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चौमुखनाथ_शिव_मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश, भारत
भारत के राज्य मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के सलेहा में स्थित है 5 वीं सदी का अति प्राचीन भगवान भोलेनाथ का चौमुख नाथ शिव मंदिर
अति प्राचीन इस मंदिर में भगवान शिव के चार मुख वाली प्रतिमा स्थापित है।
प्रतिमा का हर मुख अलग-अलग रूप वाला है।
चतुर्मुखी प्रतिमा में एक मुख भगवान के दूल्हे के वेष का है। इसको गौर से देखने पर भगवान के दूल्हे के रूप के दर्शन होते हैं। दूसरे मुख में भगवान अर्धनारीश्वर रूप में हैं। तीसरा मुख भगवान का समाधि में लीन स्थिति का है और चौथा उनके विषपान करने का है। प्रतिमा का सूक्ष्मता के साथ दर्शन करने पर सभी रूप उभरकर आते हैं। यह प्रतिमा अपने आप में अद्भुद है और दुर्लभ है।
🌷 ॐ नमः शिवाय 🌷
श्री सांब सदाशिव हर हर शंभू
शिवाय नमः शिव लिंगाय नमः।।

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वर्ष में 364 दिन आम दर्शनार्थियों के लिए बंद रहने वाले काले हनुमान जी का दर्शन मात्र 1 दिन सभी के लिए खुला रहता हैं यह वह दिन हैं जो विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के राजगद्दी के दूसरे दिन भोर की आरती के पश्चात होता हैं।आप सभी भी दर्शन करें... जय हनुमान...जय श्री राम 🙏😊
प्रभु श्रीराम के तीर से धरती को बचाने के लिए हनुमान जी को घुटने पर बैठना पड़ा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार किले की खुदाई में ही दक्षिणमुखी हनुमान की भव्य प्रतिमा मिली थी जिसे काशीराज परिवार ने दक्षिणी छोर में मंदिर बना कर प्रतिमा को स्थापित किया था। बताया जाता है कि यह प्रतिमा त्रेता युग की है। धार्मिक मान्यता है कि प्रभु श्रीराम लंका पर विजय पाने के लिए निकले थे और रामेश्वरम में समुद्र के किनारे पहुंचे थे। प्रभु ने समुद्र से रास्ता मांगा था लेकिन समुद्र ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था इससे कुपित होकर प्रभु श्रीराम ने अपना धनुष निकाल कर उस पर बाण चढ़ा ली थी और समुद्र को सुखा देने के लिए बाण छोडऩा चाहते थे। इससे डर कर समुद्र खुद प्रकट हुआ और प्रभु से माफी मांगी। प्रभु श्रीराम ने समुद्र को माफ तो कर दिया था लेकिन धनुष पर चढ़ाये गये बाण का वापस नहीं ले सकते थे इसलिए उन्होंने बाण को पश्चिम दिशा में छोड़ दिया था। प्रभु श्रीराम का बाण इतना शक्तिशाली था कि उसके टकराने से धरती हिल सकती थी इसलिए जहां पर धरती को बचाने के लिए हनुमानजी घुटने के बल बैठ गये थे और बाण जब धरती से टकराया तो उसके तेज से प्रभु का रंग काला पड़ गया था। धार्मिक मान्यता है कि दुनिया में प्रभु हनुमान की ऐसी अलौकिक मूर्ति और कही नहीं है। धार्मिक मान्यता है कि रामनगर में राज्याभिषेक के समय खुद प्रभु श्रीराम आते हैं इसलिए मंदिर का पट भी इसी दिन खुलता है और साल भर बंद रहता है।

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श्री विष्णु||
ॐ विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् |
अनेकरूपं दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमम् ||
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं
सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम् |
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रयं
नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम् ||
श्री विष्णु, श्री विष्णु, श्री विष्णु....
ॐ नमो नारायणाय ! ॐ नमो नारायणाय ! ॐ नमो नारायणाय ! ॐ नमो नारायणाय ! ॐ नमो नारायणाय !

