16 रियासतें राजपूतों की, 2 जाटों की और एक मुस्लिम रियासत थी।
गुहिल वंशी राजपूतों की 5 रियासतें मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ व शाहपुरा थीं। राठौड़ राजपूतों की 3 रियासतें मारवाड़, बीकानेर व किशनगढ़ थीं। चौहान राजपूतों की 3 रियासतों में कोटा और बूंदी हाड़ा चौहानों की रियासतें थीं और सिरोही देवड़ा चौहानों की रियासत थी।
यदुवंशी जादोन राजपूतों की रियासत करौली व यदुवंशी भाटी राजपूतों की रियासत जैसलमेर थी।
कछवाहा राजपूतों की रियासत जयपुर व अलवर थी। झाला राजपूतों की रियासत झालावाड़ थी।
जाटों की 2 रियासत भरतपुर व धौलपुर थी और एकमात्र मुस्लिम रियासत टोंक थी। हालांकि टोंक पर लंबे समय तक राजपूतों का राज रहा, लेकिन फिर पिंडारियों की लूटमार को देखते हुए अंग्रेजों ने अमीर खां पिंडारी को टोंक रियासत का मालिक बना दिया।
19 रियासतों के अलावा राजपूतों के 3 ठिकाने लावा, कुशलगढ़ और नीमराना भी एकीकरण में शामिल हुए।