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मीरा बाई की माला के 564 साल पुराने 1008 मनके, इन पर ही श्रीकृष्ण के नामों का स्मरण कर उन्हें पाया।
कालचक्र में रेशम की डोरी ताे खंडित हो गई, लेकिन मनके आज भी मीरा के पीहर पक्ष के वंशजाें के पास सहेज कर रखे हुए हैं। 22वीं पीढ़ी के वंशज पुष्पेंद्रसिंह कुड़की बताते हैं कि राेज राजपरिवार द्वारा मनकाें की पूजा की जाती है। ये मनके किसी काे दिखाए नहीं जाते, लेकिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर पाठकाें काे इन दिव्य मनकाें के दर्शन हाे सके।
ये कानपुर की निशी हैं। बगल में इनके पिता निरंकार गुप्ता और मां रेखा गुप्ता हैं। निरंकार पान की दुकान चलाते हैं। निशी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से BALLB करने के बाद यहीं तैयारी करने लगी थी। राजस्थान और मध्य प्रदेश में परीक्षाएं दी लेकिन फेल हो गईं। घरवालों ने कहा, बेटी हारना नहीं है, लगी रहो।
बेटी ने इतिहास रच दिया। PCS-J परीक्षा में पहली रैंक हासिल की। अब पान वाले की बेटी सीधा जज बनेंगी।
दोस्तों, मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। करके तो देखिए। ❤️😍👌
# "गंगा स्नान #
दो जवान बेटे मर गए। दस साल पहले पति भी चल बसे। दौलत के नाम पर बची एक सिलाई मशीन। सत्तर साल की बूढी पारो गाँव भर के कपड़े सिलती रहती। बदले में कोई चावल दे जाता , तो कोई गेहूँ या बाजरा। सिलाई करते समय उसकी कमजोर गर्दन डमरू की तरह हिलती रहती। दरवाजे के सामने से जो भी निकलता वह उसे ‘ राम – राम ‘ कहना न भूलती।
दया दिखाने वालों से उसे हमेशा चिढ रहती। छोटे – छोटे बच्चे दरवाजे पर आकर ऊधम मचाते , लेकिन पारो उनको कभी बुरा भला न कहकर उल्टे खुश होती।
प्रधान जी कन्या पाठशाला के लिए चन्दा इकट्ठा करने निकले ,तो पारो के घर की हालत देखकर पिघल गए — क्यों दादी , तुम हाँ कह दो, तो तुम्हे बुढ़ापा पेंशन दिलवाने की कोशिश करूँ।
पारो घायल – सी होकर बोली_ भगवान ने दो हाथ दिए हैं। मेरी मशीन आधा पेट रोटी दे ही देती है। मैं किसी के आगे हाथ क्यों फैलाऊँगी। क्या तुम यही कहने आये थे ?
मैं तो कन्या पाठशाला बनवाने के लिए चन्दा लेने आया था। पर तेरी हालत देखकर।
तू कन्या पाठशाला बनवाएगा ? पारो के झुर्रियों भरे चेहरे पर सुबह की धूप -सी खिल गई।
हाँ , एक दिन जरूर बनवाऊँगा दादी। बस तेरा आशीष चाहिए।”
पारों घुटनों पर हाथ देकर टेककर उठी। ताक पर रखी जंगखाई संदूकची उठा लाई। काफी देर उलट -पुलट करने पर बटुआ निकला। उसमें से तीन सौ रुपये निकालकर प्रधान जी की हथेली पर रख दिए _बेटे , सोचा था मरने से पहले गंगा नहाने जाऊँगी। उसी के लिये जोड़कर ये पैसे रखे थे।
तब ये रुपये मुझे क्यों दे रही हो ? गंगा नहाने नहीं जाओगी ?
बेटे , तुम पाठशाला बनवाओ। इससे बड़ा गंगा – स्नान और क्या होगा”-कह कर पारो फिर कपड़े सीने में जुट गई —