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जॉर्ज वी. नेरेमपरम्बिल बचपन में अपने पिता के साथ खेतों में काम करने और फिर मैकेनिक के रूप में संघर्ष करने वाले जॉर्ज ने कभी हार नहीं मानी। 1976 में जब वे शारजाह पहुंचे, तो उन्होंने वहां की तपती गर्मी में एक बड़ा अवसर देखा। उन्होंने महसूस किया कि खाड़ी देशों में एयर कंडीशनिंग (AC) कोई विलासिता नहीं बल्कि एक अनिवार्य जरूरत है।

इसी सोच के साथ उन्होंने GEO इलेक्ट्रिकल कॉन्ट्रैक्टिंग ट्रेडिंग कंपनी की शुरुआत की, जो आज खाड़ी देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र का एक दिग्गज नाम है। उनकी सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज उनकी कुल संपत्ति लगभग 4,800 करोड़ रुपये है।

जॉर्ज के बुर्ज खलीफा में घर खरीदने के पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है। साल 2010 में एक रिश्तेदार ने उन्हें चुनौती दी थी कि वे इस इमारत में घर नहीं खरीद सकते। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए जॉर्ज ने न केवल वहां घर खरीदा, बल्कि आज उनके पास दुनिया की इस सबसे ऊंची इमारत में 22 शानदार अपार्टमेंट्स हैं, जिनमें से कई का इंटीरियर सोने (Gold) की थीम पर बना है।

उनका यह सफर सिखाता है कि अगर आपके पास सही विजन और मेहनत करने का जज्बा हो, तो आप दुनिया की किसी भी ऊंचाई को छू सकते हैं।

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गोमाता अब सिर्फ श्रद्धा ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक आजीविका का आधार भी हैं। संभल की अनुपमा सिंह ने 'जानकी महिला स्वयं सहायता समूह' के जरिए गोबर और गौमूत्र से दीवार घड़ी और हर्बल गुलाल जैसे उत्पाद बनाकर सालाना ₹2.5 लाख की कमाई का सफल मॉडल खड़ा किया है।

मास्टर ऑफ सोशल वर्क (MSW) की डिग्री रखने वाली अनुपमा ने अपनी सोच को एक उद्यमी (Entrepreneur) के रूप में बदला और ग्रामीण महिलाओं को साथ जोड़ा।

अनुपमा का समूह गोबर से सिर्फ मूर्तियाँ ही नहीं, बल्कि दीवार घड़ी, मोबाइल स्टैंड और पूजा की चौकियाँ भी तैयार कर रहा है। केमिकल मुक्त रंगों की बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने शुद्ध हर्बल गुलाल तैयार किया है, जो बाजार में ब्रांडेड वस्तुओं को टक्कर दे रहा है।

NRLM के सहयोग से आज अनुपमा हर महीने लगभग ₹20,000 की स्थिर आय प्राप्त कर रही हैं और दर्जनों महिलाओं को रोजगार दे रही हैं।

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सपनों की कोई सीमा नहीं होती, और इसे सच कर दिखाया है लेफ्टिनेंट कमांडर यशस्वी सोलंकी ने। हरियाणा के चरखी दादरी के एक छोटे से गांव से निकलकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने का उनका सफर हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।

7वीं क्लास में एक एयरफोर्स पायलट की वर्दी देखकर सेना में जाने की ठान ली थी। जिला स्तर की बैडमिंटन और वॉलीबॉल खिलाड़ी रहीं यशस्वी ने शारीरिक और मानसिक फिटनेस के हर पैमाने को पार किया। 15 दिनों के टफ ओरिएंटेशन और खुद राष्ट्रपति द्वारा इंटरव्यू के बाद उनका चयन हुआ।

राष्ट्रपति की पहली महिला एड-डी-कैंप (ADC) बनकर उन्होंने सदियों पुरानी परंपरा को बदल दिया। यशस्वी के पिता एक सरकारी स्कूल टीचर हैं और उनकी यह सफलता देश की उन करोड़ों बेटियों के लिए मिसाल है जो बाधाओं को तोड़कर आगे बढ़ना चाहती हैं।

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जो उचित समझें वो कहो..!

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