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ईरान में उभरते सुरक्षा संकट ने एविएशन सेक्टर में खलबली मचा दी है। ईरान द्वारा अपना एयरस्पेस बंद किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के पहिए थमने लगे हैं। भारत की प्रमुख विमानन कंपनी एयर इंडिया, इंडिगो और स्पाइसजेट ने अपने-अपने X अकाउंट के माध्यम से यात्रियों को सूचित किया है कि कुछ उड़ानों को डायवर्ट किया जा रहा है, जबकि कुछ उड़ानों को पूरी तरह रद्द करना पड़ा है। यात्रियों से अनुरोध किया गया है कि वे अपने फ्लाइट स्टेटस की जांच करें और आवश्यकतानुसार ऑप्शन चुनें।
अभिनेता अक्षय कुमार गुरुवार को मुंबई में बीएमसी (BMC) चुनाव के लिए अपना वोट डालने पहुंचे थे। मतदान केंद्र से बाहर निकलते समय एक लड़की भीड़ से निकलकर उनके पास पहुंची और मदद की गुहार लगाई। लड़की ने हाथ में एक कागज पकड़ा हुआ था और रोते हुए कहा, "मेरे पापा बहुत बड़े कर्जे में हैं, प्लीज उनको बाहर निकाल दो"।
कर्नाटक में एक दर्दनाक हादसा हुआ है, जहां एक जानलेवा पतंग की डोर ने एक व्यक्ति की जान ले ली। बीदर जिले में सड़क पर खिंची नायलॉन की पतंग की डोर से गला कटने के बाद 48 वर्षीय बाइक सवार की मौत हो गई। नायलॉन पतंग की डोर को चाइनीज मांझा भी कहा जाता है, जो बेहद खतरनाक होता है।
मृतक की पहचान संजू कुमार होसामणि के रूप में हुई है। वह बीदर जिले के तलामदगी ब्रिज के पास सड़क पर बाइक से जा रहा था। इसी दौरान सड़क के बीच खिंची एक पतंग की डोर उनके गले में फंस गई। डोर इतनी तेज धी कि उनके गले में गहरा कट लग गया और खून बहने लगा।
कर्नाटक में एक दर्दनाक हादसा हुआ है, जहां एक जानलेवा पतंग की डोर ने एक व्यक्ति की जान ले ली। बीदर जिले में सड़क पर खिंची नायलॉन की पतंग की डोर से गला कटने के बाद 48 वर्षीय बाइक सवार की मौत हो गई। नायलॉन पतंग की डोर को चाइनीज मांझा भी कहा जाता है, जो बेहद खतरनाक होता है।
मृतक की पहचान संजू कुमार होसामणि के रूप में हुई है। वह बीदर जिले के तलामदगी ब्रिज के पास सड़क पर बाइक से जा रहा था। इसी दौरान सड़क के बीच खिंची एक पतंग की डोर उनके गले में फंस गई। डोर इतनी तेज धी कि उनके गले में गहरा कट लग गया और खून बहने लगा।
इस घटना के बाद होसामणि के परिजन और स्थानीय लोग हादसे की जगह पर इकट्ठा हो गए और प्रदर्शन किया। उन्हंने नायलॉन की पतंग की डोर पर सख्त कार्रवाई और बेहतर आपातकालीन सेवाओं की मांग की। मामले में मन्ना एकहेली पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि घटना की जांच की जा रही है।
1871 में जन्मे प्रिंस रैंडियन, जो बिना हाथ और पैरों के पैदा हुए थे, दुनिया में
“कैटरपिलर मैन (इल्ली जैसा इंसान)” के नाम से प्रसिद्ध हुए।
उनकी ज़िंदगी इस बात का प्रमाण है कि मानव आत्मा को शरीर की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।
रैंडियन टेट्रामेलिया सिंड्रोम के साथ जन्मे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने
👉 शेव करना
