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नीत्से ने गॉड का पुतला बनाकर
बर्लिन के चौराहे पर फूँक दिया।
बोला कि गॉड मर चुका है।
बताओ अब क्या करोगे ?
वास्तव में नीत्से ने गॉड को नहीं फूंका था। उसने नियतिवाद से उपजी झूठी उम्मीदों को फूंक दिया।
नीत्से ने मनुष्य के साहस, कर्मठता को चुनौती दी थी।
यही कारण है, नास्तिक होते हुये नीत्से को गीता बहुत प्रिय थी। वह व्यक्तित्व विकास में हर बाधा को हटा देना चाहता था।
इधर यही बात कुछ बड़े आश्वासन और
समाधान के साथ कही जा रही है।
दुख, पीड़ा, असफलता, जय, पराजय से मैं किसी को बचा नहीं सकता। इतना कह सकता हूँ, सभी परिस्थितियों में 'समत्व ' भाव रखो।
सूखे दुखे समेकृत्वा लाभा लाभो जया जैयो - गीता।
मैं सारथी बन सकता हूँ,
लेकिन युद्ध तुम्हें ही लड़ना है।
ततो युद्धाय यूजस्य।
नीत्से दार्शनिक होते हुये मन की पीड़ा नहीं पकड़ सके।
वह इसका समाधान नहीं दे सके, विजय या पराजय के बाद क्या होगा।
जगतगुरू जय पराजय के पार जाते हुये कहते हैं... समत्व हर परिस्थिति में श्रेष्ठ है। वह इसका समाधान करते हैं। व्यक्तित्व कितना भी श्रेष्ठ क्यों न हो, भटक सकता है।
क्योंकि जीवन में जय, पराजय साथ साथ चलती है। कहीं हम हार रहे होते हैं, तो उसी समय कहीं जीत भी रहे होते हैं। यह तभी समझ सकते हैं जब समत्व भाव हो।।