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डॉ० इसरार अहमद एक ऐसा जवान जो दिन ही माहौल से अक्सर दूर मशाग़ल-ए-ज़िन्दगी में मसरूफ़ किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करता है। लेकिन बक़ौल उनके अल्लामा इक़बाल रहमतुल्लाह अलैह की मिली शायरी और मौलाना मौदूदी की तर्जुमान-उल-क़ुरआन में छपने वाली तफ़सीर ने उनकी ज़िन्दगी की काया पलट के रख दी, नतीजा ये हुआ कि वो एक तरफ़ क़ुरआन ही के होकर रह गए और दूसरी तरफ़ इस्लाम के अहयाई फिक्र के बड़े तर्जुमान बनकर उभरते हैं।
यूं तो डॉक्टर इसरार अहमद के बारे में बहुत सी बातें कही जा सकती हैं, लेकिन फ़िलवक़्त जो मैं कहना चाहता हूं वो यह है कि डॉ इसरार अहमद साहब कहते थे...
"हमारे तालीम याफ़्ता और ज़हीन तबके तक क़ुरआन की इंक़लाबी दावत नहीं पहुंची है हमारे उलेमा और इस मॉडर्न तबके के बीच एक बहुत बड़ी दूरी है एक बहुत बड़ा कम्युनिकेशन गैप है। क्योंकि हमारे उलेमा पुराने लबो लहजे में ही सहीफ़ह इंक़लाब क़ुरआन करीम की दर्स देते हैं जिसमें आज की ज़हनी सतह को मद्देनज़र नहीं रखा जाता था। नतीजतन आज के नौजवान और क़ुरआन में एक बहुत बड़ा पर्दा हायल है इस पर्दे को सिर्फ़ वही शख़्स चाक कर सकता है और उसकी कम्युनिकेशन गैप को सिर्फ वही ख़त्म कर सकता है जो एक तरफ़ क़ुरआन से बहुत अच्छी तरह वाकिफ़ हो और दूसरी जानिब असरि उलूम से भी ताकि वो आज की ज़हनी सतह के मुताबिक लोगों को क़ुरआन समझाए। डॉक्टर इसरार अहमद साहब अपने कई लेक्चर्ज़ में ख़ुद कहते हैं कि- "मैंने मॉडरेट तबके और क़ुरआन पाक में मौजूद इसी फ़ासले को ख़त्म करने के लिए डॉक्टरी को अल्लाह हाफ़िज़ कहकर इस ज़िम्मेदारी का बोझ अपने सर लिया क्योंकि डॉक्टर्स तो बहुत से हैं, लेकिन क़ुरआन की इस बलन्द सतह पर दावत देने वाले बहुत कम लोग हैं"
और फिर दुनिया ने देखा कि मरहूम डॉक्टर इसरार अहमद साहब ने कमोबेश नस्फ़ सदी तक क़ुरआनी फ़िक्र की तरवीज व ईशाअत के लिए वो राग अलापा जो तालीम याफ़्ता और मॉडर्न तबके को क़ुरआन की तरफ़ माएल कर गया।
जिसके नतीजे में मुआशरे का ये ज़हीन तबक़ा क़ुरआन की इंक़लाबी दावत को समझने लगा उनके इज़हान क़ुर्रआन-ए-मुक़द्दस की हिकमत के सामने सर ब सजूद हुए, उनके ज़हनों को तशकीक में डालने वाले तमाम सवालात के आला और इल्मी सतह पर तसल्ली बख़्श जवाब मिले और यूं वो क़ुरआन शरीफ़ को अपनी ज़िन्दगी का मरकज़ व महूर बनाने लगे, हज़ारों नहीं बल्कि लाखों लोगों की जिंदगीयों को आपने अपने क़ुरआन की दर्स से बदल कर रख दिया।
बिला शुब्हा डॉ० इसरार अहमद साहब, कलाम-ए-इक़बाल रहमतुल्लाह की तौज़ीह में भी अपना सानी नहीं रखते थे, बल्कि अपनी एक लेक्चर में इसरार साहब खुद कहते हैं कि..
