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चिंता मत करो,एक दिन बालाजी महाराज तुम्हारी सारी खोई हुई खुशियां तुम्हें दोगुनी कर वापस लौटा देंगे इसके लिए एक अरदास लगानी
#जय_श्री_राम_होगी
जब रावण ने देखा कि हमारी पराजय निश्चित है तो उसने १००० अमर राक्षसों को बुलाकर रणभूमि में भेजने का आदेश दिया। ये ऐसे थे जिनको काल भी नहीं खा सका था।
विभीषण के गुप्तचरों से समाचार मिलने पर श्री राम को चिंता हुई कि हम लोग इनसे कब तक लड़ेंगे ? सीता का उद्धार और विभीषण का राज तिलक कैसे होगा ? क्योंकि युद्ध की समाप्ति असंभव है।
श्री राम कि इस स्थिति से वानरवाहिनी के साथ कपिराज सुग्रीव भी विचलित हो गए कि अब क्या होगा ? हम अनंत काल तक युद्ध तो कर सकते हैं पर विजयश्री का वरण नहीं ! पूर्वोक्त दोनों कार्य असंभव हैं।
अंजनानंदन हनुमान जी आकर वानर वाहिनी के साथ श्रीराम को चिंतित देखकर बोले - प्रभु ! क्या बात है ?
श्रीराम के संकेत से विभीषण जी ने सारी बात बतलाई। अब विजय असंभव है।
पवन पुत्र ने कहा - असम्भव को संभव और संभव को असम्भव कर देने का नाम ही तो हनुमान है। प्रभु ! आप केवल मुझे आज्ञा दीजिए मैं अकेले ही जाकर रावण की अमर सेना को नष्ट कर दूँगा।
कैसे हनुमान ? वे तो अमर हैं।
प्रभु ! इसकी चिंता आप न करें सेवक पर विश्वास करें।
उधर रावण ने चलते समय राक्षसों से कहा था कि, वहां हनुमान नाम का एक वानर है उससे जरा सावधान रहना।
एकाकी हनुमानजी को रणभूमि में देखकर राक्षसों ने पूछा - तुम कौन हो ? क्या हम लोगों को देखकर भय नहीं लगता जो अकेले रणभूमि में चले आये।
मारुति - क्यों आते समय राक्षस शराज रावण ने तुम लोगों को कुछ संकेत नहीं किया था जो मेरे समक्ष निर्भय खड़े हो।
निशाचरों को समझते देर न लगी कि ये महाबली हनुमान हैं। तो भी क्या ? हम अमर हैं, हमारा ये क्या बिगाड़ लेंगे।
भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ। पवनपुत्र की मार से राक्षस रणभूमि में ढेर होने लगे। चौथाई सेना बची थी कि पीछे से आवाज आई - हनुमान हम लोग अमर हैं हमें जीतना असंभव है। अतः अपने स्वामी के साथ लंका से लौट जाओ, इसी में तुम सबका कल्याण है।
आंजनेय ने कहा - लौटूंगा अवश्य पर तुम्हारे कहने से नहीं, अपितु अपनी इच्छा से। हाँ तुम सब मिलकर आक्रमण करो फिर मेरा बल देखो और रावण को जाकर बताना।
राक्षसों ने जैसे ही एक साथ मिलकर हनुमानजी पर आक्रमण करना चाहा, वैसे ही पवनपुत्र ने उन सबको अपनी पूंछ में लपेटकर ऊपर आकाश में फेंक दिया।
वे सब पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति जहाँ तक है वहां से भी ऊपर चले गए, चले ही जा रहे हैं।
चले मग जात सूखि गए गात
गोस्वामी तुलसीदास।
उनका शरीर सूख गया अमर होने के कारण मर सकते नहीं अतः रावण को गाली देते हुए और कष्ट के कारण अपनी अमरता को कोसते हुए अभी भी जा रहे हैं।
इधर हनुमान जी ने आकर प्रभु के चरणों में शीश झुकाया।
श्रीराम बोले - क्या हुआ हनुमान ?
