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तुर्की में आए ज़लज़ले के बाद की तस्वीर.... 💔

#prayforturkey

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तस्वीर में दिख रहे शख़्स का नाम "आस मुहम्मद" है। ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले आस मुहम्मद ई-रिक्शा चलाते हैं। आस मुहम्मद को मोदी नगर में एक बैग दिखा जब इन्होंने बैग खोला तो वो बैग पैसों से भरा था। आस मुहम्मद वो बैग लेकर पुलिस के पहुंचे और बैग जमा करवा दिया। उस बैग में तक़रीबन 25 लाख रुपए थे। इस दौर में ऐसे लोग भी हैं। आस मुहम्मद साहब की ईमानदारी की जितनी तअरीफ़ की जाए कम है।

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मदरसा आलिया से आलिया युनिवर्सिटी तक।
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कोलकाता की आलिया युनिवर्सिटी जो कभी मदरसा आलिया व मोहम्मडन कॉलेज के नाम से जानी जाती थी अपने आप में एक इतिहासिक धरोहर है यह भारतीय उपमहाद्वीप का पहला शिक्षण संस्थान है जहां मॉर्डन अंदाज की पढ़ाई शुरू की गई आएं संक्षेप में इस का इतिहास जानते हैं।
सन् 1765 में कोलकाता पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया इस क़ब्जे से कोलकाता के मुसलमान काफी परेशान हुए उन्हें लगा कि हमें अपनी तरक्की के लिए तालीम की बहुत ज़रूरत है वह इस के लिए एक शिक्षण संस्थान खोलना चाहते थे लेकिन पैसे की कमी थी कोलकाता के मुसलमान ग़रीब थे वह अपने बल पर कोई शिक्षण संस्थान नहीं खोल सकते थे।
उन्होंने ने इस बारे में उस समय के आलिम मुल्ला मोजुद्दीन जिन्हें आम लोग मौलवी मदन कहते थे उन से की और फिर मौलवी मदन के साथ एक प्रतिनिधिमंडल गवर्नर जनरल warren Hastings से मिला।
ईस्ट इंडिया कंपनी को पहले से ही इस मौके की तलाश थी वह एक ऐसा शिक्षण संस्थान खोलना चाहते थे जहां उनके लिए काम करने लायक़ लोग तैयार हों उन्होंने प्रतिनिधि मंडल की दरख्वास्त तुरंत मंज़ूर कर ली।
इस तरह 1780 में अंग्रेजों की सहायता से मदरसा आलिया की शुरुआत हुई शुरू में किराए के मकान में पढ़ाई शुरू हुई फिर गवर्नर जनरल ने एक बड़ी जमीन मदरसा के लिए खरीदी और एक शानदार बिल्डिंग बनाई गई शुरू में मदरसा का मासिक खर्च 650 रुपए थी।
अंग्रेजों ने मदरसा बना दिया लेकिन उन का उद्देश्य पूरा न हुआ मुस्लिम स्टूडेंट्स अंग्रेजों से नफ़रत करते थे और अंग्रेजी पढ़ना ही नहीं चाहते थे इसे देखते हुए अंग्रेजों ने 1819 में मदरसा को अपने हाथ में ले लिया और एक अंग्रेज को मदरसा का सेक्रेटरी बना दिया।
इस तरह मदरसा चलता रहा इंग्लिश की तालीम होती रही मदरसा से पढ़ने वालों को अच्छी नौकरियां भी मिलीं लेकिन छात्रों में अंग्रेजों से नफ़रत बाकी रही‌‌।
1837 में लार्ड मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति को लागू किया सरकारी जुबान फारसी से बदल कर अंग्रजी हो गई इस के बाद मदरसा में अंग्रेजों की दिलचस्पी खत्म हो गई उन्हें मदरसा की जरूरत बाकी न रही।
लेकिन मदरसा चलता रहा ईसाई मिशनरियों से इस मदरसा के लोगों ने जम कर मुकाबला किया मदरसा की अहमियत कम न हुई।
देश बंटवारे के साथ मदरसा आलिया भी बंट गया इस का एक हिस्सा ढाका हस्तांतरित हो गया कोलकाता वाले हिस्से पर वित्तीय संकट की स्थिति पैदा हो गई।
आखिर 1949 में केंद्रीय शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने मदरसा की तरफ़ तवज्जो दी मदरसा को वित्तीय सहायता दिलाई साथ ही उस समय की बहुत ही काबिल शख्सियत मौलाना सईद अहमद अकबराबादी को मदरसा का प्रिंसिपल बना कर भेजा।
सन 2006 में सच्चर कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया कि पूरे देश में बंगाल के मुसलमान शिक्षा में सबसे पीछे हैं इस पर बंगाल के वामपंथी सरकार की बड़ी आलोच

