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1956 ई. में 19 रियासतों का एकीकरण होने के बाद राजस्थान राज्य बना। इन 19 रियासतों में 16 रियासतें राजपूतों की, 2 जाटों की और एक मुस्लिम रियासत थी।
गुहिल वंशी राजपूतों की 5 रियासतें मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ व शाहपुरा थीं। राठौड़ राजपूतों की 3 रियासतें मारवाड़, बीकानेर व किशनगढ़ थीं। चौहान राजपूतों की 3 रियासतों में कोटा और बूंदी हाड़ा चौहानों की रियासतें थीं और सिरोही देवड़ा चौहानों की रियासत थी।
यदुवंशी जादोन राजपूतों की रियासत करौली व यदुवंशी भाटी राजपूतों की रियासत जैसलमेर थी।
कछवाहा राजपूतों की रियासत जयपुर व अलवर थी। झाला राजपूतों की रियासत झालावाड़ थी।
जाटों की 2 रियासत भरतपुर व धौलपुर थी और एकमात्र मुस्लिम रियासत टोंक थी। हालांकि टोंक पर लंबे समय तक राजपूतों का राज रहा, लेकिन फिर पिंडारियों की लूटमार को देखते हुए अंग्रेजों ने अमीर खां पिंडारी को टोंक रियासत का मालिक बना दिया।
19 रियासतों के अलावा राजपूतों के 3 ठिकाने लावा, कुशलगढ़ और नीमराना भी एकीकरण में शामिल हुए।
ज्ञानी होना अच्छी बात है मगर प्रेमी होना उससे भी श्रेष्ठ । आप सम्पूर्ण जगत का ज्ञान रखते हैं यह उतना मूल्यवान नहीं जितना आप सम्पूर्ण जगत को प्रेम करते हैं। राम चरित मानस में आया है कि, 'सोह ना राम प्रेम बिनु ग्यानू"
ज्ञानी होने पर यदि आपको प्रभु चरणों में प्रेम नहीं है तो वह ज्ञान शोभा हीन है। ज्ञानी के लिए जगत में कोई अपना नहीं है प्रेमी के लिए पूरा जगत ही उसका है। ज्ञानी संसार से मुक्त होना चाहता है मगर प्रेमी सारे संसार को कृष्णमय मानकर उसकी सेवा करना चाहता है।