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घराला घरपण , नात्यांना वळण , कायम साथ आणि कठीण प्रसंगात हात देणाऱ्या जीवनाचा सहप्रवासी होऊन कुटुंब सांभाळणाऱ्या जीवनसाथी सौ. तृप्तीचा आज वाढदिवस यानिमित्त तिला हार्दिक शुभेच्छा ! तृप्ती तुला देण्यासाठी माझी ओंजळ सतत आनंदाने भरलेली राहो आणि तुला दीर्घायुष्य लाभो , ही प्रार्थना !
एक नजर डूंगरपुर वागड़ क्षेत्र के इतिहास पर
डूंगरपुर राजे - रजवाड़ों के समय से यह नगर अपनी एतिहासिक घटनाओं की वजह से प्रदेश एवं देश में अपनी अलग ही| ख्याति लिए हुए हैं । शिक्षा , वीरता , स्वच्छता और सामाजिक सौहार्द के साथ ही विभिन्न जनजागृतियों में डूंगरपुर प्रदेश ने हमेशा अपनी अग्रणी ही भूमिका अदा की है 17 वें स्थापना दिवस पर इतिहास की प्रमुख घटनाएं ....
इतिहासकार के अनुसार सन् 1282 ई से 1850 ई . के | मध्य कम से कम 40 बाहरी | आक्रमण हुए थे । मेवाड़ के आठ महाराणा , मालवा के तीन सुल्तान , | गुजरात के दो सुल्तान , मुगल | बादशाह अकबर , बाजीराव पेशवा , | मल्हारराव होलकर , ग्वालियर के | सिंधिया और खुदादा खां सिंधी आक्रमण करने वालों में प्रमुख थे । डूंगरपुर में थे दो युद्ध के मैदान
एक मैदान बिछीवाड़ा के पास ' बिलपण का वीड़ा ' और दूसरा देवला गांव में पूर्व दिशा में मैदान था । बिलपण का वीड़ा में मुगल बादशाह अकबर के नेतृत्व में आई सेना और डूंगरपुर के महारावल आसकरण की सेना के मध्य विक्रम संवत 1629 | वैशाख कृष्ण दूज शनिवार के दिन | युद्ध हुआ था ।
इस भयावह युद्ध में डूंगरपुर महारावल आसकरण के भाई अखेराज के पुत्र दुर्गा और वाघा सोलंकी (वेड) , जयमल वाघेला आदि काम आए थे मेवाड़ और डूंगरपुर में भी युद्ध देवला के पूर्व दिशा के मैदान में भी दो बार रणसंग्राम हुआ । दोनोंबार मेवाड़ एवं डूंगरपुर की सेना आमने - सामने थी
पहला युद्ध मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह और डूंगरपुर के महारावल पूंजराज के बीच विक्रम संवत 1684 वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन हुआ था । एक अन्य युद्ध महाराणा अमरसिंह द्वितीय एवं महारावल खुमाणसिंह
के मध्य विक्रम संवत 1755 वैशाख शुक्ल नवमी शुक्रवार के दिन हुआ ।
इसी तरह शहर के घांटी के दरवाजे के बाहर , रामपोल के बाहर , देवसोमनाथ मंदिर के पास भी कई युद्ध इतिहास के गर्भ में छुपे हुए हैं रक्षा के लिए बनी फतहगढ़ी श्रीनाथजी मंदिर के पीछे फतेहगढ़ी पहाड़ी है महारावल फतहसिंह ने अपने शासनकाल में उत्तर दिशा की ओर से होने वाले आक्रमणों से राजधानी डूंगरपुर की रक्षा के लिए ' हरिया - डूंगरा ' पर एक गढ़ी बनवाई
और इसका नाम फतहगढ़ी रखा इसकी तलहटी में गेपसागर की पाल पर एक दुमंजिला नगरद्वार बनवाया था इसका नाम कुरियाला दरवाजा प्रचलित हुआ । यह करीब सवा दो सौ वर्ष प्राचीन धरोहर है । रियासतकाल के अंतिम वर्षों में इस दरवाजे की ऊपरी मंजिल पर अदालते लगती थी । अदालतों के लिए अलग भवन बनाए जाने पर इसे जज साहब का क्वार्टर बनाया ।
पांच दरवाजे करते थे रक्षा रियासतकाल के दौरान नगरवासियों की आंतरिक एवं बाहरी सुरक्षा के लिहाज से डूंगरपुर के चारों और नगरकोट बनाया था । इसमें बीच - बीच में तोपे , हथियार रखने और सिहापियों के लिए बुर्ज और बंदूक व तीरों की मीनारें बनी हुई थी ।नगर में प्रवेश करने के लिए इसी नगरकोट के साथ पांच बड़े दरवाजे थे
राणा कुम्भा ने भी किया था आक्रमण इतिहासकार पुरोहित के अनुसार रामपोल के बाहर चार शिलालेख लगे हुए हैं इनके अनुसार विक्रम संवत 1498 चेत्र शुक्ला 10 गुरुवार के दिन डूंगरपुर पर महराणा कुम्भा ने आक्रमण किया था । विक्रम संवत 1577 फाल्गुन शुक्ला तीन रविवार के दिन गुजरात के सुल्तान ने डूंगरपुर पर आक्रमण किया था ।
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