👉 सिगरेट मोड़ना
👉 कलम से लिखना
👉 और यहाँ तक कि चित्र बनाना
सिर्फ़ अपने मुँह और कंधों की मदद से सीख लिया।
1932 की प्रसिद्ध फिल्म “Freaks” में उन्होंने दर्शकों को हैरान कर दिया,
जब उन्होंने कैमरे के सामने बिना किसी विशेष प्रभाव के
सिर्फ़ अपनी इच्छाशक्ति से सिगरेट मोड़ी और जलाई।
ऐसी परिस्थितियों में जन्म लेने के बावजूद, जिन्हें कई लोग “असंभव” मानते,
रैंडियन ने सिर्फ़ जीवन नहीं जिया —
उन्होंने प्यार किया, मंच पर प्रदर्शन किया और लाखों लोगों को प्रेरित किया।
वह सिर्फ़ जीवित नहीं रहे,
बल्कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी को हिम्मत, संघर्ष और शक्ति के प्रदर्शन में बदल दिया।
वे अपने होंठों में ब्रश या पेन पकड़कर
लिखने और चित्र बनाने में भी सक्षम थे,
और एक विशेष लकड़ी के ब्लॉक में उस्तरा फँसाकर
खुद शेव भी कर लेते थे।
उन्होंने प्रिंसेस सारा से विवाह किया।
उनके पाँच बच्चे हुए —
चार बेटियाँ और एक बेटा।
इतिहास में मुझसे बड़ा दावेदार कोई नहीं”—नोबेल को लेकर ट्रम्प का फिर हमला
डॉनल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अपनी नाराज़गी खुलकर जाहिर की है। उन्होंने कहा कि अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान उन्होंने आठ बड़े संघर्षों को खत्म कराया, कई देशों के बीच समझौते करवाए और युद्ध टालने में निर्णायक भूमिका निभाई—फिर भी उन्हें अब तक यह सम्मान नहीं दिया गया।
ट्रम्प ने नॉर्वे पर निशाना साधते हुए कहा कि वही देश नोबेल पुरस्कार देता है और वही उन्हें नजरअंदाज कर रहा है। उनके मुताबिक, उन्होंने वो काम किया है जो कई नेता अपने पूरे जीवन में नहीं कर पाए।
उनका यह बयान एक बार फिर वैश्विक बहस को हवा दे रहा है—क्या शांति पुरस्कार राजनीति से प्रभावित होता है? क्या पर्दे के पीछे हुए समझौते और डिप्लोमेसी को उतना महत्व नहीं मिलता, जितना खुली लड़ाइयों को?
34 साल, एक भी छुट्टी नहीं: समीरन डेका बने मेहनत और अनुशासन की मिसाल
आज के दौर में जहां लोग छुट्टियों और आराम को प्राथमिकता देते हैं, वहीं गुवाहाटी के समीरन डेका ने अपनी पूरी ज़िंदगी काम को समर्पित कर दी। नॉर्थईस्ट फ्रंटियर रेलवे में 34 साल 7 महीने और 4 दिन की सेवा के दौरान उन्होंने न तो कभी मेडिकल लीव ली और न ही अर्जित छुट्टी।
1991 में एक साधारण सहायक रसोइए के रूप में शुरू हुआ उनका सफर, आज लाखों युवाओं के लिए मिसाल बन गया है। मेहनत, समय की कद्र और ईमानदारी—यही उनकी सफलता का मंत्र रहा। इन्हीं मूल्यों ने उन्हें ग्रुप-बी कमर्शियल ऑफिसर तक पहुंचाया।
समीरन डेका मानते हैं कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती। यह रोज़ किए गए छोटे प्रयासों का नतीजा होती है। उन्होंने कहा, “अगर आप अपने लक्ष्य से जुड़े रहते हैं, तो मंज़िल खुद आपके पास आती है।”
उनकी कहानी यह साबित करती है कि असली हीरो वही होते हैं, जो बिना शोर किए अपने काम से इतिहास बना देते हैं।
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