प्रभु ! उन्हें ऊपर भेजकर आ रहा हूँ।
राघव - पर वे अमर थे हनुमान।
हाँ स्वामी इसलिए उन्हें जीवित ही ऊपर भेज आया हूँ, अब वे कभी भी नीचे नहीं आ सकते ? रावण को अब आप शीघ्रातिशीघ्र ऊपर भेजने की कृपा करें। जिससे माता जानकी का आपसे मिलन और महाराज विभीषण का राजसिंहासन हो सके।
पवनपुत्र को प्रभु ने उठाकर गले लगा लिया। वे धन्य हो गए अविरल भक्ति का वर पाकर। श्रीराम उनके ऋणी बन गए और बोले - हनुमान जी ! आपने जो उपकार किया है, वह मेरे अंग-अंग में ही जीर्ण-शीर्ण हो जाय।
मैं ! उसका बदला न चुका सकूं। क्योंकि उपकार का बदला विपत्तिकाल में ही चुकाया जाता है। पुत्र ! तुम पर कभी कोई विपत्ति न आये।
निहाल हो गए आंजनेय।
हनुमान जी की वीरता के समान साक्षात काल, देवराज इन्द्र, महाराज कुबेर तथा भगवान विष्णु की भी वीरता नहीं सुनी गयी। ऐसा कथन श्रीराम का है :-
न कालस्य न शक्रस्य न विष्णर्वित्तपस्य च।
कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः॥
भारत के प्रसिद्ध मंदिर
शितला सप्तमी की हार्दिक शुभकामनाएं
लेख 1068 ता 6/9/23
शीतला माता मंदिर,
अगम कुआं
पटना सिटी
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कंकड़बाग-कुम्हरार रोड के पूरब में गांधी सेतु के नीचे से होते हुए शीतला माता का मंदिर स्थित है .यह हिन्दू देवी माँ दुर्गा का एक उपासना पीठ के साथ साथ शक्ति पीठ भी माना जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक 2500 वर्ष पूर्व यहां कुआं एवं वर्तमान नवपिंडी थी जो छोटे मंदिर में स्थापित थी। एक समय तुलसी मंडी में कुआं की खुदाई के दौरान वर्तमान शीतला जी की मूर्ति खड़े रूप में प्राप्त हुई। छोटी एवं बड़ी पहाड़ी तथा तुलसी मंडी के लोगों ने विचार विमर्श कर मूर्ति (शीतला) की इसी स्थान पर प्राण प्रतिष्ठा करा दी। इसके पीछे एक कारण यह भी था कि ग्रामवासी पहले से ही वहां पूजा पाठ करते आ रहे थे। कुआं से प्राप्त शीतला माता की मूर्ति एवं नवपिंडी की सुचारू रूप से पूजा के लिए पुजारी को सौंपा गया।
मंदिर के मुख्य द्वार के पूरब में ही शीतला माता का मंदिर है। मंदिर के दरवाजे के पूरब एवं दक्षिण कोने पर शीतला माता की खड़ी मूर्ति है। शीतला माता के मूर्ति के दाहिने त्रिशूल तथा उसके दाहिने पिंडी रूप में योगिनी विराजमान है। शीतला माता की मूर्ति के बांये अंगार माता की छोटी मूर्ति है। दरवाजे के भीतर पिंडी रूप में सात शीतला, एक भैरव एवं एक गौरेया है जो गुम्बज के ठीक नीचे स्थापित है।
इस मंदिर से सटे पूरब में ही ऐतिहासिक अगमकुआं है। अगमकुआं के नाम से प्रसिद्ध इस कुएं की खुदाई सम्राट अशोक के काल 273-232 ईस्वी पूर्व में की गई थी. इस कुएं की खासियत यह है कि इतना पुराना कुआं होने के बाद भी यह कभी नहीं सूखता है. इस कुएं की एक और खासियत है, इसमें पानी का रंग बदलता रहता है. इस कुएं की गहराई के संबंध में पुरातत्व विभाग का कहना है कि ‘कुएं की गहराई लगभग 105 फ़ीट है’. इस कुएं की गहराई को देखते हुए इसका नाम “अगम कुआं” रखा गया है.
कहा जाता है कि इस कुएं के अन्दर 9 और कुएं हैं और सबसे अंत में एक तहखाना है. यहाँ सम्राट अशोक का खजाना था. इसे खजाना गृह भी कहा जाता है. खजाना गृह अशोक के साम्राज्य कुम्हरार से सुरंग के द्वारा जुड़ा हुआ था.