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निःसंदेह इस मंदिर को कोई अनपढ़ कारीगर नहीं बना सकता
!
इसका अर्थ है 1000 वर्ष पूर्व कोई भी वर्ण शिक्षा से वंचित नहीं था...... और यही सत्य है
1196 में निर्मित कर्नाटक का शिव को समर्पित अमृतेश्वर मन्दिर.....
हर हर महादेव 🙏
जय सत्य सनातन

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ॐ शांति 🙏

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1956 ई. में 19 रियासतों का एकीकरण होने के बाद राजस्थान राज्य बना। इन 19 रियासतों में 16 रियासतें राजपूतों की, 2 जाटों की और एक मुस्लिम रियासत थी।
गुहिल वंशी राजपूतों की 5 रियासतें मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ व शाहपुरा थीं। राठौड़ राजपूतों की 3 रियासतें मारवाड़, बीकानेर व किशनगढ़ थीं। चौहान राजपूतों की 3 रियासतों में कोटा और बूंदी हाड़ा चौहानों की रियासतें थीं और सिरोही देवड़ा चौहानों की रियासत थी।
यदुवंशी जादोन राजपूतों की रियासत करौली व यदुवंशी भाटी राजपूतों की रियासत जैसलमेर थी।
कछवाहा राजपूतों की रियासत जयपुर व अलवर थी। झाला राजपूतों की रियासत झालावाड़ थी।
जाटों की 2 रियासत भरतपुर व धौलपुर थी और एकमात्र मुस्लिम रियासत टोंक थी। हालांकि टोंक पर लंबे समय तक राजपूतों का राज रहा, लेकिन फिर पिंडारियों की लूटमार को देखते हुए अंग्रेजों ने अमीर खां पिंडारी को टोंक रियासत का मालिक बना दिया।
19 रियासतों के अलावा राजपूतों के 3 ठिकाने लावा, कुशलगढ़ और नीमराना भी एकीकरण में शामिल हुए।

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कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली
यह कहावत क्यों बनी ?
बचपन से लेकर आज तक हजारों बार इस कहावत को सुना था कि "कहां राजा भोज- कहां गंगू तेली" आमतौर पर यह ही पढ़ाया और बताया जाता था कि इस कहावत का अर्थ अमीर और गरीब के बीच तुलना करने के लिए है,
पर भोपाल जाकर पता चला कि कहावत का दूर-दूर तक अमीरी- गरीबी से कोई संबंध नहीं है। और ना ही कोई गंगू तेली से से संबंध है, आज तक तो सोचते थे कि किसी गंगू नाम के तेली की तुलना राजा भोज से की जा रही है यह तो सिरे ही गलत है, बल्कि गंगू तेली नामक शख्स तो खुद राजा थे।
जब इस बात का पता चला तो आश्चर्य की सीमा न रही साथ ही यह भी समझ आया यदि घुमक्कड़ी ध्यान से करो तो आपके ज्ञान में सिर्फ वृद्धि ही नहीं होती बल्कि आपको ऐसी बातें पता चलती है जिस तरफ किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होता और यह सोचकर हंसी भी आती है यह कहावत हम सब उनके लिए सबक है जो आज तक इसका इस्तेमाल अमीरी गरीबी की तुलना के लिए करते आए हैं
इस कहावत का संबंध मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके जिला धार से है, भोपाल का पुराना नाम भोजपाल हुआ करता था।
भोजपाल
नाम धार के राजा भोजपाल से मिला।
समय के साथ इस नाम में से "ज" शब्द गायब हो गया और नाम भोपाल बन गया।
अब बात करते हैं कहावत की कहते हैं, कलचुरी के राजा गांगेय ( अर्थात गंगू ) और चालूका के राजा तेलंग ( अर्थात तेली) ने एक बार राजा भोज के राज्य पर हमला कर दिया इस लड़ाई में राजा भोज ने इन दोनों राजाओं को हरा दिया
उसी के बाद व्यंग्य के तौर पर यह कहावत प्रसिद्ध हुई "कहां राजा भोज-कहां गंगू तेली" राजा भोज की विशाल प्रतिमा भोपाल के वीआईपी रोड के पास झील में लगी हुई है।
चित्र - झील में लगी राजा भोज की प्रतिमा का है

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