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मनुष्य का निर्णय बुद्धिमत्ता से अधिक परिस्थितियों के आधार पर होता है।
यह तो घटनाओं के बाद कि समीक्षा होती है। क्या गलत हुआ क्या सही हुआ।
उस समय वही सही था।
बाली का एक ही पुत्र था। अंगद, जिसे उसने भगवान राम को समर्पित कर दिया था।
पांडवों का सबसे यशस्वी पुत्र थे। अभिमन्यु, जिनकी वीरता को देखकर भीष्म जैसे महान योद्धा ने कहा था। मैं युवा था तो तुम्हारी तरह था।
लंका कौन जाय ! अंगद बोले मैं जा तो सकता हूँ। लेकिन लौटने में संदेह है।
चक्रव्यूह कौन तोड़ेगा ! अभिमन्यु ने कहा तोड़ तो सकते हैं। लेकिन सांतवें द्वार को तोड़ने का ज्ञान नही है।
यहां श्रेष्ठजनों ने निर्णय अलग अलग लिया।
अंगद को लंका नही भेजा गया।
अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने के लिये भेज दिया गया।
यह निर्णय अलग अलग इसलिये है। परिस्थिति अलग अलग है।
रामदल को पास हनुमानजी के रूप में एक विकल्प मिल गया।
पांडवों के पास कोई विकल्प नही था।
यद्यपि स्वामी विवेकानंद कहते है। मनुष्य परिस्थितियों का निर्माणकर्ता, भोगकर्ता दोनों है। यह सत्य होते हुये भी। उतना सत्य नही है।।
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