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भगवान जगन्नाथ के याद में निकाली जाने वाली 'जगन्नाथ रथ यात्रा' का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं। आपको बता दें कि जगन्नाथ मंदिर हिन्दुओं के चार धाम में से एक है।
यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है। यह भारत के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ 'जगत के स्वामी' होता है। इसलिए पुरी नगरी 'जगन्नाथपुरी' कहलाती है। इस रथ यात्रा को देखने के लिए हर साल दस लाख से अधिक तीर्थयात्री आते हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस रथ यात्रा में भाग लेता है वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। उनके रथ पर भगवान जगन्नाथ की एक झलक बहुत ही शुभ मानी जाती है। इस त्योहार को ‘घोसा यात्रा’, ‘दशवतार यात्रा’, ‘नवादिना यात्रा’ या ‘गुंडिचा यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है।
जगन्नाथ रथ यात्रा के दस दिन तक के इस महोत्सव में शामिल होने से व्यक्ति की सभी परेशानियां समाप्त हो जाती हैं। इस रथयात्रा का पुण्य 100 यज्ञों के बराबर होता है। इस समय उपासना के दौरान अगर कुछ उपाय किये जाएं तो श्री जगन्नाथ अपने भक्तों की समस्या को जड़ से खत्म कर देते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर से निकालकर प्रसिद्ध गुंडिचा माता के मन्दिर तक पहुंचाया जाता है। जहां पर भगवान जगन्नाथ जी सात दिनों तक विश्राम करते हैं। सात दिनों तक विश्राम करके के बाद में मंदिर में वापिस आ जाते हैं। इस रथ यात्रा में शामिल होने से व्यक्ति के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं।
रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ होता है।
गौरतलब है कि रथयात्रा में सबसे आगे बलरामजी का रथ, उसके बाद बीच में देवी सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है। तीनों के रथ को खींचकर मौसी के घर यानी कि गुंडीचा मंदिर लाया जाता है जो कि जगन्नाथ मंदिर से करीब तीन किलोमीटर दूर है।
भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष' कहते हैं।
बलरामजी के रथ को 'तालध्वज' कहते हैं, जिसका रंग लाल और हरा होता है। देवी सुभद्रा के रथ को 'दर्पदलन' या 'पद्म रथ' कहा जाता है, जो काले या नीले और लाल रंग का होता है, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को 'नंदीघोष' या 'गरुड़ध्वज' कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।
राधे राधे गोविंदा 🙏🚩