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अपने को ( हिन्दू ) और उनको ( मुसलमानों ) समझने के लिए इससे सरल शब्दों में नहीं समझा जा सकता.
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आज मैंने the karela story देखी।
इस विषय पर परिचर्चा कि बाढ़ सी आ गई है। होनी भी चाहिये।
यूटयूब पर व्याख्या दी जा रही है।
जो कि स्वस्थ है।
लेकिन मेरा मानना है कि सेमेटिक रीलजन इस्लाम, ईसाइयत और हिंदू धर्म मे मतभेद धर्म से अधिक मौलिक सिद्धांत का है।
हिंदू धर्म व्यक्ति को एक individual unit के रूप में देखता है। सेमेटिक मजहब व्यक्ति के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता, उसे community यानी कौम के रूप में देखता है।
Community कभी भी जीवन मूल्यों की बात नहीं करती है। वह किसी व्यक्ति के गुण दोष को नहीं देखती है।
कोई उस समुदाय में है तो सभी दोषों के बाद भी श्रेष्ठ है। क्योंकि यह आदेश खुदा का है।
जो उस समुदाय से बाहर है। उसके पास कितने भी महान गुण क्यों न हो लेकिन वह निम्नतर है। उसे काफ़िर करार दे दिया जाता है।
हिंदू धर्म इसके विरुद्घ बात करता है। वह व्यक्ति पर जोर दे रहा है।
यदि कोई व्यक्ति हिंदू है। लेकिन उसके आचरण बुरे है तो उसे श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता है।
यदि कोई व्यक्ति हिंदू नहीं भी है। तो भी उसके आचरण अच्छे है तो श्रेष्ठ है।
हिंदू धर्म इससे भी सूक्ष्म धरातल पर जाता है। वह व्यक्ति को भी खंडित करता है।
यदि किसी व्यक्ति के पाँच गुण अच्छे है और तीन गुण बुरे है। तो आप उन पाँच गुणों का

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नागा चैतन्य (Naga Chaitanya) की फिल्म 'कस्टडी' (Custody) इस शुक्रवार रिलीज हुई. ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर रही है. फिल्म ने ओपनिंग डे पर अच्छा कलेक्शन किया, वहीं उम्मीद है कि इसका वीकेंड कलेक्शन भी उम्मीद के मुताबिक ही होगा. फिल्म का निर्देशन वेंकट प्रभु ने किया है. तमिल फिल्म को क्रिटिक्स की तरफ से मिली जुली प्रतिक्रिया मिली थी. नागा चैतन्य की इस फिल्म ने सामंथा रुथ प्रभु की 'यशोदा' और 'शाकुंतलम' के पहले दिन की कमाई को पीछे छोड़ बाजी मार ली है.

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यह दुनिया भी ऐसी ही है, दिखते सब अपने हैं लेकिन अपना कौन है उसे खोजना बहुत मुश्किल काम है 🤔😂🤣

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जय श्री कृष्ण राधे राधे

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कुछ पढ़ी लिखी लडकियां ही ज्यादातर कोर्ट का चक्कर इसलिए लगा रहीं हैं...क्योंकि, उनसे घर का काम नहीं होता है ? पढ़ी लिखी लडकियां इसलिए भी एकाकी जीवन में रह रहीं हैं, क्योंकि, उनकी उसी व्यक्ति से पटरी नहीं खा रही है जिनके साथ अग्नि के सात फेरे लिए हुए हैं ?
क्योंकि उनकी शिक्षा उनको सामंजस्य बैठाना नहीं सिखाती, सास ससुर की सेवा का भाव नहीं सिखाती ?
ससुराल में एक मर्यादित जीवन में रहना नहीं सिखाती,
और सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात... अधिकतर पढ़ी लिखी लड़कियां... शायद अब लडकियां रही ही नहीं ? वे हर मामले में सबको सबक सिखाने की होड़ में लगी हुई हैं...शायद उनके अंदर की लड़की समाप्त हो चुकी है ?
पत्नी अब पति के लिए पत्नी नहीं अपितु एक जेलर, उसका मालिक बनने की होड़ में रहती है ? वह स्वयं के दोषों को अपनी ही गलतियों के कारण बढ़ा रही है ? ईर्ष्या, द्वेष, शक, कर्कश बोलना, चिंतन न करना, सामाजिकता से न रहना आदि बहुत से दोषों के कारण वह अपने ही परिवार को नष्ट कर रही हैं, जाने अनजाने अपने ही पति, बच्चों, परिवार, संबंधियों के हृदय में अपने लिए नफरत बो रही हैं ?
कानून के ढुलमुल रवैये , नए नए असामजिक नियमों के कारण, लिव इन में रहना, अवैध संबंध, समलैंगिता आदि ने और भी ज्यादा बेड़ा गर्क किया हुआ है....✍️

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