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लीला का प्रसंग:
ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र उपमन्यु छोटे बालक थे। एक बार उन्होंने अपनी माता से दूध माँगा, पर गरीबी के कारण माता के पास दूध नहीं था। माता ने आटा घोलकर पिला दिया, पर बालक समझ गया कि यह दूध नहीं है। माता ने दुखी होकर कहा— "बेटा! अगर दूध चाहिए तो जगत के पिता महादेव की शरण में जा, वही सब देने वाले हैं।"
छोटा सा बालक हिमालय पर जाकर घोर तपस्या करने लगा। भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिए 'इंद्र' का रूप धरा और प्रकट होकर शिव जी की निंदा करने लगे। उन्होंने कहा— "उस भस्मधारी (शिव) की पूजा छोड़ दे, मैं तुझे स्वर्ग का ऐश्वर्य दूँगा।"
यह कथा प्रभु के बाल्यकाल की है। ब्रज में एक अत्यंत वृद्ध स्त्री रहती थी जो वन से फल लाकर बेचा करती थी। वह निर्धन थी, लेकिन उसका मन श्री कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम से भरा था।
लीला का वर्णन
एक दिन वह टोकरी में फल लेकर नंद भवन के द्वार पर आई। बाल कृष्ण ने जब सुना कि कोई फल बेचने आया है, तो वे भी फल खाने के लिए मचल उठे। प्रभु ने देखा कि बड़े लोग अनाज के बदले फल ले रहे हैं। वे छोटे-छोटे हाथों में मुट्ठी भर अनाज लेकर दौड़ते हुए बाहर आए।
दौड़ते समय उनके नन्हे हाथों से अधिकांश अनाज जमीन पर गिर गया और जब वे बुढ़िया के पास पहुँचे, तो उनकी हथेली में केवल दो-चार दाने ही शेष बचे थे।
जब तुलसीदास जी काशी (वाराणसी) में रहकर रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उसकी लोकप्रियता और बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने उस पवित्र ग्रंथ को चुराने या नष्ट करने की योजना बनाई। उन्होंने दो चोरों को रात के समय तुलसीदास जी की कुटिया में चोरी करने के लिए भेजा।
पहरेदार और चोरों का हृदय परिवर्तन
अद्भुत पहरेदार: जब चोर तुलसीदास जी के घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि कुटिया के बाहर दो अत्यंत सुंदर और तेजस्वी राजकुमार हाथ में धनुष-बाण लिए पहरा दे रहे हैं। उनके तेज को देखकर चोर डर गए और वापस लौट गए।
चोरों की जिज्ञासा: चोरों ने अगली रात फिर प्रयास किया, लेकिन उन्हें फिर से वही दो धनुर्धारी पहरेदार वहां मिले। ऐसा लगातार कई रातों तक हुआ। अंत में चोरों के मन में यह जानने की व्याकुलता हुई कि आखिर ये रक्षक कौन हैं।
सत्य का ज्ञान: अगले दिन सुबह वे चोर तुलसीदास जी के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि, "बाबा! वे दो सांवले और गोरे रंग के धनुर्धारी युवक कौन हैं जो रात भर आपकी कुटिया के बाहर पहरा देते हैं?"
तुलसीदास जी की प्रतिक्रिया
जब तुलसीदास जी ने यह सुना, तो वे फूट-फूट कर रोने लगे। वे समझ गए कि स्वयं भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी उनके तुच्छ घर की और उनकी रचना की रक्षा के लिए रात भर जागकर पहरा दे रहे थे।
तुलसीदास जी को बहुत आत्मग्लानि हुई कि उनके कारण उनके प्रभु को इतना कष्ट उठाना पड़ा। कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने अपनी कुटिया का सारा सामान दान कर दिया और केवल प्रभु के चरणों में ध्यान लगाया। वहीं, उन दोनों चोरों का हृदय परिवर्तन हो गया, उन्होंने चोरी छोड़ दी और प्रभु के भक्त बन गए।
यह प्रसंग तुलसीदास जी की अनन्य भक्ति और भगवान की अपने भक्त के प्रति वत्सलता का अनुपम उदाहरण माना जाता है। इस प्रसंग का वर्णन भक्तमाल और तुलसीदास जी के जीवन चरित्र में प्रमुखता से मिलता है।
पश्चिम बंगाल में अब भय का अंत और विकास के भरोसे का उदय निश्चित है। टीएमसी सरकार के भ्रष्टाचार, कुशासन और तुष्टिकरण को नकारकर जनता अब पूर्ण परिवर्तन का मन बना चुकी है।
आज खड़गपुर में भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की नामांकन रैली और भव्य रोड शो के माध्यम से आप सभी के बीच उपस्थित रहूँगी। बंगाल में अराजकता के इस दौर को समाप्त कर, अब भाजपा के साथ मिलकर सुरक्षा और सुशासन स्थापित करने का समय आ गया है। बंगाल के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस बार कमल खिलना तय है।
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मुख्यमंत्री श्री Pushkar Singh Dhami जी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में उत्तराखण्ड के गांव अब तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।
होमस्टे योजना, स्वयं सहायता समूहों और लोकल प्रोडक्ट्स को बढ़ावा देने वाली नीतियों ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नये अवसर पैदा किए हैं। धामी सरकार की पहल से गांव-गांव में आर्थिक गतिविधियां बढ़ रही हैं और विकसित उत्तराखण्ड की दिशा में मजबूत आधार तैयार हो रहा है।
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