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मदरसा आलिया से आलिया युनिवर्सिटी तक।
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कोलकाता की आलिया युनिवर्सिटी जो कभी मदरसा आलिया व मोहम्मडन कॉलेज के नाम से जानी जाती थी अपने आप में एक इतिहासिक धरोहर है यह भारतीय उपमहाद्वीप का पहला शिक्षण संस्थान है जहां मॉर्डन अंदाज की पढ़ाई शुरू की गई आएं संक्षेप में इस का इतिहास जानते हैं।
सन् 1765 में कोलकाता पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया इस क़ब्जे से कोलकाता के मुसलमान काफी परेशान हुए उन्हें लगा कि हमें अपनी तरक्की के लिए तालीम की बहुत ज़रूरत है वह इस के लिए एक शिक्षण संस्थान खोलना चाहते थे लेकिन पैसे की कमी थी कोलकाता के मुसलमान ग़रीब थे वह अपने बल पर कोई शिक्षण संस्थान नहीं खोल सकते थे।
उन्होंने ने इस बारे में उस समय के आलिम मुल्ला मोजुद्दीन जिन्हें आम लोग मौलवी मदन कहते थे उन से की और फिर मौलवी मदन के साथ एक प्रतिनिधिमंडल गवर्नर जनरल warren Hastings से मिला।
ईस्ट इंडिया कंपनी को पहले से ही इस मौके की तलाश थी वह एक ऐसा शिक्षण संस्थान खोलना चाहते थे जहां उनके लिए काम करने लायक़ लोग तैयार हों उन्होंने प्रतिनिधि मंडल की दरख्वास्त तुरंत मंज़ूर कर ली।
इस तरह 1780 में अंग्रेजों की सहायता से मदरसा आलिया की शुरुआत हुई शुरू में किराए के मकान में पढ़ाई शुरू हुई फिर गवर्नर जनरल ने एक बड़ी जमीन मदरसा के लिए खरीदी और एक शानदार बिल्डिंग बनाई गई शुरू में मदरसा का मासिक खर्च 650 रुपए थी।
अंग्रेजों ने मदरसा बना दिया लेकिन उन का उद्देश्य पूरा न हुआ मुस्लिम स्टूडेंट्स अंग्रेजों से नफ़रत करते थे और अंग्रेजी पढ़ना ही नहीं चाहते थे इसे देखते हुए अंग्रेजों ने 1819 में मदरसा को अपने हाथ में ले लिया और एक अंग्रेज को मदरसा का सेक्रेटरी बना दिया।
इस तरह मदरसा चलता रहा इंग्लिश की तालीम होती रही मदरसा से पढ़ने वालों को अच्छी नौकरियां भी मिलीं लेकिन छात्रों में अंग्रेजों से नफ़रत बाकी रही‌‌।
1837 में लार्ड मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति को लागू किया सरकारी जुबान फारसी से बदल कर अंग्रजी हो गई इस के बाद मदरसा में अंग्रेजों की दिलचस्पी खत्म हो गई उन्हें मदरसा की जरूरत बाकी न रही।
लेकिन मदरसा चलता रहा ईसाई मिशनरियों से इस मदरसा के लोगों ने जम कर मुकाबला किया मदरसा की अहमियत कम न हुई।
देश बंटवारे के साथ मदरसा आलिया भी बंट गया इस का एक हिस्सा ढाका हस्तांतरित हो गया कोलकाता वाले हिस्से पर वित्तीय संकट की स्थिति पैदा हो गई।
आखिर 1949 में केंद्रीय शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने मदरसा की तरफ़ तवज्जो दी मदरसा को वित्तीय सहायता दिलाई साथ ही उस समय की बहुत ही काबिल शख्सियत मौलाना सईद अहमद अकबराबादी को मदरसा का प्रिंसिपल बना कर भेजा।
सन 2006 में सच्चर कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया कि पूरे देश में बंगाल के मुसलमान शिक्षा में सबसे पीछे हैं इस पर बंगाल के वामपंथी सरकार की बड़ी आलोच

