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घर बीत जाते हैं। लोग बीत जाते हैं। समय बीत जाता है।
सवेरे साइकिलिंग करते हुए अचानक इस घर के सामने जा निकला। 19, संवाद नगर, इंदौर। कवि चन्द्रकान्त देवताले का घर।
पता नहीं, शायद बिक गया हो। उजाड़ और भग्नशील। दरवाजे खुले हैं। खिड़कियाँ खुली हैं। सन्नाटा बताता है- भीतर कोई नहीं है।
घण्टी बजाते ही चीनू के भौंकने की आवाज़ सुनाई देती थी। बल्कि गेट पर हाथ रखते ही।
यहॉं हम लोग कितनी बार मिले हैं। मैं, रवीन्द्र व्यास, उत्पल बैनर्जी, अरुण आदित्य, विनीत तिवारी, विवेक गुप्ता, प्रदीप मिश्र, जितेंद्र चौहान.... कितनी बातें, कविताएँ, बहसें।
इस भीतर वाले कमरे से निकल कर अभी विष्णु खरे आएँगे। कभी चन्द्रकान्त पाटिल बैठे हुए मिलेंगे। देवताले जी की पत्नी कमल देवताले मुस्कुराते हुए मिलेंगी।
कभी देवताले जी के बालसखा, उनके सहपाठी विट्ठल त्रिवेदी और सरोज कुमार। इंदुप्रकाश कानूनगो।
संवाद नगर के उनके पड़ोसी प्रभु जोशी, हरेंद्र कोटिया ,अशोक कुमट और आशा कोटिया।
नौलखा चौराहे तक की सड़क पर हम घूमते रहेंगे।
लौट कर देखेंगे : घर सूना पड़ा है। कमल देवताले चली गई हैं। देवताले जी भी। विष्णु खरे भी। प्रभु जोशी और आशा कोटिया भी।
पर दरवाज़ा खुला है।खिड़कियाँ खुली हैं।
घण्टी बजा दूँ।
जाली वाले दरवाज़े को खोलते हुए देवताले जी कहेंगे : आओ, आशुतोष !
चीनू के भौंकने की आवाज़ दूर चली जाएगी।
घर बीत जाएगा। लोग बीत जाएँगे। समय बीत जाएगा।