"मैंने इक़बाल रहमतुल्लाह अलैह की कलाम में जो जिद्दत-ए-फ़िक्र, इंक़लाबी दावत व तहरीक देखी है, बर्र-ए-सग़ीर हिन्दोस्तान व पाकिस्तान में शायरी का सहारा लेकर रमूज़-ए-क़ुरआनी की तशरीह सिर्फ़ अल्लामा इक़बाल रहमतुल्लाह अलैह का ही खासह था और मैं ख़ुद को "यके अज़ रग हाए इक़बाल" फिक्र-ए-इक़बाल रहमतुल्लाह अलैह की एक रग व चिंगारी समझता हूं।
14 अप्रैल 2010 को ये अज़ीम दाई-ए-क़ुरआन इस दुनिया से कूच कर गए, अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त मरहूम के दरजात बुलंद करे, इनके क़ब्र को नूर से भर दे, और जन्नतुल फिरदौस में आला से आला मुक़ाम अता फ़रमाये। आमीन।
दिलों की लाइब्रेरी।
एक जज़माना था जब इस्लामी देशों में बेहतरीन लाइब्रेरियां हुआ करती थीं। बग़दाद, गरनाता, असकंदरीया, रे ( आज का तेहरान ) नीशापुर, समरकंद, दमिश्क, कूफ़ा, बसरा बुखारा, मराकिश, ग़ज़नी, लाहौर और काश्ग़र आदि शहरों में बड़े बड़े कुतुबखाने मौजूद थे रिसर्च सेन्टर्स थे जहां रिसर्च का काम होता था अच्छी किताबों के लिखने पर पुरूस्कार मिलते थे।
उस जमाने में बड़े बड़े आलिम , वैज्ञानिक , फलसफी , इतिहास कार , अदीब व शायर हुए जिन्होंने बहुत कुछ लिखा और दुनिया को दिया , कुछ ने दस बीस किताबें लिखी किसी ने चालीस पचास।
फिर ज़माना पलटा , मंगोल व ततार आधी की तरह आए बादलों की तरह छा गए लाखों लोगों को कत्ल कर दिया शहर के शहर वीरान कर दिए गए लाइब्रेरियों को जला दिया गया मदरसों को बर्बाद कर दिया गया।
बहुत बुरा ज़माना था मुसीबतों के पहाड़ तोड़े गए थे लेकिन मुसलमान एक जिंदा कौम है वह हालात से घबराने वाले नहीं हैं मुसलमानों ने इसे एक चैलेंज के रूप में लिया , और जुट गए इस नुकसान की भरपाई के लिए।
पहले एक लेखक बीस किताबें लिखता था अब के लेखक दो सौ लिखने लगे पहले तीस किताबों का तर्जुमा करता था अब तीन सौ किताबों का तर्जुमा करने लगे इस दौर में ऐसे विद्वान भी हुए जिन्होंने पांच सौ किताबें तक लिखीं , ऐसे लोग भी थे कि जब उनकी उम्र और उनके द्वारा लिखी गई किताबों के पेजों का हिसाब लगाया गया तो एक दिन में दस पेज लिखने का औसत निकला।
अल्लामा इबनुल जोज़ी , इमाम इब्ने तैमिया , इब्ने कय्यिम , इब्ने कसीर , इब्ने असीर , सुयोती , इब्ने खलदून , ज़हबी , सुबकी , इब्ने हज्र असकलानी , अलऐनी , अबुल इज़्ज अब्दुस्सलाम , तकीद्दीन शामी , नसीरुद्दीन तूसी जैसे कितने नाम हैं जो चंगेज खान व हलाकू के जमाने में या उसके तुरंत बाद पैदा हुए और अपने इल्म से हर नुकसान की तलाफी कर दी मकानों से कुतुबखाने मिटा दिए गए तो दिलों में कुतुबखाने बना लिए।
मुसलमान हारने वाली कौम नहीं है इतिहास गवाह है मुसलमान की डिक्शनरी में मायूसी शब्द नहीं है जिन परिस्थितियों में दूसरे लोग टूट कर बिखर जाते हैं उन्हीं परिस्थितियों में मुस्लमान पहले से ज्यादा ताकत से उठ खड़े होते हैं ऐसा एक बार नहीं बार-बार हुआ है हम ने खुद को साबित किया है।