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मदरसा आलिया से आलिया युनिवर्सिटी तक।
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कोलकाता की आलिया युनिवर्सिटी जो कभी मदरसा आलिया व मोहम्मडन कॉलेज के नाम से जानी जाती थी अपने आप में एक इतिहासिक धरोहर है यह भारतीय उपमहाद्वीप का पहला शिक्षण संस्थान है जहां मॉर्डन अंदाज की पढ़ाई शुरू की गई आएं संक्षेप में इस का इतिहास जानते हैं।
सन् 1765 में कोलकाता पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा हो गया इस क़ब्जे से कोलकाता के मुसलमान काफी परेशान हुए उन्हें लगा कि हमें अपनी तरक्की के लिए तालीम की बहुत ज़रूरत है वह इस के लिए एक शिक्षण संस्थान खोलना चाहते थे लेकिन पैसे की कमी थी कोलकाता के मुसलमान ग़रीब थे वह अपने बल पर कोई शिक्षण संस्थान नहीं खोल सकते थे।
उन्होंने ने इस बारे में उस समय के आलिम मुल्ला मोजुद्दीन जिन्हें आम लोग मौलवी मदन कहते थे उन से की और फिर मौलवी मदन के साथ एक प्रतिनिधिमंडल गवर्नर जनरल warren Hastings से मिला।
ईस्ट इंडिया कंपनी को पहले से ही इस मौके की तलाश थी वह एक ऐसा शिक्षण संस्थान खोलना चाहते थे जहां उनके लिए काम करने लायक़ लोग तैयार हों उन्होंने प्रतिनिधि मंडल की दरख्वास्त तुरंत मंज़ूर कर ली।
इस तरह 1780 में अंग्रेजों की सहायता से मदरसा आलिया की शुरुआत हुई शुरू में किराए के मकान में पढ़ाई शुरू हुई फिर गवर्नर जनरल ने एक बड़ी जमीन मदरसा के लिए खरीदी और एक शानदार बिल्डिंग बनाई गई शुरू में मदरसा का मासिक खर्च 650 रुपए थी।
अंग्रेजों ने मदरसा बना दिया लेकिन उन का उद्देश्य पूरा न हुआ मुस्लिम स्टूडेंट्स अंग्रेजों से नफ़रत करते थे और अंग्रेजी पढ़ना ही नहीं चाहते थे इसे देखते हुए अंग्रेजों ने 1819 में मदरसा को अपने हाथ में ले लिया और एक अंग्रेज को मदरसा का सेक्रेटरी बना दिया।
इस तरह मदरसा चलता रहा इंग्लिश की तालीम होती रही मदरसा से पढ़ने वालों को अच्छी नौकरियां भी मिलीं लेकिन छात्रों में अंग्रेजों से नफ़रत बाकी रही‌‌।
1837 में लार्ड मैकाले ने अपनी शिक्षा नीति को लागू किया सरकारी जुबान फारसी से बदल कर अंग्रजी हो गई इस के बाद मदरसा में अंग्रेजों की दिलचस्पी खत्म हो गई उन्हें मदरसा की जरूरत बाकी न रही।
लेकिन मदरसा चलता रहा ईसाई मिशनरियों से इस मदरसा के लोगों ने जम कर मुकाबला किया मदरसा की अहमियत कम न हुई।
देश बंटवारे के साथ मदरसा आलिया भी बंट गया इस का एक हिस्सा ढाका हस्तांतरित हो गया कोलकाता वाले हिस्से पर वित्तीय संकट की स्थिति पैदा हो गई।
आखिर 1949 में केंद्रीय शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने मदरसा की तरफ़ तवज्जो दी मदरसा को वित्तीय सहायता दिलाई साथ ही उस समय की बहुत ही काबिल शख्सियत मौलाना सईद अहमद अकबराबादी को मदरसा का प्रिंसिपल बना कर भेजा।
सन 2006 में सच्चर कमेटी रिपोर्ट आई जिसमें बताया गया कि पूरे देश में बंगाल के मुसलमान शिक्षा में सबसे पीछे हैं इस पर बंगाल के वामपंथी सरकार की बड़ी आलोच

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