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1990 के अंत में एक विकेटकीपर के लिए भारतीय टीम तरसती थी। तीन चार साल तो द्रविड़ से ही कीपिंग करा दी। आज ईशांत किशन जैसे खिलाड़ी तो बाहर बैठे हैं। एक ऑलराउंडर नहीं होता था। बचे हुए 10 ओवर बल्लेबाज फेंकते थे। आज तीन ऑलराउंडर टीम में है।
खेल में हार-जीत होती है 10 साल से हमने भी कोई आईसीसी टूर्नामेंट नहीं जीते। लेकिन भारतीयों का एटीट्यूड बदला है। तीन महीने पहले हम चांद पर जा रहे थे, पिछले महीने हम जी 20 की मेजबानी कर रहे थे, इस महीने पहली बार एशियन गेम्स में 100 से ज्यादा पदक जीते हैं।
यह जावेद मियादांद, आमिर सौहेल या शोएब अख्तर का टाइम नहीं है। पाकिस्तान तब भी हारी थी लेकिन आज मैच हारने के बाद बाबर आजम कोहली की ऑटेग्रॉफ वाली टी शर्ट ले रहा होता है।
भारतीयों को पूरा एटीट्यूड बदल रहा है
वो झुके हुए कंधे वाला, रक्षात्मक रवैये से निकलकर भारतीय हर दिन, हर महीने, हर साल अपनी ताकत पहचान रहे हैं।
100 साल पहले हम इतने आत्महीन थे कि तुर्की के खलीफा के लिए खिलाफत आंदोलन चला रहे थे। मेज पर बैठकर 20-25 नेता हमारी मातृभूमि का बंटवारा कर दे रहे थे और जनता को पता तक नहीं था।
आज फिलस्तीन-इजरायल में जो हो रहा है
उसमें भी भारत से लेकर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तक बसे भारतीयों को पता है अपना पक्ष कौन सा है।
अगले 25 साल में भारत अलग ही ताकत होगा
बस हम छोटे व्यक्तिगत लालच में बड़े नुकसान न कर बैठे।…🙏☺️ जागते रहो बस …